Sunday, September 13, 2026
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“मियाँवाला: देहरादून के ऐतिहासिक कस्बे का राजपूत जागीर इतिहास”

“मियाँवाला: देहरादून के ऐतिहासिक कस्बे का राजपूत जागीर इतिहास”

By Sheeshpal Gusai

हिमाचल प्रदेश के वर्तमान कांगड़ा जिले में कभी गुलेर रियासत का गौरवशाली इतिहास रहा था। यह रियासत न केवल अपने शासन और संस्कृति के लिए जानी जाती थी, बल्कि इसके गहरे संबंध उत्तराखंड की गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल रियासतों से भी थे। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल के लगभग 13 राजाओं के वैवाहिक और पारिवारिक रिश्ते हिमाचल प्रदेश की रियासतों, विशेष रूप से गुलेर, से जुड़े हुए थे। इन रिश्तों ने दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और सामाजिक आदान-प्रदान को मजबूत किया।

गढ़वाल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक, लगभग 60 वर्षों तक, शासन करने वाले राजा प्रदीप शाह का ससुराल गुलेर रियासत में था। इसी तरह, टिहरी गढ़वाल के तीसरे राजा प्रताप शाह की महारानी, जिन्हें गुलेरिया जी के नाम से जाना जाता था, गुलेर रियासत से थीं। यह महारानी टिहरी के राजा कीर्ति शाह की माता व महाराजा नरेंद्र शाह की दादी भी थीं। इन वैवाहिक संबंधों ने गुलेर और गढ़वाल-टिहरी के बीच एक मजबूत कड़ी स्थापित की। गुलेर रियासत के लोगों को “मियां” की सम्मानजनक उपाधि से नवाजा गया था, जो उस समय की बोलचाल और परंपरा में प्रचलित हो गया।

प्रदीप शाह के शासनकाल से ही गुलेरिया लोग अपने रिश्तेदारों के साथ गढ़वाल आने लगे थे। इन लोगों को “डोलेर” भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है कि वे दुल्हन रानी की डोली के साथ-साथ गढ़वाल आए थे। ये गुलेरिया लोग बड़े और सम्मानित राजपूत थे, जिनका प्रभाव और पहचान दोनों क्षेत्रों में फैली हुई थी। जब रियासतों से लोग गढ़वाल या टिहरी गढ़वाल की ओर आए, तो गुलेरिया भी उनके साथ थे। गढ़वाल और टिहरी के राजाओं ने इन लोगों को अपनी सेवा और रिश्तेदारी के सम्मान में कई जागीरें प्रदान कीं। इनमें से एक प्रमुख जागीर देहरादून के पास मियांवाला थी।

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “मियां” कोई जाति नहीं है, बल्कि यह गुलेरिया लोगों के लिए प्रयुक्त एक उपाधि थी, जो मूल रूप से गुलेर रियासत से संबंधित थे। राजा प्रदीप शाह ने इन गुलेरिया लोगों को मियांवाला से लेकर कुआंवाला तक की विशाल जागीर प्रदान की थी, ताकि वे अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें और सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। इन जागीरों के साथ-साथ गुलेरिया लोग गढ़वाल और टिहरी के विभिन्न क्षेत्रों में बस गए। आज भी टिहरी गढ़वाल के भिलंगना ब्लॉक में कंडारस्यूं और जखन्याली गांव, नरेंद्रनगर ब्लॉक में रामपुर गांव, पौड़ी गढ़वाल में नौगांव खाल के निकटवर्ती क्षेत्र, और उत्तरकाशी के नंदगांव आदि जैसे गांवों में “मियां” कहे जाने वाले ये लोग निवास करते हैं।

दरअसल, “मियां” शब्द इन लोगों की बोलचाल की भाषा और स्थानीय परंपरा में इस तरह रच-बस गया कि यह उनकी पहचान का हिस्सा बन गया। लेकिन मूल रूप से ये गुलेरिया लोग हैं, जो हिमाचल प्रदेश के गुलेर से उत्तराखंड आए और यहां की भूमि पर बस गए। उत्तराखंड के प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्वविद, पद्मश्री डॉ. यशवंत सिंह कटोच, भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मियांवाला जागीर का नाम गढ़वाल की राजपूत जाति के गुलेरिया लोगों की पदवी नाम पर पड़ा। उनके अनुसार, यह जागीर इन लोगों को उनके योगदान और रिश्तेदारी के सम्मान में दी गई थी।

इस प्रकार, गुलेर रियासत और गढ़वाल-टिहरी के बीच का यह ऐतिहासिक और पारिवारिक संबंध न केवल दोनों क्षेत्रों के इतिहास को जोड़ता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे संस्कृति, परंपरा और रिश्तों ने समय के साथ एक समृद्ध विरासत को आकार दिया। आज भी इन गांवों में बसे गुलेरिया लोग उस गौरवशाली अतीत की जीवंत स्मृति हैं।

महाराणी गुलेरिया जी एक अद्वितीय शख्सियत
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टिहरी गढ़वाल रियासत के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रानी गुलेरिया जी का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी जीवन कहानी केवल स्त्री शक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास में साहस, अखंडता और प्रतिबद्धता का अद्भुत उदाहरण भी है। राणी गुलेरिया का जन्म गुलेर रियासत के राजपरिवार में हुआ था। उनके पति, प्रताप शाह की मृत्यु के बाद, राजसत्ता की बागडोर उनके हाथों में आई। इस समय उनके पुत्र कीर्ति शाह नाबालिग थे, जिससे अंग्रेजों ने टिहरी गढ़वाल की शासन व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन रानी गुलेरिया की सूझबूझ और तीक्ष्ण बुद्धि ने अंग्रेजों की इस मंशा को ध्वस्त कर दिया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि कीर्ति शाह को राजा की उपाधि मिले, और उनकी राजसी विरासत को सुरक्षित रखा जाए। रानी गुलेरिया का जीवन भोग-विलास में नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों और धर्म के प्रति उनकी गहरी रुचि में समाहित था। उन्होंने 1913 में अपने पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद भी हार नहीं मानी। रानी ने अपनी जिम्मेदारियों का दृढ़ता से निर्वहन किया और समाज के विभिन्न पहलुओं में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। टिहरी में बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण उनके धार्मिक समर्पण का प्रतीक था, जो गंगा भागीरथी के ऊपर स्थित था। रानी गुलेरिया को पति और पुत्र की मृत्यु के गहरे दुख का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने गुट को टूटने नहीं दिया। वे अपने लोगों के साथ चट्टान की तरह खड़ी रहीं, जिससे समाज में उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ी। 72 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब उन्होंने टिहरी गढ़वाल रियासत को एक मजबूत और स्थिर दिशा दी थी।

मियांवाला में मस्जिद का इंडीकेशन न होना !
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मस्जिद का इंडीकेशन न होना इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय की उपस्थिति न के बराबर रही होगी। अगर इस क्षेत्र का नाम ‘मियां’ के नाम पर होता, तो संभवतः यहां एक मस्जिद की स्थापना होती। मस्जिदें अक्सर मुस्लिम समुदाय की आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा होती हैं, लेकिन मियांवाला के संदर्भ में, यह स्पष्ट होता है कि यहां इस किस्म का धार्मिक अभिव्यक्ति का कोई स्थान नहीं था। राजपूतों की जागीर के रूप में मियांवाला के विकास ने इसे एक विशेष पहचान दी है, लेकिन यह पहचान उस समय की राजनीतिक और सामाजिक संरचना से अविभाज्य है। यह संभव है कि गढ़वाल में अन्य धार्मिक समूहों का होना उस समय की राजनीति और समाजिक संरचना के कारण था, जिसे मियांवाला की पहचान से जोड़ा जा सकता है।

मियां नाम कहाँ से आया ?
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“मियां” नाम का मूल हिंदी और उर्दू भाषाओं से जुड़ा हुआ है और यह आमतौर पर मुस्लिम समुदाय में प्रयोग होता है। यह अरबी शब्द “मियाँ” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है “महाशय” या “श्रीमान” – एक सम्मानसूचक संबोधन। इसका इस्तेमाल अक्सर किसी व्यक्ति के प्रति आदर या सम्मान दिखाने के लिए किया जाता है। भारत और दक्षिण एशिया में, “मियां” को कभी-कभी एक उपनाम या व्यक्तिगत नाम के रूप में भी देखा जाता है। ऐतिहासिक रूप से, यह मुगल काल में भी प्रचलित था, जहाँ इसे रईसों या सम्मानित लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन देहरादून का मियाँवाला मुगल काल वाला नाम नहीं है।

उसकी आत्मा कहीं खो सी गई है
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किंतु समय, जो परिवर्तन का पर्याय है, ने डेढ़ सौ वर्षों से अधिक के अंतराल में मियांवाला के स्वरूप को पूर्णतः बदल दिया। प्राचीन निवासियों ने अपनी पैतृक भूमि को बेच दिया, और अब यहाँ मियां समुदाय का कोई चिह्न शेष नहीं। उनके नाम का यह क्षेत्र आज भी मियांवाला कहलाता है, परंतु वह केवल एक स्मृति बनकर रह गया है—एक ऐसा नाम, जो अतीत की गूँज को संजोए हुए है, किंतु वर्तमान में उसकी आत्मा कहीं खो सी गई है।

डूंगा जागीर की निशानी बची हुई है
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गढ़वाल के राजाओं ने मियांवाला जागीर की तरह डूंगा जागीर मैदान के पुंडीर लोगों को दी थी, जो उनके खास लोगों में थे। पुंडीर लोगों के वंश आगे न बढ़ पाने के कारण उनकी बेटी के बेटे चौहान लोगों के पास आ गए। आज देहरादून के परेड़ ग्राउंड के सामने डूंगा हाउस इसकी निशानी बची हुई है, जो अर्जुन सिंह चौहान आदि के पास है। जागीरें बड़ी-बड़ी होती थीं, लेकिन समय और जनसंख्या के चलते सिकुड़ती चली गईं। जैसे डूंगा जागीर की निशानी है, वैसे मियां (गुलेरिया) लोगों की निशानी मियांवाल में नहीं है।

मियांवाला जागीर: 1709-1772 में गुलेरिया राजपूतों को प्रदीप शाह द्वारा प्रदत्त
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गढ़वाल राज्य का शासन 823 ईस्वी में कनकपाल से शुरू हुआ और विभिन्न शासकों के नेतृत्व में 1803 तक 915 वर्षों तक स्वतंत्र रूप से गढ़वाल के 54 वें राजा प्रद्युम्न शाह तक चला। 1803 में गोरखाओं ने गढ़वाल पर आक्रमण किया और प्रद्युम्न शाह देहरादून में गोरखाओं से युद्ध करते हुए मारे गए। गोरखाओं ने गढ़वाल पर कब्जा कर लिया और 1803 से 1815 तक शासन किया। प्रद्युम्न के नाबालिग पुत्र सुदर्शन शाह को उनके दरबारियों ने बचा लिया। सुदर्शन शाह (1815 से ) गोरखाओं की हार के बाद, 1815 में अंग्रेजों ने सुगौली संधि के तहत टिहरी गढ़वाल का एक हिस्सा सुदर्शन शाह को लौटाया। स्वयं अंग्रेजों ने ब्रिटिश गढ़वाल और देहरादून के शासन को चलाया। सुदर्शन ने टिहरी को अपनी राजधानी बनाया और टिहरी गढ़वाल रियासत की स्थापना की, जो 1949 तक चली, जब यह भारत में विलय हो गई। मियांवाला गढ़वाल के 51 वें राजा प्रदीप शाह ( 1709-1772) के द्वारा जागीर के रूप में गुलेरिया राजपूत (मियाँ पदवी) लोगों दी गई।

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