वन कानून, जन अधिकार और विधानसभा की जिम्मेदारी: एक संवैधानिक विश्लेषण
By – Prem Pancholi
ग्रीष्मकालीन विधानसभा गैरसैण में हुए बजट सत्र के दौरान विकासनगर के विधायक Munna Singh Chauhan द्वारा उठाया गया प्रश्न केवल एक गांव की पेयजल समस्या तक सीमित नहीं था, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक और संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मुद्दा था। उन्होंने वन क्षेत्रों से गुजरने वाली पेयजल पाइपलाइन के निर्माण में आ रही बाधाओं का मुद्दा उठाते हुए पूछा कि जब पाइपलाइन बिछाने में पेड़ों की कटाई नहीं हो रही है, तो फिर वन कानूनों के कारण गांवों तक पेयजल की लाइन क्यों नहीं पहुंच पा रही है।
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उत्तराखंड के वन मंत्री Subodh Uniyal ने जो सफाई दी, वह विधानसभा की बहस के स्तर और सरकार की संवैधानिक समझ पर सवाल खड़े करती दिखाई दी। मंत्री ने स्पष्ट समाधान या संवैधानिक प्रक्रिया की दिशा बताने के बजाय इधर-उधर की व्याख्या करते हुए जवाब देते दिखाई दिए। इससे यह धारणा बनी कि मानो राज्य सरकार के पास इस समस्या को हल करने के लिए पर्याप्त अधिकार ही नहीं हैं, जबकि संविधान के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है।
भारत का संविधान राज्यों को प्रशासनिक और विधायी शक्तियाँ प्रदान करता है। Constitution of India की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। वन विषय अब समवर्ती सूची (Concurrent List) में आता है, जिसका अर्थ है कि इस विषय पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं। यदि किसी विशेष परिस्थिति में राज्य के विकास कार्य जैसे पेयजल आपूर्ति के कार्य वन कानूनों के कारण बाधित हो रहे हों, तो राज्य सरकार के पास विकल्प होता है कि वह केंद्र से समन्वय करे, नियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखे या विधानसभा में उपयुक्त विधायी पहल करे।
विकासनगर के विधायक Munna singh चौहान द्वारा दिए गए उदाहरण इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। सीमांत जनपद उत्तरकाशी के कफनौल गांव में पेयजल पाइपलाइन का काम केवल इसलिए अधूरा रह गया क्योंकि उसका कुछ हिस्सा वन क्षेत्र से गुजरता है। परिणामस्वरूप गांव के लोग आज भी गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के अनेक गांवों की वास्तविकता है, जहां विकास कार्य अक्सर वन कानूनों की जटिल प्रक्रियाओं में अटक जाते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी सामने आता है, क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की जिम्मेदारी राज्य की नहीं है? संविधान का उद्देश्य केवल कानूनों का पालन करवाना ही नहीं, बल्कि नागरिकों के मूल अधिकारों और जीवन की गरिमा को सुनिश्चित करना भी है। सुरक्षित पेयजल तक पहुंच को जीवन के अधिकार से भी जोड़ा जाता है, जो कि Article 21 of the Constitution of India के अंतर्गत व्यापक रूप से व्याख्यायित किया गया है। ऐसा यदि वन मंत्री सुबोध उनियाल को मालूम होता तो वे विधानसभा पीठ से आग्रह करके वन कानूनों में तब्दीली की पैरवी करते। कह सकते है कि जानकारी के अभाव में वे कर नहीं पाए।
ज्ञात हो कि किसी गांव में केवल प्रशासनिक या कानूनी अस्पष्टता के कारण पेयजल नहीं पहुंच पा रहा है, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि शासन की प्राथमिकताओं का प्रश्न बन जाता है। इसी प्रश्न की तस्दीक विधायक munna singh chauhan सदन में वन मंत्री से करते रहे। ऐसी स्थिति में वन मंत्री का दायित्व केवल नियमों का हवाला देना नहीं, बल्कि समाधान की दिशा बताना होना चाहिए था। बेहतर होता कि वे विधानसभा में यह प्रस्ताव रखते कि जिन विकास कार्यों में पर्यावरणीय क्षति नगण्य है, जैसे भूमिगत पाइपलाइन, उनके लिए सरल प्रक्रिया बनाई जाए या विशेष अनुमति तंत्र विकसित किया जाए बगैरह बगैरह।
चूंकि विधानसभा लोकतांत्रिक विमर्श का सर्वोच्च मंच होता है। यहां उठाए गए प्रश्नों का उद्देश्य केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि जन समस्याओं का समाधान ढूंढना होता है। यदि मंत्री सदन में स्पष्ट और संवैधानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं कर पाते, तो यह सरकार की नीतिगत तैयारी पर भी प्रश्न खड़े करता है।
इस पूरे प्रकरण से यह स्पष्ट होता है कि विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने एक महत्वपूर्ण जन मुद्दे को संवैधानिक दृष्टि से उठाने का प्रयास किया। उन्होंने न केवल स्थानीय उदाहरण प्रस्तुत किए बल्कि मूल अधिकारों की व्याख्या करते हुए यह भी संकेत दिया कि सरकार चाहे तो कानूनों में व्यावहारिक बदलाव करके ऐसी समस्याओं का समाधान कर सकती है।
कुलमिलाकर उत्तराखंड हिमालयी राज्य में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना एक जटिल चुनौती है, लेकिन यह असंभव भी नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवैधानिक समझ और व्यावहारिक नीति निर्माण की आवश्यकता होती है। अच्छा होता कि वन मंत्री को वरिष्ठ विधायक Munna singh chauhan के सहयोग की दरकार करते और संयुक्त प्रयास से इस समस्या का समाधान विधायी प्रक्रिया से सरल भी हो जाता।
दरअसल यह असंभव नहीं है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवैधानिक समझ और व्यावहारिक नीति निर्माण की आवश्यकता है। यदि विधानसभा में उठे ऐसे मुद्दों को गंभीरता से लिया जाए और विधायी पहल की जाए, तो दूरस्थ गांवों तक मूलभूत सुविधाएँ पहुँचाना निश्चित रूप से संभव है।







