
काव्यांश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मुकेश नौटियाल की पुस्तक “भौंकुछ” का दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में साहित्य के सिद्धहस्त हस्ताक्षरों के हाथों लोकार्पण हुआ है। इस अवसर पर पुस्तक के लेखक मुकेश नौटियाल ने सभी का स्वागत किया और कहा कि पुस्तक में क्या है इसकी चर्चा की अपेक्षा वे पाठकों और समीक्षकों से चाहते है।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता और दूरदर्शन के निदेशक अनिल भारती कहा कि एक पाठक के लिए मुकेश नौटियाल की यह पुस्तक रोचक इसलिए है की, पुस्तक का शीर्षक “भौंकुछ” ही पाठक की लालसा बढ़ा देती है। उन्होंने कहा कि शीर्षक में ही व्यापकता है। पुस्तक में साधारण शब्दों को असाधारण बनाना जैसी कला साहित्यकार मुकेश नौटियाल के पास ही है। इस पुस्तक में मानवीय संवेदनाएं हैं तो सामाजिक विसंगतियों, नैतिक मूल्यों को यह पुस्तक आईना दिखा रही है। अर्थात यही साहित्यिक अभिव्यक्ति है।
श्री भारती ने कहा कि आत्मकथा को निजी नहीं व्यापकता में लिखा जाना चाहिए जो इस पुस्तक में दिखती है। इसीलिए लेखक ने अपने समय, अपने समाज के बारे में लेखन में विस्तार दिया है। कहा कि जब पाठक पुस्तक की समीक्षा करेंगे तो उन्हें जीवन के अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर भी मिल जाएंगे। इस पुस्तक का मुख्य अध्याय “पोटली में पिता” बहुत महत्वपूर्ण है। जिसमें नए रास्ते खोलने की संभावना है तो लेखक की स्मृतियों का खजाना है। जबकि इस कृति में लेखक ने चर्चा बावत पाठक के लिए खुला मंच रखा है। इसके अलावा बाजार में अस्पताल वाला अध्याय आज के समय की प्रासंगिकता है। इधर लेखक ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एच एन बहुगुणा द्वारा दिया गया आर्थिक सहयोग की बात भी खुलकर लिखी गई है। इससे एक पाठक को मालूम होता है कि लेखक संवेदनशील है और प्रकृति प्रेमी है। जबकि जीवन में दुख, सुख और संघर्ष हर किसी के सामने आते ही है। इन संकटों को जब साहित्यकार लिखता है तो वह साहित्यकार का सामाजिक दायित्व बन जाता है जो इस पुस्तक की गरिमा बढ़ा रहा है। इसलिए कह सकते हैं कि लेखक की महत्ती आशावादी जीवन दृष्टि है। श्री भारती ने मुकेश कुमार के एक गीत “वो सुबह कभी तो आएगी” गाकर अपनी बात समाप्त की है।
लेखक और प्रशासनिक अधिकारी अमित श्रीवास्तव ने कहा कि पुस्तक का यह प्रकार नया बेसक है पर आवश्यक भी है। जब लेखक मुकेश नौटियाल अपने अतीत में जा रहे थे ऐसे में उनकी सृजनशीलता भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। उन्होंने कहा कि 1990 के बाद लिखने, सोचने, पढ़ने की स्थिति बदली है, इसी बदलाव की सच्ची कहानी को यह किताब पाठकों तक पहुंच बना रही है। यही नहीं कोरोनकाल में भी लोगो की कार्यपद्धति बदली है। समाज के ऐसे कई बदलाव हुए हैं जो इस पुस्तक में दिख रहा है। दरअसल यह पुस्तक इतिहास को भी नए ढंग से रच रही है। यानि आज का मध्यम वर्ग अपने अतीत को देखना चाहता है, ऐसा ही अतीत इस पुस्तक में पढ़ने को मिल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि लेखन की परम्परागत विधाएं टूट रही है यह बदलाव है और सकारात्मक है। यही वजह है कि मुकेश नौटियाल की यह “भौंकुछ” पुस्तक इस परिवर्तनकारी समाज को पढ़ने के लिए आकृषित कर रही है।
शिक्षाविद व पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक डॉ० सविता मोहन ने कहा कि इस किताब का नाम “भौंकुछ नहीं ममत्व” होना चाहिए। यह पुस्तक एक संघर्ष भरी यातनाओं को जीता हुआ चलचित्र है। कहा कि अतीत का शाब्दिक खनन है। उन्होंने एक तरफ 21वी सदी में कोई गौदान आदि जैसी रचना का न आने पर चिंता व्यक्त की है तो वहीं इस तरह की नई विधा की रचना का आना बेहद जरूरी बताया है। कहा कि यह “निर्बंध विधा” है। जहां कोई बाधा नहीं है।
ममता की कहानी, दादा दादी और समाज सब कुछ की कहानी आ रही है। यहां तक कि पूरा पहाड़ आ रहा है। कहा कि वे जब मुकेश नौटियाल की “भौंकुछ पुस्तक” पढ़ रही थी तो उन्हें ऐसा अहसास हो रहा था कि वे “अज्ञेय” को पढ़ रही है। उन्होंने यह भी कहा कि इस पुस्तक में ईश्वर आया है। ईश्वर भय का कारण है और भय शक्ति देता है, यानि मुकेश नौटियाल को जिस तरह संकट से उभरने की शक्ति मिली है और एक विशेष पुस्तका की रचना हुई है। उन्होंने कहा कि परिवार की समस्या के साथ साथ समाज को समझने का यहां जो व्यंगात्मक शब्दों को इस्तेमाल किया गया वही बिंब अद्भुत है। जीवन की कथा को समाज की कथा बताई, ऐसी विद्या आनी चाहिए जिसका वे स्वागत करती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात साहित्यकार जीतेन ठाकुर ने कहा कि कुछ भी यानि “भौंकुछ” अर्थात कुछ जब होगा तभी कुछ भी हो सकता है। यही भौंकुछ पुस्तक की प्रासंगिकता है। पुस्तक में अमूर्त चीज को मूर्त बना दिया। उन्होंने कहा कि लेखक पर्वतारोही की तरह लेखन की यात्रा नहीं करता, बल्कि लेखक चोटी से उतरने के बाद को समझने की महती कोशिश करता है। लेखक जब तक संघर्ष को नहीं समझेगा तब तक वह लिख नहीं सकता। यही मुकेश नौटियाल ने “भौंकुछ” पुस्तक लिखकर साहित्य जगत में एक नया अध्याय जोड़ा है। कहा कि इस पुस्तक में लेखन की शैली, प्रवाह बेहद खूबसूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि लेखक यश प्राप्ति चाहता है इसलिए वह अलग लिखता है। पहचान बनाने के लिए लोग झंडे डंडे लेकर चलते है इसलिए कि उनकी कोई पहचान नहीं। पहचान बनाने के लिए कुछ खास करना पड़ेगा। इसी क्रम में मुकेश नौटियाल की ये पुस्तक है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि लेखक जो लिखना चाहे उसे लिखने देना चाहिए। बशर्ते लेखक को झंडाबरदार नहीं होना चाहिए। अतएव यह पुस्तक इनसे दूर रहने की सीख दे रही है। उन्होंने कहा कि समय के साथ साथ साहित्य भी बदलता है। समय ही बताता है कि कौनसा साहित्य स्वीकृति है।
कार्यक्रम का सफल संचालन वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती बीना बेंजवाल ने किया। जबकि कार्यक्रम में पहुंचे सभी दर्शकों, पाठकों व साहित्यकारो का स्वागत दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के रिसर्च एसोसिएट चंद्रशेखर तिवारी ने किया है। अंत में काव्यांश प्रकाशन के प्रबंधक प्रबोध उनियाल ने छपते छपते क्या क्या अनुभव हुए उन्हें बताया, साथ में उन्होंने ने भी सभी का आभार व्यक्त किया है। कहा कि “पाठक मन का प्रकाशन” काव्यांश को नया श्लोगन मिला है, यह काव्यांश प्रकाशन की उपलब्धि है।








