भारती आनंद
ऊँची पहाडी पर बना,
हमारा वो लकड़ी का घर।
उसकी छत थी ढालदार,
और खिड़कियां हवादार।
लकड़ी, मिट्टी, और पत्थर,
से बना भूकंपरोधी घर।
जब भी मैं रसोई की,
खिड़की से झांकती।
माँ यमुना के दर्शन होते।
बहती नदी मानो कह रही,
देखो निरंतर चलते रहना।
निर्मल और पावन जल सम,
भाव भी मन में निर्मल रखना।
वर्षों से खड़ा पहाड़ कहता,
देखो मुझे और सीखो।
कैसे विषम परिस्थिति में,
जूझना, स्थिर रहना।
वो हरे-भरे वृक्ष कहते हरदम,
देखो कभी घबराना मत।
बदलाव होगें जीवन में,
बदलते मौसम जैसे।
ऋतुओं के बदलते ही,
बदलेगा बहुत कुछ।
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