नरेंद्र कठैत : सीमित संसाधनों और छोटे भूगोल में बैठा लेखक भी अपनी ईमानदार और संजीदा लेखनी से विश्व साहित्य में अपनी पहचान दर्ज करा सकता है।
By – Sheeshpal Gusain
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साहित्य केवल अक्षरों का जमावड़ा नहीं होता, वह समय और समाज की गहरी परतों में छिपी धड़कनों की गूँज है। लेखक वही होता है जो इस गूँज को स्वर दे सके, उसे सुनने योग्य और अनुभव करने योग्य बना सके। उत्तराखंड के वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कठैत ऐसे ही रचनाकार हैं। उनकी कृतियाँ – “ज्ञान के कठैत”, “विशेष जन विशेष” और “स्मृति शेष” – महज़ किताबें नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के अनदेखे पहलुओं का जीवंत दस्तावेज़ हैं।
राही साहित्य रैंकिंग और कठैत का सम्मान
2025 में जब राही साहित्य रैंकिंग ने उन्हें विश्व हिंदी लेखकों की 100 सर्वश्रेष्ठ सूची में 48वाँ स्थान प्रदान किया, तो यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रही। यह उस मिट्टी, उस संस्कृति और उस भाषा का सम्मान भी था, जिसे वे अपनी कलम से जीवित रखते आए हैं। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष वे उत्तराखंड से चयनित एकमात्र हिंदी साहित्यकार बने। राही साहित्य रैंकिंग की शुरुआत 2016 में वरिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार प्रबोध गोविल ने की थी। इसका उद्देश्य मात्र क्रम देना नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी लेखकों की पहचान और उनके योगदान को रेखांकित करना है। इस सूची का मर्म यही है कि साहित्य केवल पढ़ने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का सेतु है।
कठैत की लेखनी : अनुभव, शोध और स्मृति की गहराई
कठैत की रचनाएँ विचार और अनुभव की उन सूक्ष्म परतों को सामने लाती हैं जिन्हें सामान्यतः नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। उनके संस्मरण हों या शोधपरक लेखन—हर जगह समाज की नब्ज़ पकड़ने की अद्भुत क्षमता दिखाई देती है। उनके लेखन में संवेदना है, संवाद है और भविष्य के लिए एक दृष्टि भी। यही कारण है कि उनके शब्द पाठक के मन में टिकते हैं और विचार को गति देते हैं।
गढ़वाली भाषा के पुरोधा
हिंदी साहित्य में योगदान के साथ ही कठैत गढ़वाली भाषा के भी सशक्त हस्ताक्षर हैं। इस भाषा पर उनकी कई महत्त्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। गढ़वाली को जीवंत रखने और उसकी धरोहर को सहेजने के लिए उन्हें उत्तराखंड भाषा संस्थान से पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। पौड़ी गढ़वाल में रहकर वे लगातार साहित्यिक रचनाशीलता को नई दिशा दे रहे हैं। उनका नाम इस वैश्विक सूची में दर्ज होना न केवल व्यक्तिगत सम्मान है, बल्कि पूरे उत्तराखंड की साहित्यिक चेतना के लिए भी गौरव का क्षण है। यह संदेश है कि सीमित संसाधनों और छोटे भूगोल में बैठा लेखक भी अपनी ईमानदार और संजीदा लेखनी से विश्व साहित्य में अपनी पहचान दर्ज करा सकता है। नरेंद्र कठैत का यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि साहित्य की वास्तविक शक्ति शब्दों से परे जाकर समाज और संस्कृति की आत्मा को छूने में है।
@लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।







