Thursday, May 14, 2026
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प्रसिद्ध समाज विज्ञानी डॉ० अरुण कुकसाल यहां नशा नहीं-रोजगार दो आन्दोलन : 1984-2026′ के अंतराल का संस्मरण बता रहे है।

‘नशा नहीं-रोजगार दो संस्करण : 1984-2026’

 

– शराब के शौकीन भी शहंशाहों को शराबी नहीं बनाना चाहते।

 

‘जो शराब पीता है, परिवार का शत्रु है।’
‘जो शराब बेचने वाला है, समाज का दुश्मन है।’
‘जो शराब बेचता है, देश का दुश्मन है।’

शॉकिए मत, उत्तराखंड में उक्त नारा आज के नहीं वरन् 42 वर्ष पूर्व के हैं। अतीत की बात है. और, अतीत को सहिलाना ही तो फिर हम-सबकी उलझन बन गई है। वर्तमान-प्रशासनिक, प्रभुत्वशाली वर्ग और उसके पैरोकारों के लिए तो यह आम जनता का विशिष्ट नागरिक कार्यों से ध्यान हटाने का अचूक उपाय है।

आज के दौर में इन नारियों में ‘दुश्मन’ शब्द कथित ‘दोस्त’ में शामिल हो कर हमारे समाज के संचालन में ‘हितेषी’ की स्थापना कर हासिल की है।

बात फिर अतीत की करते हैं। पिछली शताब्दी के सत्र के दशक में गढ़वाल-कुमाऊं में वन-आंदोलन के सिद्धांत को लेकर तब के युवाओं ने ‘निजी पढ़ाई के साथ सामाजिक लड़ाई’ का नारा दिया था। इस विचार के तहत ‘पर्वतीय युवा मोर्चा’, ‘युवा निर्माण समिति’ और ‘उत्तराखंड सर्वोदय मंडल’ ने 25 मई, 1977 को गोपेश्वर में ‘उत्तराखंड संघर्ष मोर्चा’ का गठन किया था।

‘उत्तराखंड संघर्ष दल’ पिछली सदी में 70 और 80 के दशक में उत्तराखंडी युवाओं को ‘पढ़ाई के साथ सामाजिक लड़ाई’ के नारे के लिए सामाजिक पहाड़ों से जोड़ना और उन्हें दक्षिण करने की शीर्ष संस्था के रूप में लोकप्रिय हुई थी।

‘नशे का प्रतिकार न होगा, पहाड़ का उद्देश्य न होगा’ और ‘नशा नहीं-रोजगार दो, काम का अधिकार दो’ जैसे जन-नारों की गूंज के साथ ‘उत्तराखंड कॉन्सटेंट कॉर्प्स’ के नेतृत्व में 2 फरवरी, 1984 को ‘नशा नहीं-रोजगार दो’ का नारा बसभीड़ा गांव, (अल्मोड़ा)से हुआ था। इसके युवा साथियों को स्वीकार करते हुए कहा गया कि यह आंदोलन आम उत्तराखंडी जन-मानस की सक्रियता से जन-आंदोलन के जहां पर आया था।

लेकिन, नियति देखिए धीरे-धीरे साल-दर-साल नशा-तंत्र के यंत्र षडयंत्रों के सामने आम-जन के मन-तत्रं को चढ़ाया जाना। क्योंकि, नशा-तंत्र का मजबूत पालनहार उत्तराखंड की सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था जो थी।

कहा जाएगा कि, ‘नशा नहीं-रोजगार दो’ के चार दशक बाद, तब से अब तक इतना बड़ा हुआ कि तब शराब के नशे में कुछ लोगों की आय का ज़रिया था। आज शराब उत्तराखंड सरकार की एक प्रमुख ज़रिया है।

आज उत्तराखंड में नशा-तंत्र और सरकारी-तंत्र का भेद ‘शब्दों’ में ‘सरोकन्स’ नहीं दिखता।

सरकार बनाने के लिए उन क्षेत्रों से भी अधिक राजस्व इलेक्ट्रॉनिक्स चाहता है जो सामान्य राज्य में भी जन किशोर सहयोगियों के खिलाफ समझा जाता है। अधिक से अधिक शराब के वैयक्तिक केंद्र खोल कर इस बात को जनता में शामिल किया जा रहा है कि शराब के बिना सरकार अपना राजस्व राजस्व नहीं तकनीकी खोजेगी। इस आम आदमी में यहां तक ​​कि नव-जवानों तक के मन-मस्तिष्क में यह संदेश सामान्य तरीके से दिया गया है कि अनचाहे ही सही शराब सरकारी आय एक प्रमुख जरिया है।

ताज्जुब ये है कि ये तो सभी जानते और मानते हैं कि इस झील के खतरनाक नतीजे उत्तराखंडी समाज में दिख रहे हैं और आने वाले समय में और वैज्ञानिक दिखेंगे।

शराब के मकड़जाल में 11 जनवरी, 1026 को पूरे दिन का परिदृश्य बना हुआ है। इस दिन बहुचर्चित ‘अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड’ के मुद्दे पर क्षेत्र में अधिकाँश व्यावसायिक प्रतिष्ठान पूरे बंद रहे लेकिन उस दिन भी शराब की ज्यादातर गिरावट सामान्य दिनों की तरह हर जगह खुली ही रही। इसका कहीं कोई प्रभावशाली विरोध भी नहीं हुआ। शायद इस बात का अंदाज़ा शराबी को पहले से ही हो रहा होगा। जबकि, कम से कम पहाड़ी राज्य पूर्व में जब कभी किसी जन मुद्दे पर बाजार बंद का आह्वान हुआ था तो शराब की दुकानें सबसे पहले बंद हो गई थीं। जन आंदोलन के प्रति उनके मालिक ने डर के भाव से या फिर अपनी नैतिक सामाजिक जिम्मेदारी को खत्म करते हुए ऐसा किया था। आज न तो जनता का डर है और नैतिक जिम्मेदारी की बात करना तो अब कमी नहीं है।

भारतीय संविधान की धारा 47 में उल्लेख किया गया है कि ‘राज्य जनता के पोषण आहार, जीवन निर्वाह के स्तर को ऊंचा करना और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार को अपनी दृष्टि कर्त्तव्यों में मुख्य समझेगा और विशेष रूप से स्वास्थ्य के लिए रिवायत नशीले पेयों और औषधियों को स्थापित करना, जो चिकित्सा के काम आते हैं, उन्हें प्रतिबन्धित करने का प्रयास करना चाहिए।’

देश के संविधान में इतनी स्पष्टता दिखाई दी कि अब तक राष्ट्रीय नीति नहीं बन पाई है। यह एक दु:खद और दुखद पूर्ण निर्देशक है।

उत्तराखंड राज्य के जन-जीवन को शराब किस हद तक प्रभावित कर रही है, इसकी एक बनगी ये है कि ‘उत्तराखंड में पहाड़ की ओर जाने वाला हर सातवां ट्रक शराब से भरा होता है, तो पहाड़ से वापस आने वाला हर दसवाँ ट्रक शराब की रेती खाली बोतलों से भरी होती है, ये सब तब है जब पूरे पहाड़ में अवैध शराब के एक मजबूत नाके की कंपनी का दावा किया जाता है।’ (एक अध्ययन)

वर्तमान समय में नशे की समस्या से उत्तराखंड का हर गांव एवं नगर प्रभावित है। शराब से आम जनता के स्वास्थ्य में गिरावट आई है, लोगों की असमायिक मृत्यु में नशा एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। आचरण ही नहीं इससे अपराध भी बड़ रहे हैं। सड़क पर तेजी से बढ़ती आबादी की संख्या का एक प्रमुख कारण शराब का सेवन है। लोगों की आमदानी का बहुत बड़ा हिस्सा शराब में ही बरबाद हो रहा है। यह भी देखा गया कि शराब के नशे को बड़ावा देने वाला वर्ग शराब के जरिये अवैध कार्य को अंजाम देने में सफल हो जाता है।

सेना में भर्ती के आंकड़े यह स्वीकार कर रहे हैं कि स्वास्थ्य के निर्धारित मानकों को पूरा करने के लिए पहाड़ में सबसे ज्यादा युवा पदस्थापित हो रहे हैं। उनके लिए सेना में भर्ती करना कठिन हो रहा है।

ज्ञातव्य है कि उत्तराखंडी समाज में शराब का आम वोग वडोदरा के आगमन से शुरू हुआ। वहां सबसे पहले यहां के आम जीवन में स्थानीय आदर्श से बनी शराब का वोग अशंमात्र ही था। ओल्ड कौसानी और लैंसडन में सैनिकों की चव्हाणियाँ बनाई गईं। इन छावनियों में एक तरफ सैनिक तैयार होते हैं तो दूसरी तरफ पहाड़ में शराब का वोग शिखर होता है।

विदम्बना आज से लगभग 200 साल पहले देखें एजेजों ने यहां के युवाओं को सेना में भर्ती के लिए शराब का लालच दिया था। आज वही शराब सेवन के कारण यहां युवा सेना में भर्ती नहीं हो पा रहे हैं।

यह समझा जाना चाहिए कि उत्तराखंड में नशे के खिलाफ चल रहे उपदेश और सुधारवादी तरीकों से स्थानीय और प्रदेश स्तर पर नशाबंदी तक ही सीमित नहीं है। समीक्षाओं में शामिल आम आदमी को अब ऐसा लगता है कि वह अपने परिवेश के माहौल और शासक तंत्र को बदल सकता है। शराब पर एवं आकर्षक आकर्षण नशे की लत से जुड़े-पोसने वाले तंत्र की कुव्यवस्था का भी मूल रूप से समाप्त करना चाहते हैं। हाल में शराब विरोधी आंदोलन और कई इलाकों में शराबबंदी की मजबूती पहले इसके अच्छे संकेत हैं।

यह प्रचारित किया गया कि नशाबंदी से राज्य का पर्यटन उद्योग प्रभावित होगा। यह नितान्त अव्यवहारिक तथ्य है। यह जगजाहिर है कि उत्तराखंड अदभुत नैसर्गिक अवशेष एवं परम आस्था के तीर्थस्थलों का समृद्ध क्षेत्र है। तीर्थयात्री, पर्यटन, पथारोही, पर्वतारोही, अध्येता आदि हिमालय में आध्यात्मिक शांति, देव-दर्शन और प्राकृतिक सुंदरता से अभीभूत अपने परिवार के साथ बार-बार आने की इच्छा रखते हैं। अवलोकन एवं तीर्थयात्रियों के परिवार के साथ उत्तराखंड आने की परंपरा में ही इस बात का जिक्र है कि शराब की चट्टानें उनकी कदापि आर्कषण नहीं रह रही हैं।

शराब बंदी के विरोध में सबसे मजबूत तर्क यह दिया गया है कि इससे राज्य की आय में तेजी से गिरावट आएगी। यदि इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाए तो यह भी सोचा जाना चाहिए कि राज्य के लोगों की पारिवारिक वित्तीय बचत निश्चित रूप से होनी चाहिए। परिवार की यह आर्थिक बचत शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि में काम आएगी। जो कि अंतिम रूप से राज्य के वित्तीय ढांचे को मजबूत और बढ़ाने में ही मदद करता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के प्रतीकात्मक संदेश की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं कि ‘…अगर मुझे केवल एक वंशज के लिए भारत का शासक बनाया जाए तो सबसे पहले मैं देश भर में शराब की दुकानों को बिना किसी लाइसेंस के बंद करा दूं’ (यंग इंडियाः 15 मार्च 1931)

आज 2 फरवरी, 2026 को ‘नशा नहीं-रोजगार दो’ की 42वीं सालगिरह है। उत्तराखंड और पुरातत्व में शराब विरोधी परियोजनाओं की लौ को अब तक बचाये रखने वाले कई दोस्त और संगठन इसकी जन्मस्थली घुंगोली-बावलीड़ा-चौखुटिया, (अल्मोड़ा) में चिंतन-मनन के लिए आयेंगे।

इस अवसर पर आपसे यह भी अनुरोध किया जाता है कि इस प्रशिक्षण की लौ को अपने स्तर से भी बचाये रखने का स्थान प्रदान किया जाना चाहिए। क्योंकि, आप इसे जानने वालों में से हैं, यहां तक ​​कि ‘शराब के कट्टर समर्थक भी अपनी भावी पीढ़ी को शराबी नहीं देखना चाहते।’

“चित्र- 2 फरवरी, 1984 बसभीड़ा, चौखुटिया (अल्मोड़ा)
चित्र में शमशेर बिष्ट, पी.सी. तिवारी, प्रधान असनोड़ा, भालू तिवारी ‘गिरिधा’, अरुण कुकसाल, निर्मल जोशी, मंगल सिंह, चन्द्रशेखर तिवारी आदि…
चित्र- 2 फरवरी, 2025, बसभीड़ा-चौखुटिया अपील”

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