जैविक एवं प्राकृतिक खेती में अंतर।
Dr. Rajendra Prasad Kuksal
जैविक खेती और प्राकृतिक खेती दोनों ही रसायन मुक्त खेती के तरीके हैं, लेकिन खेती की इन दोनों पद्धतियों में महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं।
1- जैविक खेती में बाहरी चीजों जैसे प्रमाणित बीज, कम्पोस्ट खाद,गोबर की खाद, केंचुए खाद जैविक उर्वरक, जैविक पेस्टीसाइड व अन्य स्वीकृत जैविक आदानों का उपयोग किया जाता है, जबकि प्राकृतिक खेती में बाहरी निवेशों के बिना प्राकृतिक/आध्यात्मिक तरीके से खेती की जाती है प्राकृतिक खेती को शून्य-बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) के रूप में भी जाना जाता है जिसे पद्दमश्री सुभाष पालेकर द्वारा सुझाया गया है।
प्राकृतिक खेती (ZBNF) ज्ञान विज्ञान व आध्यात्म पर आधारित है। ज्ञानेन्द्रिया से प्राप्त जानकारी/ अनुभव ज्ञान हुआ जो घटित हुआ उसे प्रयोग एवं तार्किक तरीके से समझने को विज्ञान कहते हैं ज्ञान एवं विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं उससे आगे आध्यात्म। प्रकृति के माध्यम से ईश्वर को/उसकी शक्तियों को पहिचानना या अनुभव करना आध्यात्म है।
प्राकृतिक खेती के मुख्य आधार प्रकृति याने पृथ्वी, वायु मंडल ,जल और सूर्य है । प्रकृति ने जीव जन्तु पेड़ पौधे सभी के जीवन यापन की सुदृढ़ व्यवस्था की है। जंगल में खड़े बड़े बड़े वृक्ष बिना मानवीय सहायता के हरे भरे व स्वस्थ रहते हैं यदि इन वृक्षों की पत्तियों का किसी भी प्रयोग शाला में परीक्षण करवाते हैं तो इन में किसी भी प्रकार से पोषक तत्वों की कोई कमी नहीं मिलती इन वृक्षों ने सारे पोषण तत्व प्रकृति से ही लिये है।पेड़ पौधे 98% अपना भोजन / पोषण हवा पानी व सूर्य के प्रकाश से प्राप्त कर लेते हैं शेष 2 % पोषण अच्छी स्वस्थ भुरभुरी मिट्टी में उपलब्ध जीवाणुओं की सहायता से प्राप्त कर लेते हैं। भारतीय दर्शन / अध्यात्म के अनुसार प्रत्येक जीव का शरीर पंच भूत या पांच तत्वौ से बना है पृथ्वी, आकाश,जल, वायु और अग्नि (सूर्य)।आयु पूर्ण करने पर या नष्ट होने पर फिर इन्हीं पांच तत्वौ में विलीन हो जाते हैं जहां से आया वहीं चला गया इस प्रकार यह खाद्य चक्र चलता रहता है।
प्राकृतिक खेती पद्धति में देशी बीज, देशी गाय का गोबर, गौमूत्र , वनस्पति अर्क का उपयोग होता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैसे आच्छादन ( पेड़ पौधों के अवशेष ) जीवामृत के प्रयोग से मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और केंचुओं के माध्यम से पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे बाहरी आदानों पर निर्भरता शून्य या कम होती है।
2- जैविक खेती में उत्पादों के प्रमाणीकरण हेतु तीसरे पक्ष की आवश्यकता होती है जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी उत्पाद को जैविक रूप से उगाया गया है, संसाधित किया गया है, और प्रमाणित किया गया है। यह एक तृतीय-पक्ष सत्यापन प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित करती है कि उत्पाद जैविक मानकों का पालन करता है। यदि कोई कृषक / कृषक समूह/उत्पादक अपने जैविक उत्पाद का निर्यात करना चाहता है तो उसे ,कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण ( एपीडा )
Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है।
जबकि प्राकृतिक खेती में प्रमाणीकरण इसके लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है इस पद्धति में उत्पादक/ किसान व उपभोक्ता का आपसी विश्वास होता है ।
3- जैविक खेती में पोषण हेतु अधिक मात्रा में जैविक/ जीवांश/ कम्पोस्ट खादों व अन्य निवेशों की आवश्यकता होती है जिससे लागत बहुत अधिक आती है जबकि ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती में जीवामृत, आच्छादन से मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं एवं केंचुओं को सक्रिय कर मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है जिसमें लागत बहुत कम आती है साथ ही अन्तरवर्तीय फसलें उगा कर याने मुख्य फसल की लागत का मूल्य सह फसल उत्पादन कर निकालने के प्रयास किए जाते हैं।
जैविक खेती एक विशिष्ट प्रणाली है जो रासायनिक आदानों को हटाती है, जबकि प्राकृतिक खेती एक व्यापक दृष्टिकोण है जो ज्ञान विज्ञान प्रकृति व आध्यात्म पर आधारित है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों और प्रक्रियाओं का उपयोग करके खेती की जाती है।
लेखक वरिष्ठ उद्यान विशेषज्ञ है।







