Thursday, March 19, 2026
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ईमानदार प्रयास इसीलिए दम तोड़ देते हैं…

ईमानदार प्रयास इसीलिए दम तोड़ देते हैं…

By – Rahul kotiyal

पांडवाज़ उत्तराखंड के उन उत्साही नौजवानों के समूह का नाम है जिन्होंने बीते वर्षों में पहाड़ी संगीत को कई पहचान दिलाई है. वो समूह जिसने अपनी रचनात्मकता से पहाड़ियों को वो आत्मविश्वास दिया कि हम गर्व से किसी को दिखा-सुना सकें कि ये है पहाड़ी गीतों का जादू.

 

उनके इसी जादू रचने की कला ने उन्हें वो पहचान भी दिलाई कि उन्होंने प्रदेश ही नहीं, देश भर में अपना नाम स्थापित किया.

 

उत्साही नौजवानों के इसी समूह ने बीते साल एक और अभिनव प्रयास किया. वो प्रयास जो क़ायदे से तो 25 साल के उत्तराखंड में एक परंपरा बन जानी चाहिए थी, लेकिन उसी दुर्भाग्य से नहीं बनी जिस दुर्भाग्य से हमारे पहाड़ों में तमाम अन्य काम नहीं हुए.

 

ये प्रयास था सुदूर पहाड़ी गांव में एक ऐसे क्वॉलिटी म्यूज़िकल फेस्टिवल के आयोजन का जो सिर्फ़ दिल्ली बंबई जैसे महानगरों में ही आयोजित होते हैं. वो भी इस बात का पूरा ध्यान रखते हुए कि ये आयोजन भव्य और विशाल बने लेकिन इसके साथ ही इसका प्रकृति से साम्य भी बना रहे.

 

ऐसे आयोजन के लिए इनके पास संसाधन भले ही सीमित थे लेकिन युवाओं की लगन और पहाड़ से जुनून की हद तक प्रेम के चलते ये आयोजन जब हुआ तो कमाल हुआ. आयोजन का नाम था काफल फेस्टिवल.

 

ये फेस्टिवल दिल्ली, देहरादून या बंबई में होने वाले उन तमाम फेस्टिवल्स से अलहदा है जो सिर्फ़ मुनाफ़ा पीटने के लिए और सरकारी रकम को ठिकाने लगाने के लिए या नेताओं को प्रचार का एक और मंच देने के लिए आयोजित किए जाते हैं.

 

इसकी सबसे अलहदा खूबी तो यही है कि ये उन पहाड़ों में आयोजित होता है, जिन पहाड़ों से हम पहाड़ियों ने ही मुँह मोड़ लिया है.

 

पहाड़ों में हम आज तक न तो राजधानी ले जा सके, न रोज़गार, न स्कूल, न अस्पताल, न डॉक्टर, न अन्य सुविधाएँ… लेकिन इन युवाओं ने ठाना कि जो कुछ भी इनके बस में है, जो संगीत इनकी पहचान है, जिसकी गूंज की जड़ें उन्हीं पहाड़ों से निकली हैं, उसे ये पहाड़ जरूर ले जाएँगे.

 

पहाड़ का ये ऋण हमारे नेता भले बिसरा चुके हों, इन युवाओं ने वो ऋण याद रखा. पहाड़ में एक ऐसा आयोजन किया जो आगे भी क़ायम रहा तो पहाड़ के एक बड़े भूभाग की तस्वीर बदल सकता है.

 

लेकिन आज जब यही युवा इस आयोजन के दूसरे वर्ष की तैयारी में जुटे हैं तो इनके प्रयासों में मदद करने वाला कोई नहीं है. कई महीनों से ये युवा सरकारी विभागों से लेकर निजी संस्थानों तक के चक्कर काट चुके हैं लेकिन ऐसा कोई नहीं है जो इनके प्रयास को सार्थक करने में योगदान को आगे आया हो.

 

कमाल देखिए, पांडवाज़ इतना बड़ा ब्रांड तो हैं ही कि अगर चाहते इस आयोजन को पहाड़ी गांव की जगह देहरादून में करते और हर साल इससे लाखों-करोड़ों कमा ले जाते. लेकिन जब उन्होंने ऐसा करने की जगह एक ईमानदार प्रयास किया पहाड़ों में कुछ रचनात्मक करने का, तो हर किसी ने मुँह फेर लिया. ठीक वैसे ही जैसे इस पहाड़ी राज्य में सबने पहाड़ों से मुँह फेर लिया है.

 

कमाल ये भी है कि हमारी जो सरकार लाखों-करोड़ों रुपये ग्याडूओं को ही बांट देती है, दिल्ली और बंबई और नागालैंड तक कार्यक्रम प्रायोजित कर देती है, उस सरकार में ऐसा कोई नहीं कि पहाड़ में हो रहे इस आयोजन को समर्थन दे सके.

 

उत्तराखंड में ऐसा बिजोग पड़ा है कि यहाँ ईमानदार प्रयास करने वाले एक छोर पर हैं और सरकारी पैसा पुगाने वाले ठीक दूसरे छोर पर. यहाँ ओंतू-झोंतू आयोजन करने वाले सरकार से करोड़ों लौंफिया लेते हैं, लींची के पेड़ पर माल्टे लटकाकर उसे माल्टा फेस्ट कहने वाले मौज करते हैं लेकिन पहाड़ के किसी सुदूर गाँव में एक ईमानदार कोशिश करने वाले बैरंग रह जाते हैं.

 

उत्तराखंड में निजी संस्थानों की भी स्थिति ऐसी है कि यहाँ जब आपदाएँ आती हैं तब भी ये बड़े निजी संस्थान पाँच-दस करोड़ का चेक लेकर आपदा पीड़ितों के बीच नहीं बल्कि मुख्यमंत्री आवास पहुँचते हैं. क्योंकि वो इसकी आड़ में भी अपना हित साधते हैं कि इस रूप में पैसा देकर आपदा पीड़ितों की मदद हो न हो, सरकार से उनके संबंध जरूर इतने मधुर ही जाएँगे कि इसके बदले में दस काम निकाल जाएँ.

 

तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी… इसी मूल मंत्र पर प्रदेश में सब चल रहा है और इसी का नतीजा है कि पहाड़ की जो स्थिति है वो आज भी जस की तस बनी हुई है. इसे बदलने की कोशिश करने वाले भी अंततः मजबूरी में हार मान जाने को अभिशप्त हैं.

 

दुर्भाग्य ये भी है कि क्या इस सरकार की सलाहकार मंडली में कोई इन्हें ये सलाह देने वाला भी नहीं बचा है कि ‘बॉस! फर्जी प्रचार में सैकड़ों करोड़ लगाने के साथ ही थोड़ा बहुत राज्य हित में लगाया जाए तो उससे आर्गेनिक प्रचार मिलेगा.’

 

उत्तराखंड सरकार के मुखिया और उनके नज़दीकियों से आग्रह है कि पांडवाज़ की इस पहल को सार्थक बनाने को अपनी जिम्मदारी की तरह निभाएं. उन्हें हतोत्साहित न होने दें. वो इस प्रयास में विफल हुए तो उनका निजी नुक़सान नहीं होगा, वो इतने प्रतिभावान तो हैं ही कि अपने लिए बहुत-बहुत सार्थक चीज़ें करते ही रहेंगे. लेकिन वो विफल हुए तो पहाड़ से एक और उम्मीद हमेशा के लिए छिन जाएगी, एक और ईमानदार प्रयास दम तोड़ देगा.

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