Saturday, September 12, 2026
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सरकारो की उदासीनता के चलते पौड़ी कमिश्नरी के दिन डूबने की कगार पर।

सरकारो की उदासीनता के चलते पौड़ी कमिश्नरी के दिन डूबने की कगार पर

Pauri
Paudi

अंग्रेजों के जमाने में भी पौड़ी का अपना गौरवमयी इतिहास रहा है। आजादी के बाद भी उत्तरप्रदेश के रहते पौड़ी को कमिश्नरी बनाया गया है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद ऐसा लग रहा था कि पौड़ी के प्राकृतिक सौंदर्य का विकास होगा, पर्यटन का नया डेस्टिनेशन बनेगा। कमिश्नरी मुख्यालय है तो राज्य बनने के बाद पौड़ी के दिन बहुरेंगे। पर राज्य बनने के बाद हुआ इसका उलटा।

ज्ञात हो कि उत्तराखंड सरकार द्वारा राष्ट्रीय खेलो के आयोजन में पौड़ी की पूरी तरह उपेक्षा की गई है। यहां तक कि सांसद और विधायक भी चुप्पी साधे हुए है। परिणाम स्वरूप जनप्रतिनिधि भी अपनी अपनी पार्टी के गुलाम हो चुके है।

अब हालत इस कदर है कि कोई भी जनप्रतिनिधि जनपक्षीय मुद्दों पर पार्टी लाइन से हट कर बोलने का  साहस ही नहीं जुटा पाते है। पौड़ी की अंकिता भंडारी हत्याकांड इसका ज्वलंत उदाहरण है।

गौरतलब हो कि पौड़ी के रासी स्टेडियम पर हाल के वर्षों में 50 करोड़ खर्च करने के बाद भी आगामी राष्ट्रीय खेलो के आयोजन में कोई खेल प्रतियोगिता पौड़ी में नहीं हो रही है। यही नहीं पौड़ी में आयोजन न होने पर बीजेपी के पौड़ी का प्रतिनिधत्व करने वाले नेताओं की उदासीनता के चलते पौड़ी की घोर उपेक्षा पर मीडिया भी चुप है। फलस्वरूप इसके पौड़ी के पुराने टेनिस मैदान को हैरिटेज के रूप में विकसित करने की संभावनाएं भी परवान नहीं चढ़ सकी।

पौड़ी निवासी प्रो गणेश पोखरियाल और पूर्व पुलिस उप अधीक्षक गिरीश बिजलवान, इतिहासकार डॉ० योगेश धस्माना का कहना है कि विंटर लाइन या फिर पौड़ी   शरदोत्सव जैसे आयोजनों से पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पार्किंग पानी और राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार प्रसार के  के लिए आवश्यक कार्ययोजना भी बनाई जानी चाहिए। नगर में बढ़ता अतिक्रमण  इसकी सुंदरता पर दाग लगा रही है। बदहाल सड़के  सड़कों पर बहता सीवर का पानी  दुर्गंध फैला रहा है। आज तक नगर में सीवर लाइन का न बन पाना दुर्भाग्य पूर्ण है।आखिर पौड़ी में पर्यटकों को लाने के लिए आकर्षित कैसे करेंगे। पौड़ी की पुरानी जेल  पर लोक कला संग्रहालय की योजना परवान नहीं चढ़ सकी है। पौड़ी कमिश्नरी को जीवंत बनाने के सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हुवे है। जब नेता ही पौड़ी से पलायन कर गए है, तब अधिकारियों और कार्यालयों को कैसे पौड़ी लाया जा सकता है। पौड़ी का पलायन आयोग का दफ्तर पुनः देहरादून चला गया है,अब तो इसका दफ्तर महज सफेद हाथी बन कर रह गया है।

उल्लेखनीय हो कि राज्य बनने के बाद डीएम, कमिश्नर के अधिकारों पर अंकुश लगा कर कमजोर कर दिया गया है, इसके चलते पौड़ी की जनता ने भी देहरादून की ओर रुख किया है। कारण इसके देहरादून में दबाव और सचिवालय शासन पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। स्वास्थ्य सेवाएं  बदहाल होने से भी पौड़ी से पलायन की रफ्तार बढ़ ही रही है। घोस्ट गांवों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि ने भी सरकार के विकास के दियो की पोल खोल दी है।

तत्कालीन उत्तरप्रदेश के समय में पौड़ी का जो गौरव था, राज्य बनने के बाद वह धूमिल हो गया है। यदि हालात यही रहेंगे तो एक दिन देहरादून केंद्रित विकेंद्रित व्यवस्था से जिलों ओर दोनों कमिश्नरी का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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