कार्बाेहाइड्रेड फाइबर की प्रचूर मात्रा पाई जाती है ‘चीणा’ में
@Prem Pancholi

‘चीणा’ यानि प्रोसो मीलेट मध्य हिमालय की सबसे पुरानी खाद्य सामग्री और फसल है। दरअसल यह ऐसी फसल है कि जब सभी फसले पकने वाली होती है उस वक्त यह फसल आ जाती है। अर्थात चीणा की फसल आने का ही लोागों के जेहन में खुशियां लौटानी होती थी। इसीलिए की जब लोगों की खाद्य सामग्री समाप्त हो चुकी होती है, ऐसे समय में ‘चीणा’ जैसे मोटे अनाज का आना ही लोगों की भूख को समाप्त करना होता है। इस मोटे अनाज से भात सहित आटा पिसवाकर रोटी भी खाई जाती है।
काबिले तारीफ हो कि ‘चीणा’ कोरोना के बाद लोगों को याद आने लग गई। हालांकि ‘चीणा’ का भात और रोटी लोगों की थाली से गायब ही हो गयी हो, मगर पुनः ‘चीणा’ की भारी आवश्यकता जताई जा रही है। शायद यह फसल फिर से लोगों के चेहरे पर ‘ग्लो’ ही नहीं लायेगी बल्कि नगदी फसल के रूप में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करने वाली है। अब तो पूरी दुनियां ‘मीलेट इयर’ मना रही है। अतएव मोटे अनाजो की आवश्यकता आज फिर से महसूस होने लगी है। पहाड़ के मोटे अनाजो में ‘चीणा’ का बहुत ही महत्व है।
ज्ञात हो कि यह जायद की फसल है और मात्र 60 दिन में तैयार होकर आ जाती है। ऐसे वक्त जब लोगों के खाद्य भण्डार भी खाली हो जाते है। उस वक्त ‘चीणा’ लोगों की थाली में पंहुचकर नई ऊर्जा प्रदान करती है। यही नहीं इसकी अच्छी खासी पैदावार भी होती है। बरसात न भी हो तो चीणा अपने नियत समय में आ जाती है। जैसे गेंहूं कटते है, वैसे उसी गेंहू वाले खेत में ‘चीणा’ बोई जाती है। जुलाई अगस्त माह में हर वर्ष मध्य हिमालय में लोगों के पास भोजन की सभी व्यवस्था समाप्त हो जाती थी। ऐसे वक्त ‘चीणा’ की फसल लोगों के आंगन और पेट तक पंहुच जाती है।
चीणा से भात, खिचड़ी, बुखाणा के अलावा गेंहूं के आटे, मण्डवे के आटे के साथ मिलाना इसकी रोटी बहुत ही स्वदिष्ट और सुपाच्य होती है। इसके अलावा यमुनाघाटी में ‘चीणा के आटे’ के असके बनाये जाते थे। असके व्यंजन भी सिर्फ सिर्फ रवांई, जौनपुर, जौनसार में ही बनाये व खाये जाते थे। यही नहीं ‘असके’ नाम से इस घाटी में बाकायदा त्यौहार मनाया जाता है। जिसका नाम भी ‘असक्या त्यार’ होता है। जब भी कोई खास मेहमान आये तो उन्हे भी असके परोसे जाते है। दरअसल ‘चीणा’ का उत्पादन बन्द हो गया तो असके जैसे पौष्टिक पकवान बनने भी लगभग बन्द हो गये है।
चीणा की उपयोगिता

यमुनाघाटी में स्थित 60 बरस से अधिक के उम्रदराज लोगों ने बताया कि चीणा का भात और मट्ठा मिलाकर खाना सबसे अधिक सुपाच्य और दवाई के रूप में भी काम करता है। चीणा अनाज की यहां पर कई प्रकार के उपयोग होते थे। चिकन पोक्स जैसी बीमारी में चीणा का भात और मट्ठा मिलाकर खाना रामबाण इलाज था। इसका भूसा पशुओं के लिए स्वास्थ्य के हिसाब से बहुत ही लाभकारी होता था। अधिक भूसा होने पर इसे खेत में ही जलाकर खाद के रूप इस्तेमाल किया जाता था। चीणा का आटा अन्य आटे में मिलाने से स्वास्थ्य वर्धक होता था। वे कहते हैं कि अब तो कोई ‘चीणा’ बो भी रहा होगा तो मात्र शौकिया के रूप में।
कहा गया कि यह फसल अधिक ऊंचाई और अधिक मैदानी या निचले स्थानो पर नहीं होती है और ना ही इस फसल के लिए बरसात व पानी की आवश्यकता होती है। अर्थात मोटे अनाजो में से ‘चीणा’ अगाती फसल है तथा इसमें सर्वाधिक पोषण तत्व मिलते है। मध्य हिमालय की चीणा के दाने बड़े और मोटे होते है। जबकि दक्षिण मैदानी क्षेत्रो में चीणा के दाने थोड़ा छोटे छोटे होते हैं। बहरहाल देश के दक्षिण प्रदेशो में आज भी यह फसल होती है। मध्य हिमालय में यह फसल लुप्तप्रायः ही हो गई है।
उत्तराखण्ड में चीणा भी श्रीअन्न है
मध्य हिमालय में चीणा की फसल लोग कब से उगाते आये है। इसका कोई लिखा इतिहास नहीं है। बताया जाता है कि सात हजार वर्ष पूर्व यह फसल काकेशिया और चीन में उगाई गई थी। यह भी पुष्ट प्रमाण नहीं है कि चीणा की फसल सबसे पहले कहां उगाई गई होगी। ऐसा भी माना जाता है कि यह फसल मध्य एशिया मे से शेष दुनियां में फैली होगी। नवपाषाण युग में इसे उगाया जाने लगा था। जिसके प्रमाण जोर्जिया में मिलते हैं।
मध्य हिमालय में लोक गीतो में ‘चीणा’ का कई बार जिक्र आता है। इस कारण लगता है कि जबसे हिमालय यानि उत्तराखण्ड में जीवन आया होगा तब से ही यहां चीणा की फसल भी आई होगी। उत्तराखण्ड के भ्रमण करने से मालूम होता है कि यहां के जंगलो मे खेती किसानी के स्पष्ट अवशेष मिलते हैं। जहां आज जंगल उग आये है। सीढीदार खेतो में जंगल जो दिखाई देता है वहीं लोगों ने फसल उगाई होगी। जिसमें चीणा, मण्डुवा, आदि उखड़ी की फसलें आती है। यह इस बात का द्योतक है कि यहां बिना सिंचाई की ही फसल होती होगी। यानि मुख्य अन्नो में यह न्यूनतम पानी मांगती है। इसका पादप चार फिट तक ऊंचा होता है और इसके बीज गुच्छो में उगते हैं। यह बीज पीले, संतरी, या भूरे रंग के होते है। 20 वर्ष पहले कभी चीणा की फसल यमुनाघाटी, बागेश्वर के गरूड़ क्षेत्र, श्रीनगर के पास मलेथा के सेरा में लहलहाती हुई दिखाई देती थी जो आज नहीं दिखाई देती है।
चीणा के अलग अलग रूप
इस फसल को कहीं चेना, कहीं चीणा, कहीं जीना के नाम से जानते है। इसका बोटनिकल नाम पैनीकम मिलिएसिएम (च्ंदपबनउ उपसपंबमनउ) है। जबकि अंग्रेजी में चीणा को प्रोसो मीलेट (च्तवेव डपससमज) मोटा अनाज कहते है। इसमें एंटिबायोटिक पाया जाता है। इसे अलग अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत में भी इसे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। कहीं इसे चुवारा और बारीक चन्ना भी कहते हैं। तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटका में इसका नाम क्रमशः बरागू, चेना, वरिगा, पानी वरागु, आदि नामों से जाना जाता है।
चीणा एक औषधीय फसल
Proso Millet ‘चीणा’ में विविध प्रकार के पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें एंटिबायोटिक पाया जाता है तो वहीं कार्बाेहाइड्रेट, मैग्नीशियम, प्रोटीन, मैगनिज, कैल्शियम, थयामिन, विटामिन, आयरन, फास्फोरस, फाइबर तथा रिबोफ्लेविन पाए जाते है। डॉ खादर वली के अनुसार सौ ग्राम चीणा में नियासिन (B3) 2-3mg, रिबोफ्लेविन B2 0-18mg, थयामिन B1 0-20mg, आयरन / इस्पात 5-9mg, कैल्शियम 0-01g, फास्फोरस 0-33g, प्रोटीन 12-5g मिनरल / खनिज धातु 1-9g, कार्बाेहाइड्रेट 68-9g, फाइबर 2-2g पाया जाता है। जबकि कार्बाेहाइड्रेट फाइबर का अनुपात 31-31 का है। यही नहीं बल्कि ‘चीणा’ का उपयोग खून की कमी दूर करने में भी किया जाता है। जो एनीमिया की समस्या को दूर करने में सक्षम है। चीणा के पकवानो का नियमित रूप से सेवन करने से मानसिक संतुलन ठीक रहता है। साथ ही हाइपरटेंशन, भूलने की बीमारी जैसे समस्याओं से आप निजात पा सकते हैं।







