सरकार व अन्य संस्था हमेशा यथास्थिति की पोषक, बदलाव की दुश्मन होती हैं। ये दोनों ‘दानदाता-प्रभु’ बनकर लोक को तंत्र के नीचे कुचल कर बचे कचरे को लोकतंत्र सिद्व करने की व्याकुलता में छटपटा रहे हैं।…‘चिपको’ का एक संदेश था पर उसे ‘विचार’ के बजाय ‘प्रचार’ का विषय बना डाला गया और ‘प्रचार’ सदा विचार व मित्र दोनों को नष्ट करता है, तोड़ता है।…आज स्थिति यह है कि व्यवस्था इतनी असंवेदनशील, क्रूर और निकृष्ट हो चुकी है कि बड़ी से बड़ी तपस्या, कष्ट, विपदा का भी उस पर जरा भी असर नहीं पड़ता। जनता में संवेदना है, पर उसके पास तो जाना ही हमने छोड़ दिया है।’’(पृष्ठ-90)
‘लोकचक्षु’ पुस्तक कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा की आत्मकथा है। यह पुस्तक 1998 में लिखी गई और उनके निधन के बाद यह 2007 में प्रकाशित हुई। देश और विशेषकर उत्तराखण्ड में सर्वोदय आन्दोलन के मर्म को समझने में यह महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तक है। इसके साथ ही 20वीं शताब्दी के उत्तराखण्ड की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक करवटों और उनसे उपजी सलवटों को जीवन्तता से यह किताब सार्वजनिक करती है।
जनपद-टिहरी (गढ़वाल) के साबली गाँव को उत्तराखण्ड हिमालय की काशी माना जाता है। इसका अभिप्राय साबली गाँव के ग्रामीणजनों की उच्च विöता से है। वर्तमान में इसे संस्कृत ग्राम की लोकप्रिय पहचान मिली है। धन-धान्य से परिपूर्ण इसी साबली गाँव में 3 जेष्ठ संवत 1987 (प्रमाण पत्रों में 11 जनवरी, 1931) में प्रसिद्ध सर्वोदयी चिन्तक और शिक्षक कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा का जन्म हुआ था।
कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा टिहरी रियासत के विद्रोहियों में रहे हैं। राजाज्ञा का विरोध करने के कारण उन्हें टिहरी छोड़नी पड़ी। उस समय वे हाईस्कूल के छात्र थे। स्वाध्याय के बल पर उन्होने काशी विद्यापीठ से उच्च शिक्षा ग्रहण की। अनेक महाविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं में उन्होने अध्यापन कार्य किया। सर्वोदयी विचारक विनोबा भावे के आवाह्न पर वे सर्वोदय आन्दोलन से जुड़े। पवनार आश्रम (वर्धा) में रहकर उन्होने भू-दान कार्य के साथ-साथ ‘मैत्री’ एवं अन्य पत्रिकाओं का सम्पादन किया। इस दौर में वे सर्व सेवा संघ, गांधीवादी शिक्षकों के संगठन ‘आचार्यकुल’ के संस्थापक सचिव और आर्चायकुल पत्रिका के संपादक रहे। उत्तर-प्रदेश सर्वोदय संघ के वे अध्यक्ष रहे। पुरानी टिहरी में ठक्कर बाबा छात्रावास की स्थापना, निर्माण और संचालन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। हिन्दी और अंग्रेजी में नियमित लेखन के साथ ‘बुनियादी तालीम’, ‘भारत की एकता-अखण्डता’ और ‘लोकचक्षु’ (आत्मकथा) उनकी चर्चित प्रकाशित पुस्तकें हैं। देश के अन्य भागों के साथ उत्तराखण्ड में कई पदयात्राओं में वे शामिल रहे।
कामेश्वर बहुगुणा जी का निधन 02 नवम्बर, 2006 को उनके निवास, गुमानीवाला (ऋषिकेश) में हुआ।
साबली, चमोल गाँव और किमसार (डाँडामंडी-पौड़ी गढ़वाल) में कामेश्वर जी का बचपन बीता। बचपन में रामलीला के इस लोकप्रिय कलाकार को रामचरित मानस, सुखसागर और अमरकोश ने प्रारम्भिक धार्मिक दृष्टि दी। किशोरावस्था की नाजुक समझ को गाँधी विचार ने एक अन्य सार्थक जीवनीय दृष्टि प्रदान की। समाज में व्याप्त जातीय भेदभाव, अशिक्षा और टिहरी रियासत की निरंकुशता ने किशोर कामेश्वर को ढण्डकी (बगावती) स्वर और आचरण की ओर प्रेरित किया।
किताब के प्रारम्भिक हिस्से में किशोर से युवा हो रहे कामेश्वर के सामाजिक चेतना को दिशा देने वाले घटनाक्रमों यथा- टिहरी रियासत में प्रवेश करने पर पौन टोंटी टैक्स, राज पुत्र के जन्मोत्सव का चन्दा एवं पशुबलि का विरोध, वामपंथी साहित्य से जुड़ाव, श्रीदेव सुमन, प्रजामण्डल एवं कांग्रेस से नजदीकियाँ, जन जागरूकता एवं जन-आन्दोलनों में सक्रियता, 15 अगस्त, 1947 के दिन का टिहरी और उसके बाद का घटनाक्रम, काॅलेज और रियासत से निष्कासन, अभावों के साथ विकट पारिवारिक घटनाक्रमों में भी अध्ययनशील, सकलाना एवं डाँगचैरा के आन्दोलन, 11 जनवरी, 1948 का कीर्तिनगर गोलीकाण्ड, नागेन्द्र सकलानी और भोलू भरदारी की शहादत, 14 जनवरी, 1948 को टिहरी रियासत का अंत, दादा दौलतराम का प्रजामण्डल सरकार का प्रधानमंत्री बनना, टिहरी राज्य विधानसभा चुनाव में सक्रियता, 1 अगस्त, 1949 टिहरी का उप्र राज्य में शामिल होना आदि घटनायें तथ्यों और विश्लेषण के साथ उल्लेखित है।
महत्वपूर्ण है कि कामेश्वर जी प्रताप कालेज, टिहरी (1946-51) में अध्ययन के दौरान सहपाठी विद्यासागर नौटियाल के साथ कम्यूनिस्ट प्रचारक देवीदत्त तिवाड़ी और वामपंथी साहित्य के प्रभाव में थे। बाद के वर्षों में विद्यासागर नौटियाल साम्यवादी और कामेश्वर बहुगुणा सर्वोदयी विचारक के रूप में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए।
‘‘…हम तीन घने दोस्त थे, मैं, विद्यासागर नौटियाल और विद्यानाथ नाम का एक हरिजन छात्र। वह बहुत बढ़िया चित्रकार भी था। एक दिन न मालूम कैसे मैस के रसोइये को मालूम हो गया कि हमारे साथ बैठकर भोजन करने वाला विद्यानाथ हरिजन है…उसने उसे वहाँ पर साथ बैठकर खिलाने व उसकी थाली साफ करने से मना कर दिया।…हमने ही हाॅस्टल छोड़ना तय कर लिया। कालेज के पास ही एक पुराना छूटा-टूटा सा दुमंजिला मकान था…हमने उसके तीन कमरे साफ किये और वहाँ डेरा डाल दिया। उसके बाहर दीवार पर ‘गेरुवे’ से लिख दिया- ‘ठक्करबापा छात्रावास’।…इस तरह ठक्करबापा छात्रावास की नींव पड़ी जो टिहरी की रचनात्मक संस्था के रूप में अभी भी कार्यरत है।’’ (पृष्ठ-13)
‘‘…गुरु जी ने शासकीय आदेश सुनाया कि हम दोनों (मैं और विद्यासागर नौटियाल) का काॅलेज से ‘रस्टिकेशन’ कर दिया गया है। ‘सवरसिव एक्टीविटी’ का गंभीर आरोप है। हम इस शब्द का अर्थ नहीं समझे तो उन्होने बताया तोड़-फोड़ करना, हिंसा फैलाना इसका अर्थ है।…कागज पर मेरे व पिताजी के हस्ताक्षर ले लिये गये। यह मेरा ‘देश निकाला’ था। अब तो घर पर रहना असंभव हो था। सो यह तय हुआ कि मैं ऋषिकेश रहूँ तथा माँ को भी आँख के इलाज के लिए वहीं ले जाऊँ। सो माँ अपने 6 माह के बच्चे को लेकर मेरे और पिताजी के साथ ऋषिकेश आ गई। वहाँ अस्पताल के नाम पर कुछ नहीं था। हमने एक कमरे के कोने पर डेरा डाला व माँ का इलाज शुरू हो गया।…परन्तु वहाँ क्या इलाज होता, उन्होने आँख निकालकर फेंक दी। लगभग एक माह रुक कर पिताजी माँ को लेकर घर चले गये। मेरा लौटना संभव नहीं था।…’’(पृष्ठ-17)
‘‘…टिहरी आजाद हो चुकी थी। महाराज सुलह के लिए टिहरी आए किन्तु पुल बंद था, उन्हें शहर में नहीं घुसने दिया गया क्योंकि शहर में जमा 20-25 हजार की गुस्से में भरी जनता न मालूम क्या कर बैठती? अंततः राजा को अपनी राजधानी में प्रवेश न मिलने से उसी वक्त वापस लौट जाना पड़ा। मुझे टिहरी आते ही पता चला कि हमारे प्रिंसिपल श्री भगवंतराम जी, जिन्होने अभी पाँच माह पहले ही मुझे काॅलेज से निष्कासित किया था भी घर में कैद कर लिए गए हैं। हमने तुरन्त प्रजामण्डल के नेताओं से कहा-‘आपको हमारे प्रिंसिपल की सुरक्षा करने की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, आप उन्हें मुक्त कर दें, हम छात्र उनकी सुरक्षा की गारंटी देते हैं। प्रिंसिपल साहब पर से प्रतिबन्ध हटा दिया गया।’’(पृष्ठ-19)
तत्कालीन समाज में हाईस्कूल के छात्र कामेश्वर और साथियों की छुआछूत और जातीय विभेद का विरोध करना एक दुष्कर कार्य ही था। टिहरी की आजादी के दिन संयम के साथ स्थितियों को अराजक होने से रोकने की उनकी दूरदर्शी समझ आज भी हतप्रद करती है। सत्ता हस्तातरण के इस सत्याग्राही तरीके पर महात्मा गाँधी ने कहा कि ‘‘टिहरी जितनी ऊँचाई पर बसी है वहाँ की जनता का सत्याग्रह उतना ही ऊँचा है।’’
‘…माँ को विश्वास नहीं हो सका कि राजा का राज खत्म हो गया है। वो पहले कहती थी, ‘अरे वे हमारे बोलादाँ बद्री हैं, उनके विरुद्ध बोलना भी पाप है, तुम्हें दीवार पर सिर नहीं मारना चाहिए, तुम्हारा सिर ही फटेगा, दीवार नहीं टूटेगी। पर यह असंभव संभव हो गया है, उन्हें इसका विश्वास होता भी कैसे?’ (पृष्ठ-20)
टिहरी रियासत के समाप्त होने के 77 साल बाद भी माँ का उक्त वक्तव्य सच के करीब है। वो बोलादाँ बद्री आज भी टिहरी का राजनैतिक नेतृत्व उसी राजशाही अन्दाज में कर रहा है। टिहरी रियासत का मात्र आवरण ही तो हटा है।
कामेश्वर जी ने उच्च शिक्षा हेतु 1951 में डीएवी काॅलेज, देहरादून में प्रवेश लिया। दिसम्बर, 1951 में विनोबा भावे की देहरादून, विकासनगर और ऋषिकेश यात्रा में शामिल होते हुए वे सर्वोदयी आचरण को आत्मसात कर भू-दान आन्दोलन से जुड़ गए। वे इस विचार की ओर अग्रसर हुए कि भूमि के न्यायपूर्ण सामाजिक वितरण से सर्वोदय की अवधारणा को फलीभूत किया जा सकता है। जुलाई, 1952 में डीएवी काॅलेज, देहरादून की पढ़ाई छोड़ उन्होने बनारस काशी विद्यापीठ में उच्च अध्ययन के लिए प्रवेश लिया।’’
जून, 1954 में काशी विद्यापीठ से स्नातक की पढ़ाई के बाद कामेश्वर जी टिहरी आकर पूर्णतः भूदान और नशाबंदी आन्दोलन से जुड़ गए। उनका यह विचार परिपक्व हुआ कि ‘गाँधी को समझने के लिए विनोबा को पहले समझना होगा।’ उस दौर में उत्तराखण्ड में अधिकाँश सामाजिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता सर्वोदयी आवरण में रही। परिणामतया, 1954-57 मात्र 3 वर्षों में ही सर्वोदयी प्रयासों से टिहरी-उत्तरकाशी क्षेत्र से 1100 नाली भूमि दान की महत्वपूर्ण उपलब्धि को हासिल किया जा सका था। (उल्लेखनीय है कि इसी दौर में गंगोत्री के निकट का मुखबा गाँव और उसके बाद संपूर्ण उत्तरकाशी जिला सर्वोदय आन्दोलन के भू-दान में शामिल हुआ था।)
इसी दौरान, वर्ष- 1955 में टिहरी (गढ़वाल) जनपद की केमर पट्टी के सिल्यारा गाँव में ‘पर्वतीय नवजीवन मण्डल’ जिसे ‘सिल्यारा आश्रम’ के नाम से जाना गया की स्थापना की गई। इसके संस्थापकों में सुन्दरलाल बहुगुणा, विमला बहुगुणा, कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा, धर्मानन्द नौटियाल, वीरेन्द्रदत्त सकलानी, शंकरदत्त डोभाल तथा सत्यशरण असवाल की मुख्य भूमिका रही।
सरला बहन संस्था बनाने के पक्ष में नहीं थी। उनका मानना था कि‘… संस्थाएं ‘वास्तविक कार्य’ में बाधक होती हैं। यह फिर कुछ का व्यवसाय बन जाता है।’ फिर भी हमने संस्था बनाई पर साल डेढ़ साल में ही हम लोग बिखर गए। आज यह संस्था है पर कार्य नहीं है। इन्हीं दिनों कई बातें हुई जो आज याद करने पर सोच में डाल देती हैं। सिल्यारा आश्रम की स्थापना के पीछे सुन्दरलाल जी की गृहस्थी जमाना भी था, इसमें हम लोग सहायक ही थे। यह शादी सरला बहन की मर्जी के विरुद्ध हुई क्योंकि वे विमला को नहीं छोड़ना चाहती थी और यदि परिस्थितियाँ करवट न लेती तो सरला बहन कौसानी आश्रम का दायित्व संभवतः विमला को देती।’’(पृष्ठ-31)
कामेश्वर जी 1954-57 तक उत्तराखण्ड में विभिन्न सामाजिक कार्यों में योगदान देते रहे। इसी मध्य उन्होने अशोक आश्रम, कालसी के संयोजन में उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अध्ययन किया। स्वामी तपोवन महाराज से हुई भेंट के बाद उनका यह संदेश कि ‘समझ और लगन से सामाजिक जीवन में सक्रिय रहो परन्तु उसमें फंसो नहीं! खुद को उससे अलग रखो!’ को उन्होने जीवनीय ध्येय सूत्र बनाया।
कामेश्वर जी की धर्मपत्नी सुमनलता जी बालवाड़ी, पडियार गाँव में अध्यापिका और कौसानी आश्रम में अध्ययनरत रही। प्रेमसुमन जी की शिक्षा-दीक्षा सरला बहन के संरक्षण में कौसानी आश्रम में हुई थी। राधा बहन और विमला बहुगुणा उनकी सहपाठी रही। प्रारम्भ में वे शिक्षिका रही। वर्तमान में वे पारिवारिक उत्तरदायित्वों के साथ सर्वोदयी आन्दोलन में यथा-संभव सक्रिय हैं।
कामेश्वर जी उच्च अघ्ययन हेतु 1957 में पुनः काशी विद्यापीठ आये। यहाँ से एम.ए.एस. की उपाधि 1959 में उन्होने ग्रहण की। इसी वर्ष मंदार विद्यापीठ, भागलपुर में अध्यापन के साथ संथालों के जीवन पर अध्ययन किया। उसके बाद सतीशचन्द्र महाविद्यालय, बलिया में 1959-62 तक समाजशास्त्र के विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
कामेश्वर जी जहाज के पंछी की तरह पुनः 1962 में टिहरी आकर रामतीर्थ विद्या मंदिर के प्राचार्य हो गए। इस बीच वे चुनावी राजनीति में भी सक्रिय रहे। उसके अनुभव बहुत कडुवे थे। जल्दी ही उससे मोहभंग हो गया। वे पुनः अपने सहज मार्ग सर्वोदय के कार्यों के लिए समर्पित हो गए। इस दौरान उन्होने (1961-63) ‘टिहरी-उत्तकाशी निगरानी समिति’ के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।
टिहरी को 1965 में उन्होने फिर विदा कहा। केन्द्र सरकार और सर्व सेवा संघ (सर्वोदय का राष्ट्रीय संगठन) के सौजन्य से पंचायती राज में प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षक और प्रकाशन सहयोगी के रूप में मई, 1965 से जून 1969 तक मध्य प्रदेश में कार्य किया। उसके बाद 1969 से विनोबा आश्रम, बिहार से संचालित ग्रामदान-पुष्टि अभियान का जिम्मा उन्होने लिया। इस दौरान जयप्रकाश नारायण के ‘आमने-सामने आन्दोलन’ में भी भागीदारी की। विनोबा आश्रम से मार्च, 1972 में वापस वाराणसी और कुछ समय बाद सेवाग्राम (वर्घा) में ‘नई तालीम समिति’ (हिन्दुस्तानी तालीम संघ) के मंत्री और ‘नई तालीम’ पत्रिका के सम्पादक बनाये गए। ‘नई तालीम इतिवृत’ पुस्तक इसी दौरान उन्होने लिखी।
मध्यप्रदेश और बिहार के विकट और बीहड़ क्षेत्रों में 10 सालों (1965-75) तक सर्वोदयी कार्यों को करते हुए अनेकों खट्टे-मीठे अनुभवों से कामेश्वर जी गुजरे। उस दौरान उभरे नक्सलवाद, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे और रेनू मजूमदार का सानिध्य, सेवाग्राम एवं पवनार आश्रम की गतिविधियाँ, 1972 का छात्र आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का पूरे देश में फैलना, 1975 का आपातकाल, विनोबा का मौन व्रत और अनुशासन पर्व तथा उससे पनपा जयप्रकाश नारायण और बिनोबा भावे के बीच विचारों के आपसी द्वन्द्व को इस किताब के जरिए समझा जा सकता है।
जून, 1975 में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण कामेश्वर जी सेवाग्राम (बिहार) से गुमानीवाला (ऋषिकेश) में आकर खेती और शिक्षा में नित्य नये प्रयोगों के लिए समर्पित हो गए। उनका दृड मत था की आज की खेती और शिक्षा के तौर-तरीके हमें अपने ही देश में विदेशी बना रही है। भारतीय परिवेश और चिन्तन के अनुकूल कुदाल-कलम का यह सहयोग-समन्वय उनके साथ ता-उम्र रहा।
सामाजिक जीवन में सक्रियता के गहन अनुभवों के साथ वे 1975 के बाद शराबबंदी, सहकारी श्रमिक, चिपको-पर्यावरण संरक्षण, नशा नहीं रोजगार दो, अयोध्या आन्दोलन, राज्य निर्माण, अस्कोट-आराकोट अभियान और कई पद-यात्राओं में सक्रियता से शामिल रहे।
उनका मत था कि ‘इन आन्दोलनों एवं प्रयासों की शिथिलता अथवा असफलता ‘विचार-स्तर’ के कारण नहीं विचार को ‘व्यक्तिगत-स्वार्थ’ बनाने से उत्पन्न हुई है। चिपको के अवसान के जिम्मेदार इसके स्वयंभू नेता उपाधियाँ-सम्मान बटोर-बटोर कर सरकार के कथित सलाहकार बन गए। इस लालसा का गाँधी और विनोबा के रचनात्मक विचारों और कार्यक्रमों से कोई दूर-दूर का नाता नहीं था। सामाजिक सरोकारों में उनकी भागेदारी बस मुखौटा बनकर ही रह गई।
यह प्रवृत्ति उत्तराखण्ड हिमालय और जनजीवन के लिए दुर्भाग्यपूर्ण त्रासदी बनी। नतीजन, विकास के नाम पर जो कुछ भी हासिल हुआ उससे सुविधापूर्ण बाजार तो मजबूत हुआ लेकिन समाज की स्थानीयता कमजोर होती गई है।’
यह किताब कामेश्वर जी की जीवनीय यात्रा के माध्यम से विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण, प्रभावती, मीरा बहन, सरला बहन, रेनू मजूमदार, आचार्य नरेन्द्रदेव, सुन्दरलाल बहुगुणा, मानसिंह रावत, विमला बहुगुणा, धर्मानन्द नौटियाल आदि के सार्वजनिक जीवन के कई रोचक और प्रेरक प्रसंगों से हमें परिचित कराती है। इससे इन सामाजिक नायकों के श्रमसाध्य, असहज और विकट परिस्थितियों में किए गये समर्पित जन-सेवा के प्रयासों और कार्यों की महत्वा को समझा जा सकता है।
‘‘वो बोली-देखो! मैं 60-65 साल की बुढ़िया इतना कष्ट उठा रही हूँ, और हमारे नौजवान क्या कर रहे हैं? जिस देश में वृद्धों को इतना कष्ट उठाना पड़े और नौजवान मस्ती में झूमते रहें तो ऐसे देश का भविष्य क्या हो सकता है? मैं समझ तो गया पर क्या जवाब देता? सरला बहन को इसी तरह मैंने फिर बहुत वर्षों बाद म.प्र. के चम्बल के बीहड़ोें में भटकते देखा, जब वे अपने आश्रम से दुःखी होकर वहाँ डाकू-पुर्नवास के काम से घूम रही थी।’’(पृष्ठ-32)
‘‘…टोली में एक विदेशी (ईसाई) बहन भी थी। केदारनाथ के पंडों ने उन्हें मंदिर में प्रवेश देने से मना कर दिया। जयप्रकाश नारायण ने कहा-‘तो वे भी दर्शन नहीं करेंगे। हम लोगों ने बहुत कोशिश की पर पुजारी नहीं माने। अंत में जे. पी. बिना दर्शन किए लौट गए।’’(पृष्ठ-35)
‘‘अन्न-विहीन क्षेत्रों में सामाजिक कार्य करते हुए एक दिन किसी अत्यन्त गरीब युवती का यह प्रश्न ‘‘भाई! तुम रोज-रोज सजने-धुलने तथा सफाई में लगे रहते हो तो तुम लोग काम कब करते हो? खाना कहाँ से खाते हो? यह प्रश्न मानव-जीवन व सभ्यता के भविष्य का शाश्वत प्रश्न है..’’ (पृष्ठ-46)
‘‘गाँधी जी का यह कथन आज भी चरितार्थ है ‘‘मैं जिस भारत के निर्माण का सपना देखता हूँ उसके लिए मुझे अपने ही लोगों के विरुद्ध संघर्ष शुरू करना पड़ेगा और मैं जानता हूँ कि वह संघर्ष अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए संघर्ष से भी कहीं अधिक तेज और कठिन संघर्ष होगा।’’(पृष्ठ-110)
विडम्बना है कि आज इसी दौर से हमारा समाज गुजर रहा है!…
पुस्तक- लोक चक्षु (एक साधारण एवं सजग लोकसेवक के संस्मरण)
लेखक- कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा
संस्करण- प्रथम, 2007, पृष्ठ- 124, मूल्य- ₹ 60/-
प्रकाशक- विद्यावती प्रकाशन, नैनीताल-263001
विशेष- कामेश्वर प्रसाद बहुगुणा जी के सुपुत्र और मित्र मुकेश प्रसाद बहुगुणा (शिक्षक एवं व्यग्यंकार) को इस पुस्तक से भेंट कराने हेतु हार्दिक धन्यवाद!
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