Saturday, September 12, 2026
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सत्य घटना (टायलेट – एक ब्लेम गेम ) के संस्मरण बता रहे है वरिष्ठ स्तंभकार राकेश मोहन थपलियाल

सत्य घटना (टायलेट – एक ब्लेम गेम )

By – Rakesh Mohan Thapliyal 

डांडों पड़िगे ह्युं ,ठंडु ह्वेगी मेरा मुलुक म ,ये पंक्तियाँ भले ही राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकरजी या दद्दा मैथलीशरण गुप्त ने न लिखी हों लेकिन हमारे पहाड़ के सिरमौर, गढ़रत्न कवि श्री नरेंद्र सिंह नेगीजी ने एक गीत गाकर ,बाहर के लोगों को एक सलाह अवश्य दी है कि, “ हे बेटा ,हे भुला – मेरी डांडी –कांठयों का मुलक जैलु त बसंत ऋतु म जैई ”, क्योंकि यदि दिसंबर – जनवरी में जाएगा, तो तेरा खून जम जाएगा और क्योंकि तुझे जादा ठंड की आदत नहीं है तो फिर क्या होगा ?- बेटा ब्लड – प्रेशर का नली फटके ब्रेन हैमरेज होकर या फिर ठंड के मारे हार्टफेल होकर उधर ही मर भी सकता है।

अब ये मत कहना मेरे लाटा कि – रहने को तो लोग क्या उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव में नहीं रहते हैं, तो उनकी बात और है मेरे काला और तू सियाचनवालों की देखादेखी या सिकासर न कर ।

तू इस चक्कर में बिलकुल मत रह कि, पहाड़ में जाकर बरफ की 2-4 तस्वीर खींचेगा और फिर हमारे स्थानीय, स्वर्गीय, प्रकृति –प्रेमी, राष्ट्र-कवि, छायावादी, माननीय सुमित्रानंदन पंतज्यू की तरह इस सिचुएशन पर 1-2 कविता लिखेगा और फेसबुक में पोस्ट कर देगा ।

तेरे लिए पहाड़ और बरफ के क्या मायने हैं कि, नैनीताल या मसूरी की सड़कों पर काला चश्मा, लाल स्वेटर,नीली-जींस, सफ़ेद-स्कार्फ और ब्लैक-शूज पहनकर टहल रही सैलानी —- जिनके पीछे –पीछे टहलते हुए कोई छोरा गुनगुनाता है, “ छोड़ द्रुमों की म्रदु छाया ,बाले तेरे व्योम जाल में कैसे उलझादूं लोचन ” ? उनके लिए बर्फ, मौज और मस्ती है ।

पहाड़ की यह घटना इससे थोड़ा अलग है, हटके है। वह 11 साल पहले की, जाड़ों की एक अलसाई सुबह थी, सुरसुरी ठंडी हवा के झोंकों के साथ. आँगन में धूप, पत्तों से छनकर आ रही थी और लोग कह रहे थे “ठिंडी”,भारी ठिंडी और बदन में भी ठण्ड के मारे कंपकपी, झुरझुरी हो रही थी । फर्श पर चप्पल उतारकर नंगा पैर न रखा जाए और पानी में हाथ लगाने का और धूप का दामन छोड़कर कमरे में जाने का मन न हो ।

ये दिन, सुबह – शाम, दिनभर, घाम तापने के दिन थे दिन थे साथ ही स्वेटर –टोपी–मफलर पहनने -लपेटने के साथ –साथ पंखी लपेटने के भी दिन थे ।रात में कंबल और रजाईयों को ओढने का मौसम ।

सर्दी के उस मौसम में,उन दिनों, मामा का घर मेरा आश्रय –स्थल था । यह घर खाडी में मोटर–रोड के ठीक ऊपर बना था ,जहाँ सुबह 4-5 बजे से लेकर रात 10-11 बजे तक लगातार मोटरों की टी-टीट, प्वां-प्वां की आवाजें आती रहती थी । सड़क में दिनभर खूब चहल –पहल रहती थी. मोटर –रोड के नीचे कई दुकानें थी— चाय की दुकानें, राशन- परचून की दुकानें थी और उनके नीचे एक पहाड़ी छोटी नदी “ हेंवल नदी ”, कल-कल ,छल-छल करके बहती रहती थी ।

नदी के ऊपर एक पुल था और पुल दूसरे छोर पर ही सड़क दो भागों में विभक्त हो जाती थी. एक सड़क नागणी -चंबा की ओर और दूसरा रस्ता गजा रोड की शुरुआत थी । यहाँ बहुत सी जीपें गजा जानेवाले मुसाफिरों की इंतजार में खड़ी रहती थी । यहाँ पर भी सड़क से सटी चाय –पानी ,मिठाईयों की कई दुकानें थी, जहाँ सुबह से ही आलू की पकोड़ियों की महक आनी शुरू हो जाती थी । हमारे पहाड़ में चाय के साथ पकोड़ी और सेळ ही हमारे मुख्य स्नैक्स होते हैं कुछ लोग सूखे रस और गोल बंद भी खाते हैं।

मामा के घर की निचली मंजिल के कमरों में दो सेट थे ,जिनमें किराएदार रहते थे । उनमें एक सहायक ग्रामीण विकास अधिकारी भी था और उसका कमरा, उसका रेजीडेंस कम ऑफिस भी था .।कमरे के बाहर बरामदे में एक बड़ी टेबल बिछी थी ,जिसके दाएं-बाएं 3-4 कुर्सियां बिछी रहती थी ।

टेबल पर फ़ाईलें रख देने के बाद टेबल दफ्तर बन जाती थी और जब काम ख़तम हो जाता था या दफ्तर बंद करना होता था तो फ़ाईलें कमरे के अंदर लेजाकर, अलमारी में रखदी जाती थी । यह मिनी दफ्तर, खुल जा सिम-सिम और बंद हो जा सिम-सिम की तर्ज पर खुलता और बंद होता था ।

ग्रामीण विकास अधिकारी का परिवार ऋषिकेश शहर में रहता था ऊपर से वह या शायद उसकी माँ भी थपलियाल थी और तीसरा उसे लगता था कि, भाई साहब उसे या तो शाहरुख़ खान का किस्सा सुनाएंगे या फिर प्रियंका चोपड़ा का । उसके साथ गपशप मारने में मुझे सरकारी खोज-खबर मिल जाती थी कि ,कहाँ क्या चल रहा है ।

खाडी, लगभग एकदम ग्राउंड जीरो के लेबल पर संकरी नदी घाटी में बसा एक 40-50 घरोंवाला छोटा सा क़स्बा था मगर यहाँ रौनक और खूब चहल -पहल खूब रहती थी और जब से यहाँ से गजा रोड चालू हुई है , खाडी के चेहरे-मोहरे में काफी निखार आ गया है लेकिन नागणी के पत्यूड़ टाईप पकोड़े या आगराखाल के छोले, ,रबड़ी,पिंडालू, भूणी जैसी कोई खासियत नहीं है थी। इसलिए ऋषिकेश से आने –जानेवाली बसें ,यहाँ मुसाफिरों को उतारने-चढ़ाने के अलावा ,बाकी रूकती नहीं थी लेकिन यह गजा जाने-आने वाली बसों या जीपों का पहला पड़ाव है ।

तो उस दिन का किस्सा ऐसा है कि, उस दिन सुबह 9 बजे के करीब विकास अधिकारी महोदय कमरे के अंदर उसे ठीक करने में व्यस्त थे और मै बाहर बड़ी टेबल पर अख़बार फैलाकर उसे पढ़ रहा था । इतने में एक आदमी साहब की तलाश में आया और उसे किसी कागज़ पर साब के दस्तखत चाहिए थे ,उसने मुझसे साब के बारे में पूछा तो मैंने साब को आवाज दी कि, “ भुला बाहर कोई आया हुआ है ”. साब ने कमरे के दरवाजे पर आकर झाँका और उसे थोड़ी देर 5-4 मिनट इंतजार करने को कहा ।

वह धूप में खड़ा होकर ,बीड़ी सुलगाकर घाम तापने लगा , साब तैयार होकर बाहर आए तो उस व्यक्ति ने जेब से कोई फार्म निकाला और साहब को उस पर एक साईन करने को कहा , साहब ने पूछा पैनकार्ड और आधार है तेरे पास ? उस आदमी ने कहा हाँ है । साहब ने कहा दिखा तो वह बोला कि , “साहब, वो तो मैं साथ में लेकर नहीं आया ”, साहब ने कहा , तो ठीक है ,जा पहले जाकर आधार लेकर आ फिर मै दस्तखत करूंगा । उस आदमी ने साहब से बहुत अनुनय विनय की पर साहब न तो रत्तीभर पसीजा और न ही टस से मस हुआ । अंत में वह आदमी निराश होकर चला गया ।

मुझे उस आदमी और उसकी हालत पर बड़ा तरस आया पर मै उनकी बहस के बीच में चाहकर भी नहीं बोला ,उस व्यक्ति के जाने के बाद मै चले गए व्यक्ति से सहानुभूति प्रकट करते हुए बोला ,“ अरे यार भुला, तूने कर देना था यार साईन ।

वह बोला भाईजी, आपको नहीं पता कि, कितने हरामी हैं ये लोग , सालों ने नौकरी खा दी थी मेरी । आप बस एक मिनट रुको और वो अंदर जाकर , 2 कप चाय छानकर ले आया ।

वह बोला, भाईजी आपको स्वच्छ भारत अभियान के बारे में तो पता ही होगा ? तो सरकार ने कहा कि, कर्मचारियों जाओ, गाँव -गाँव में जाओ और टायलेट बनाओ, लोगों को प्रेरित करो , अनुदान दो और गरीबों के घर / बस्ती में तो मुफ्त में ही टॉयलेट बनाकर दो ।

भाईजी मैंने भी जोश में आकर ,अपने क्षेत्र के अलाने -फलाने गाँवों में इतने टायलेट बनाए कि, विभाग में मेरा नाम रोशन हो गया , साहब लोगों ने कई बैठकों में मेरा नाम लिया, उदाहरण दिया और कई वरिष्ठ अधिकारियों ने व्यक्तिगत रूप से मुझे बधाई भी दी ।

एक दिन, एक उच्च महिला अधिकारी किसी मीटिंग के बाद नई टेहरी से देहरादून वापिस जाते हुए, खाडी में रुकी और सड़क पर गाड़ी खड़ी करके, यहाँ मेरे इस दफ्तर में पधारी । वह चाय पीते हुए बोली, “ सुना बड़ा अच्छा काम कर रहे हो तुम इस फील्ड में ? तो चलो जरा हमें भी दिखाओ ,हम भी तो देखें ” ?

मैंने ख़ुशी-ख़ुशी कहा, क्यों नहीं मैडम ,चलिए और मै उनकी जीप में सवार होकर ,3-4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, मोटर हेड के नजदीक के एक गाँव की ओर चल पड़ा। हमारे साथ में 3-4 अन्य लोगों का काफिला भी था ।

हम लोग गांव में पहुंचे तो वहां हलचल मच गई , हम पहले प्रधानजी के घर गए, उनको साथ में लिया और एक टायलेट के पास पहुँच गए. टायलेट के प्लास्टिक के दरवाजे के बाहर एक ताला जड़ा था । खैर आसपास पूछकर उसकी चाबी मंगवाई । मै आगे बढ़कर ताला खोलने लगा और सब लोग मेरे आजू-बाजू आकर खड़े हो गए । दरवाजा खोला, तो भाईजी अंदर झांककर मेरे तो होश फाख्ता हो गए ।

अंदर खाली गड्ढा ही गड्ढा नजर आ रहा था और ऊपर की फ्लश सीट गायब । साहब ने देखा तो पूछा ? क्या है ये ? मेरी तो, “ काटो तो जैसे खून नहीं ”, जैसी हालत हो गई ।

फिर मैंने चंद घर आगे जाकर एक दूसरी टायलेट खुलवाई तो
उसका भी वही हाल । साहब की तो खोपड़ी सटक गई , गाँव में एक तीसरी टायलेट खुलवाई तो भाईजी उसका भी वही हाल । अब तो मैडम आगबबूला हो गई और मुझे तो चक्कर आने लगे , मैडम बोली , कैसे काम कर रहे हो तुम , नौकरी कर रहे हो मिस्टर या मजाक । ऐसे काम करते हो तुम लोग ?

वो तो अच्छा हुआ कि, उन्होंने वहीँ खड़े-खड़े सस्पेंड नहीं किया । पूरे माहौल में मुर्दनी छा गई और सबके चेहरों पर मातम पसर गया . मैडम गुस्से में पैर पटकते हुए चली गई और अगले दिन मुख्यालय आने को कह गई ।

दरसल में होता क्या था भाईजी कि, हम टायलेट बनाने के बाद बाकायदा 5-4 लोगों के सामने उसका उद्घाटन करते , उसकी फोटो खींचते और फाईनल पेमेंट का चेक देते हुए उसकी भी फोटो खींचते और मुख्यालय को उसकी सप्रमाण -रिपोर्ट भेजते और रेकार्ड रखते । इस प्रकार एक के बाद एक टायलेट बनती चली गई और जो टायलेट हमने एक बार हैंड ओवर करदी तो फिर उसको दुबारा देखने जाने की क्या जरुरत थी ?

और ये गाँववाले साले हमारे भी बाप निकले और हमारा चूतिया बनाते रहे और पिछली टायलेट की सीट उखाड़कर अगली टायलेट में लगाते रहे और भुगतान लेते रहे और अनुदान पचाते रहे और हो गया विकास ?

वो तो भाईजी अच्छा हुआ कि, मेरी नौकरी नहीं गई ? अब समझे आप कि पूरी ईमानदारी से काम करने के बाद भी अच्छा और आशातीत परिणाम क्यों नहीं आता ?

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