Sunday, September 13, 2026
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गांव की दमदार पैरवी करती पुस्तक “तुझे लौटना होगा”। पढ़े यहां

शहर पर सवाल, गांव की दमदार पैरवी करती पुस्तक “तुझे लौटना होगा”।

By – Prem Pancholi

तुझे लौटना होगा कितना भावनात्मक शब्द है। मनुष्य में कोई ऐसा नहीं होगा जो इस शब्द से दूर रहा हो। इसी शब्द के आस पास ही उत्कृष्ट शिक्षक, उद्घोषक, लेखक राघवेंद्र उनियाल ने एक कविता लिख डाली और नाम भी यही दिया कि “तुझे लौटना होगा”।

दरअसल यह कविता संकलन नहीं है बल्कि एक लंबी कविता है। जो बार बार गांव को याद करती है, गांव की सभी अच्छाइयां बताती है, गांव का वह सुकून जिसे ढूंढने हर शहरवासी गांव की तरफ आते है। लौट जाते है तो सिर्फ गांव को याद करते है। जैसे पलायन हो गया, या शहर से अच्छा तो गांव समाज है अथवा शहर तो मरा हुआ होता है आदि आदि। इन्हीं मनोभाव को राघवेंद्र उनियाल कृत यह कविता पुस्तक प्रस्तुत कर रही है।

पांच सौ पंक्तियों में लिखी गई यह लंबी कविता शायद उत्तराखंड के साहित्य में पहला प्रयास हो सकता है। हरिवंश राय बच्चन की “मधुशाल” इसी तरह की लंबी कविता है। पर राघवेंद्र उनियाल ने इतनी लंबी कविता नहीं लिखी सिर्फ पांच सौ पंक्तियों को लिख कर यह बताने की कोशिश की गई कि लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहना होगा। प्रवास में रहकर रोने से भला यही है कि तुम लौटकर आओ। इसलिए वे इस कविता की पहली पंक्ति में लिखते हैं –

“जहां कंक्रीट का जंगल है, वह शहर है। जहां वृक्ष, लताओं, फल, फूलों का जंगल है वह गांव है”।

हमे अब यह तय करना ही होगा कि पलायन या शहर कोई समस्या नहीं है। समस्या यदि है तो हमारे सोचने और समझने की।

इस कविता पुस्तक में कई उतार चढ़ाव भी देखे गए। कई बार कविता एकदम आवेश में आ जाती है, कई बार कविता समझाने में महारथ हासिल कर लेती है। समझाने का तात्पर्य यहां कविता की उन पंक्तियों से है जहां कविता शहर को सिर्फ परिस्थितिजन्य मानती है, जबकि गांव निवास को जरूरी मानती है। इस तरह के संबधो पर कविता की एक पंक्ति बताती है –

“जहां रिश्तों एवं संबंधों का कोई मान न हो, वह शहर है। जहां रिश्तों एवं संबंधों पर अभिमान हो, वह गांव है”।

गांव की एक एक कतरन को जोड़ने वाली यह कविता पुस्तक इस राज्य में नया प्रयोग ही कहा जाएगा। यदि शहरवासी इस पुस्तक को पढ़ेंगे तो उन्हें एक बारगी यह उनके विपक्ष में लिखी गई कविता हो सकती है। बहरहाल यह पुस्तक इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती कि शहरवासी इस पुस्तक को पढ़कर क्या कहेंगे। अर्थात पुस्तक की एक एक पंक्तियां इसी भावना से लिखी गई है। कवि, कविता की अगली पंक्ति में स्पष्ट कर देते हैं कि –

“जहां पर मम्मी, डैडी, अंकल, आंटी रिश्तों के बोल हों, वह शहर है। जहां मां, बाबा, चाचा, चाची रिश्तों के बोल हो, वह गांव है”।

कविहृदय ने अपनी इस लंबी कविता में यह बताने का खूब प्रयास किया है कि गांव में परस्परता है जिसे शहरवासी को स्वीकार करना ही होगा। सच में शहर से परस्परता की अपेक्षा करनी गुनाही ही है। अगली पंक्ति में कवि ने बताने की कोशिश की है कि –

“जहां फाटक में ताले और कुत्तों से सावधान लिखा हो, वह शहर है। जहां खुले खलियान और खुले दरवाजे हों, वह गांव है”।

इस कविता पुस्तक की बारीकियों पर गौर करेंगे तो कविता हमे एक बार गांव तक खींचकर ले ही आती है। मगर हर कार्य गांव में संपन्न हो जाए यह मुनासिब नहीं है। इसलिए गांव की बात सच्ची है, पर जीवन के संचालन में गांव तक सीमित रहना कितना कारगर है यह पुस्तक बताने में असमर्थता करती है। कटु सत्य यह है कि गांव में डर – भय की कोई गुंजाइश नहीं है और शहर में डर भय सर्वव्यापी है। शहर में लोक दिखावा आदि आदि जैसी व्यवस्था खूब परोसी जाती है। गांव में इन बातों के लिए कोई जगह ही नहीं है। परन्तु यह कविता यही कह रही है कि कहीं भी रहें, पर अपनी जड़ों को सींचते रहें। इस कविता को पढ़ने से लगता है कि अब शहर भी गांव बनने वाले है। शहर सिर्फ बाजार ही रह जाएंगे। सब बाजारवासी हर तीज त्यौहार के दौरान गांव में ही रहेंगे। इस तरह अपने आगे बढ़ती है, बताती है कि यदि यह संभव हो पाता है तो गांव के “लोक देवता” भी सम्मानित होंगे। वरना गंदी नालों के किनारे बने कीत्रिम मंदिर में नकली अबादा पहनकर नकली दुवा मांगेंगे।

कविता की खूबसूरती यही है कि नकली दुवाएं जहां है वहां नकली अस्पतालो की भरमार भी है। अतएव गांव में अस्पताल हों, मगर गांव के लोगों को अस्पताल की जरूरत ही कम होती है। अब कविहृदय राघवेंद्र उनियाल इससे भी आगे लिखते है कि –

“जहां वन्य जंतुओं के दीदार हेतु अजायब घर होते है, वह शहर है। जहां वन्य जंतुओं का दीदार स्वच्छंद घूमते होता है, वह गांव है।” कवि अब अपनी कविता की धार को और पैनी करते हुए लिखते हैं कि – “जहां थैलियों में पैक रसायन युक्त दूध दही मिलता हो, वह शहर है। जहां गाय की थनों से दुहा हुआ ताजा दूध मिलता हो वह गांव है”।

उल्लेखनीय यही है कि यह कविता पुस्तक गांव का हर बखान करने से नहीं चूकती है। प्रेम, द्वेष, ईर्ष्या और आपसी भाईचारे में गांव की खूबसूरती को कविता हूबहू प्रस्तुत कर रही है। कहना न होगा कि यह पहली पुस्तक है जो गांव और शहर का तुलनात्मक विश्लेषण करती है। यह भी कविता की पंक्तियां कह रही है कि शहर में हर त्यौहार बाजार का रूप ले लेता है। इधर कविता की एक लाइन यह भी कह रही है कि शहर में पाखंड, अंधविश्वास अधिक बढ़ रहा है। इस पंक्ति पर पाठक कवि से सवाल पूछ रहे हैं कि तंत्र, मंत्र और पाखंड यानी अंधविश्वास के लिए हमेशा गांव बदनाम रहे है। दूसरी तरफ यदि देखा जाए तो कवि ने इस पंक्ति को इसलिए उद्घृत किया होगा कि गांव की अपेक्षा शहर में धार्मिक उन्माद सर्वथा सुनाई देता हो। पर ऐसे कई सवाल यह कविता पुस्तक पाठकों के लिए छोड़ देती है।

68 पृष्ठों में अंकित यह कविता पुस्तक वर्तमान के वैश्वीकरण पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है। पांच सौ पंक्तियों की एक लंबी कविता के बाद इस पुस्तक पर तीन छोटी छोटी कविताएं – तुमसे प्रश्न, गांव की पुकार और शहर की पुकार शीर्षक से लिखी गई है। कवि ने जब पांच सौ पंक्ति वाली कविता से शहर पर सवाल खड़ा किया है तो शायद कवि को स्पष्टीकरण के लिए इन छोटी छोटी कविताओं की जरूरत पड़ी। शहर की पुकार शीर्षक वाली कविता में कवि लिखते हैं कि शहर इस वक्त एक प्रसव पीड़ा के दर्द से गुजर रहा है, शहर कराह रहा है कि उसकी छाती पर कंकड़ पत्थर कूठे जा रहे है। उसका हर भरा गात अतिक्रमण और दोहन का शिकार हो चला है। इसलिए वे लिखते हैं कि – “अमृत उगलने वाली धरती, कर रही विष का हुंकार,
सुनो जागो!
अब भी नहीं चेतोगे तो सिर्फ होगा हाहाकार”।
जबकि तुमसे प्रश्न वाली शीर्षक कविता से कवि पाठकों से खुद के लिए प्रश्न करवा रहे है।

छंदबद्ध यह कविता पुस्तक एक अनोखी कही जाएगी जो कभी भी अपने गांव से बाहर नहीं निकल पाती है और बेबाकी से शहर से अच्छी गांव की खूबसूरती बताती है। सवाल करती है, दुत्कारती है और बार बार उत्प्रेरित करती है कि गांव तुम्हारे दीदार करने के लिए तैयार है। अर्थात तुझे लौटना होगा।


……………………………
पुस्तक – तुझे लौटना होगा
लेखक – राघवेंद्र उनियाल
प्रकाशक – विनर पब्लिशिंग कंपनी, घोसी गली देहरादून।
मूल्य – 90 रु०
आवरण – मुकुल बडोनी

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