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कभी-कभी दूसरे व्यक्ति को खड्ड में गिरने से बचाना अपने लिए खड्ड खोदने जैसा साबित हो जाता है। वो भी तब जब वो व्यक्ति इस बात से अनजान हो कि वो गलत रास्ते पर है और उसे रोकने की कोशिश में वो आपको अपना शत्रु समझ आप ही पर हमलावर हो जाए।
करीब चार वर्ष पहले की बात है। बुलन्दशहर-मेरठ से पहले काशीपुर और फिर देहरादून आकर बसे, ट्रांसफर-पोस्टिंग की दलाली करने वाले एक कथित समाजसेवक सफेदपोश ने पति से अलग रह रही स्त्री और उसके बच्चों के साथ सहानुभूति का ढोंग करके उसे ऐसा प्रभावित किया कि वह उस पर अंधविश्वास करने लगी। अपना एटीएम तक उसे दे दिया, गाड़ी भी खरीद कर दे दी।

स्त्री होने के नाते मैंने उसे समझाया कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं को मजबूत करे और संभव हो तो पति के साथ बातचीत कर मसला सुलझाए।
पहले तो वह समझ गई किंतु फिर श्रीमान समाजसेवी ने उसके मस्तिष्क में यह भर दिया कि मैं तो खुद समाजसेवी की दीवानी हूँ और डाह में उस स्त्री को जुदा करना चाहती हूँ।
विडंबना यह कि खुद को उत्तराखण्ड और पहाड़ का लाल कहने वाले जिस कुकुरमुत्ता नेता जी से मैंने सहायता करने का अनुरोध किया वह भी समाजसेवी के षड्यंत्र में सम्मिलित हो गया।
पहाड़पुत्र ने ऊंची पहुंच, मीडिया और राजनीतिक संपर्कों के लालच में मेरठ के ठग को अपना गुरु/मार्गदर्शक बना लिया था।
जब यह निश्चित हो गया कि स्त्री मूर्खता के अन्धबिंदु पर है और किसी भी तरह नहीं समझेगी तो मैंने उसे समय के हाथ छोड़ दिया।
अब सुना है वर्तमान स्थिति यह है कि समाजसेवी नरकावरोही हो चुका है। उसके फोन में स्त्री के चैट वग़ैरह को पब्लिक करने का डर दिखाकर अब उसकी पत्नी ‘समाजसेवी’ बन गई है और उस स्त्री से लाखों की वसूली कर चुकी है।
उधर पहाड़पुत्र अपना उल्लू सीधा कर किसी पार्टी का प्रवक्ता बन लोकल टीवी चैनलों पर दहाड़ रहा है।
समाजसेवी के पास समाजसेवा के सबूत के तौर पर मीडिया में छपवाई गईं खबरों की कटिंग्स और कुछ फोटो थीं जिन्हें लोगों को दिखा-दिखा कर वह नए संपर्क बनाता और आगे का रास्ता साफ़ करता जाता था।
सोच रही हूँ नौकरी-किसानी छोड़ कोई चोखा बिजनिस शुरू कर दूँ! क्या कहते हैं दोस्त/दोस्त्याणियों?
मुझे एनवायरमेंटलिस्ट/वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर/एंथ्रोपोलोजिस्ट बन जाना चाहिए कि नहीं बन जाना चाहिए?







