Sunday, September 13, 2026
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यात्रा अनुभव : गांव में खेती बाड़ी को बनाए रखना बेहद कठिन हो चुका है – राठ क्षेत्र की महिलाएं।

By Dr Arun kuksal

‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा’- भाग-01
दूधातोली, राठ और नयार
20 अप्रैल, 2025

‘‘आपौ जनम चैता मैना ह्वै होळु, तभि आपौ नाम चैतसिंह च।’’ (आपका जन्म चैत के महीने हुआ होगा, इसीलिए आपका नाम चैतसिंह है।) मैंने बातचीत का शुरुआती सिरा पकड़ना चाहा है।

‘‘हां, सै बोळि आपन, तबारि जै मैना जु व्है, वू हि वैकु नाम।’’ (हां, सही बोला आपने, उस काल में जिस महीने जो हुआ, वही उसका नाम।) हुक्के की एक लम्बी सौड़ (कश) को बीच में ही रोकते हुए चैतसिंह के चेहरे पर फक्क से मुस्कराहट आई है।

‘‘अब त नाम इ नाम च, काम ह्वै चा न ह्वै, बजार गौं म ऐ गि अर गौं फुण्ड बजार म जाणा छन। हम भैरे चीज क मज्जा लीण सीख्यि गंया अर अपणा सल्लि स्य बणाई कु आनंद भूळण लग्यां छां…’’(अब तो नाम ही नाम है, काम हो या न हो। बाजार गांव में आ गया और गांव दूर बाजार में जा रहा है। हम बाहर की चीज का मजा लेना सीख गये हैं और अपने हुनर से बनाई का आंनद भूलते जा रहे हैं…’’ चैतसिंह नेगी बातचीत के फुलफाॅम में आ गये हैं।

गढ़वाल हिमालय के दूधातोली क्षेत्र के अन्तर्गत ढाईजूली पट्टी, पौड़ी (गढ़वाल) के घुलेख गांव (2000 मी.) में हम हैं।

दूधातोली का अर्थ दूध की तोली/बर्तन है। दूधातोली क्षेत्र को उत्तराखण्ड हिमालय का हरा समुद्र/पानी की मीनार/पामीर और जलवायु नियंत्रक भी कहा जाता है। दूधातोली जलागम लगभग 4000 वर्ग किमी. में पौड़ी, चमोली और अल्मोड़ा जनपद का एक संयुक्त क्षेत्र है। इसका उत्तरी हिस्सा चमोली, पूर्वी क्षेत्र अल्मोड़ा और दक्षिण-पश्चिम भाग पौड़ी (गढ़वाल) जनपद में शामिल है। दूधातोली के उत्तरी दिशा में अधिक घना जंगल होने से उसे ‘हरियाली डांडा’ कहा जाता है। इस इलाके की इष्ट देवी/कुल देवी ‘हरियाली देवी’ है। वन, जल, खनिज, धन-धान्य से भरपूर इस इलाके में कई हिम शिखर श्वेत मुकटों की तरह शोभायमान हैं। कभी यहां लोहा और तांबे के लिए बहुत प्रसिद्ध था। उत्तराखण्ड के जननायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने दूधातोली को स्वीजरलैंड से भी खूबसूरत मानते हुए भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार को सन् 1960 में दिया था। उनकी इस मांग पर सर्वे भी हुआ था।

मुख्यतया दूधातोली जलागम क्षेत्र से पांच गैर हिमानी नदियां यथा- पश्चिमी रामगंगा, पूर्वी नयार, पश्चिमी नयार, आटागाड और वीनू जन्म लेती हैं। पश्चिमी रामगंगा उत्तराखण्ड हिमालय की सबसे बड़ी गैर हिमानी नदी है। इन नदियों की मछलियां देश-दुनिया में बहुत प्रसिद्व हैं। यह उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड के 40 प्रतिशत भूभाग और बसासत की जीवंतता भूमिगत नदियों पर निर्भर है।
दूधातोली को सामाजिक दृष्टि से राठ बहुल क्षेत्र कहा जाता है। राठ क्षेत्र में पूर्वी और पश्चिमी नयार नदी का अधिकांश जलागम है। नयार नदी को नादगंगा, नारदगंगा, रथवाहिनी, नवालिका आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

राठ शब्द की उत्पति पर विभिन्न मत हैं। राठ क्षेत्र के जागरों के विराम में अक्सर जागरी यह गाता है ‘चलि जान्दु मि अपणि कालि धौलि राठ’ अर्थात अब मैं अपनी काली और धौली राठ को चला जाता/जाती हूं। (काली और धौली दूधातोली की ही स्थानीय जल-धाराओं का नाम है।) कहा जाता है कि पैठीनश गोत्र के राठी राजा (राहू) जिसकी राजधानी पैठाणी थी के नाम पर इस क्षेत्र का नाम राठ पड़ा। देश एक मात्र आठवीं शताब्दी में निर्मित राहू मन्दिर इसी पैठाणी में है। थलीसैण विकासखण्ड की पट्टी चैपड़ाकोट, चैथान, ढाईज्यूली, कण्डारस्यूं और पाबौ विकासखण्ड की वाली कण्डारस्यूं पट्टी को मिला कर राठ बना है। इसे पंचपट्टी राठ कहा जाता है। इस प्रकार मुख्यतया थलीसैण और पाबौ विकासखण्ड की वाली कण्डारस्यूं पट्टी का संयुक्त भू-भाग राठ क्षेत्र माना जाता है। वैसे, दूधातोली क्षेत्र का नाम राष्ट्रकूट से राठ भी है। विशेष जलवायु और भौगोलिक स्थिति के कारण यहां उत्तम किस्म के भेड़-बकरियों की ऊन और भांग की पैदावार होती है। ऊन और भांग के रेशों को कातने/बुनने में प्रयुक्त रहट/चर्खा की अधिकता के कारण इसे राठ कहा गया। वर्तमान में, सम्पूर्ण राठ क्षेत्र को ओबीसी का दर्जा हासिल है। जिसका श्रेय राजनेता गणेश गोदियाल को है।

राठ क्षेत्र के ढाईजूली पट्टी के इस अंतिम छोर पर विराजमान घुलेख गांव में आज हम दोपहर बाद पहुंचे हैं। पहाड़ी के माथे पर विराजमान 65 परिवारों के इस गांव की खेती-किसानी और आत्मीयता हमें अंचभित करती है। गांव की समृद्धता और हम मेहमानों के प्रति आत्मीयता का आधार यही खेती-किसानी है। मन-मस्तिष्क में विचार आता है कि समृद्धता ग्रामीणों में अपनापन आत्मसात करती है और शहरियों में शान-ओ-शौकत। शाम के 6 बजने को हैं। ज्यादातर लोग घर पर नहीं हैं, उनके घर खुले या उनमें सांकल लगी है। कुछ घरों पर केवल बच्चे और बूढ़े ही हैं। सयाने लोग छानियों (पशु आवास) या खेतों से वापस आ रहे हैं। बारिश का अंदेशा है इसलिए उनकी चाल में तेजी है। हम अजनबियों की ओर उनकी प्रश्नवाचक निगाहें हैं।

चैतसिंह के आंगन में जो बातचीत जारी है उसका सार यह है कि गांव की खेती-बाड़ी को बनाये रखना दिन-प्रति-दिन कठिन होता जा रहा है। पशुपालन तो विगत 3 दशकों में 50 प्रतिशत ही रह गया है। गोठ प्रथा बंद हो गई है। यद्यपि गांव का हर खेत आबाद है परन्तु उनमें पैदावार साल-दर-साल कम होती जा रही है। कुछ ही दशकों पूर्व गांव के लोग कपड़ा, नमक और गुड़ ही बाजार से खरीदते थे। आज राशन भी खरीदने लगे हैं। खेती और पशुपालन के प्रति स्थानीय युवाओं में अरुचि पनपने लगी है। वे जीवकोपार्जन के लिए खेती-किसानी के बजाय दिल्ली-देहरादून में नौकरी करना चाहते हैं।

ग्रामीण बताते हैं कि जाड़ों में बर्फ से लक-दक रहने वाले घुलेख गांव में अब साल-दर-साल नाममात्र की बर्फ गिरती है। तेजी से होते जलवायु परिवर्तन के कारण स्थानीय वनस्पतियां विलुप्त हो रही हैं और नए तरह के खरपतवार दिखाई दे रहे हैं। हर साल फसल चक्र गड़बडाने की स्थिति में रहता है। कभी इस गांव के चारों ओर घना जंगल था। तब उसमें अकेले जाना बहुत जोखिम भरा होता था। सरकार ने ग्रीन फाॅरेस्ट के नाम पर गांव के इन सिविल वनों को भी अपने आधिपत्य में ले लिया। जिससे इन वनों में ग्रामीणों के परम्परागत हक-हकूक कमजोर हो गए हैं। साथ ही, चीड़ के पेड़ों ने अपनी घुसपैठ करके उसके घनेपन को कम कर दिया है। जंगल में चारे-पत्ती के लिए अन्य गांव वालों के साथ कहा-सुनी और गम्भीर विवाद भी होने लगे हैं।

सकारात्मक बात यह है कि ग्रामीणों ने कम होते जंगलों को रोकने के लिए नए मिश्रित जंगल विकसित किये है। वन विभाग से उचित तालमेल करते हुए ये जंगल पूरी तरह से ग्रामीण प्रबंधन द्वारा उपयोग में लाये जा रहे हैं।

‘‘सर, मेरा चिन्तन इस ओर ज्यादा नहीं है कि गांव की तरक्की किस तरह हो? मेरी चिन्ता यह है कि हमारे पूर्वजों की कई पीढ़ियों के निरन्तर कठिन परिश्रम से हासिल गांव की उद्यमीय विरासत को कैसे बचाया जाए।’’ फौज से रिटायर्ड सैनिक रामसिंह नेगी ने कहा है। संयोग से मेरा चिन्तन भी इसी ओर है।

घुलेख गांव के ऊपरी हिस्से से उतरते हुए मेरी निगाह पूरे गांव, उसके खेतों और जंगल की ओर स्वतः ही चली जा रही है। आज का घुलेख गांव अब मुझे विगत शताब्दी में 70 के दशक का अपना चामी गांव नज़र आने लगा है। तब उसमें भी रुमक (देर सांय) होते ही सारे गांव में बच्चों, सयानों और बुजुर्गों की हड़बड़ी भरी चहल-कदमी दिखाई देती थी। दशकों बाद गांव की वह चहल-पहल आज यहां दिखाई और महसूस की है।

छितराया हुआ घुलेख गांव के घर एक मंजिला ही बने हैं। तेज हवा और हिमपात इसका प्रमुख कारण रहा है। पत्थरों पर की गई नक्काशी बेहद आकर्षक है। भीतरी कमरों के बाहर बने बराण्डों को भी लकड़ी के तख्तों से ऊंचाई तक ढ़का गया है। जंगली जानवरों से बचाव इसका कारण बताया गया है।
सरपंच, वीरसिंह नेगी के घर बतौर मेहमान हम यात्रा साथियों का आज रात्रि विश्राम है। वन विभाग के दो स्थानीय अभिकर्मी उनके घर पर पहले ही पहुंच चुके हैं। दूधातोली रेंज एक संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए उस ओर जाने वालों पर सरकार विशेषकर वन विभाग की नज़र रहनी स्वाभाविक है।

इन्हीं वनकर्मियों की निगरानी और गाइडेन्स में कल से हमारी पैदल यात्रा की शुरुआत होनी है।

दिन-भर की हाड-तोड़ मेहनत को रात्रि काल में किसी न किसी के घर पर लोकगीत-नृत्य से सहजता से विराम देना ग्रामीण जीवन की स्वाभाविक उत्सवधर्मिता है। इसी के तहत मेहमानों से भरे इस घर के चौक में ग्रामीणजनों के झोड़ा और चौफुला-

‘बिंगरैली खुट्यों ल मोर नाचिं, ऊंची-नीची डाडिंयों म मोर नाचि…
नै डाली पैयां जामी, क्वी दूध चढ़ौदा…

देर रात्रि में ही लोकगीत-नृत्य विराम पर पहुंचे हैं।

यात्रा के साथी- जयदीप रावत, प्रेम बहुखण्ड़ी, सागर बिष्ट, सुमेर चन्द, यश तिवारी…

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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