
मैंने अभी अभी सुशील उपाध्याय का नवीनतम उपन्यास ‘सुनो सबरीना ‘ पढ़ कर समाप्त किया है। इस शानदार पुस्तक के लिए मैं अपनी प्रशंसा व्यक्त करना चाहती हूं। निस्संदेह यह उत्कृष्टतम, बेहद निर्भीक, अत्यंत सत्य निष्ट, और सहृदय पुस्तक है। मुझे पूरा विश्वास है कि जब हम स्त्रियों के प्रति सहानुभूति से नहीं चुनौतियों से देखना शुरू करेंगे, तब सारे ईमानदार और बौद्धिक लोग कृतज्ञतापूर्वक इस लेखक का नाम लेंगे।
उपन्यास की शैली के अनेक उपांग होते हैं। लय, प्रवाह,सुर, शब्दावली और रचना-विन्यास। सुनो सबरीना में सभी उपांग अपनी-अपनी भूमिका में पूर्ण हैं। उपन्यास दूसरे देश उज्बेकिस्तान की समाज व्यवस्था का एक तीक्ष्ण चित्र दिखाता है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने नये साहित्य से मांग की थी कि “उसमें उच्च चिन्तन हो, स्वाधीनता की मांग हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करें, सुलाए नहीं, क्योंकि अब ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है” इस कथन को भी यदि आधार बनाउं तो भी यह सच है कि उपन्यास सोने नहीं देता।
जारीना और सबरीना उज्बेकिस्तान की सच्ची स्त्रियां हैं। वहां स्त्रियों के संदर्भ में कयी कुप्रथाएं हैं। जबरन नसबंदी, अपहरण विवाह, और तस्करी। प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में महिलाएं आत्महत्या करती हैं। उपन्यास में यह बात कयी बार की गई है “आपको पता है, हम दुनिया के सबसे ग़रीब मुल्कों में से एक हैं। हमारे पास रूसियों द्वारा बनाए गए एक लाख से ज्यादा मकान हैं, हम पढ़े-लिखे हैं और आजादी भी है। पर हम अमीर लोगों के लिए रेड लाइट एरिया में तब्दील हो रहे हैं, उज्बेक लड़कियों को ले जाते हैं, फिर आते हैं और नयी लड़कियों को ले जाते हैं। ये है उज्बेकिस्तान का नया चेहरा। ये ताशकंद की नई सूरत है।”
अब उज्बेकिस्तान में पांचों वक्त अजान सुनाई पड़ती है। सोवियत राज में सब पर पाबंदी थी। सुशांत ताशकंद दक्षिण एशियाई भाषा एवं संस्कृति विभाग में भाषण देने गया है। बाद में समरकंद भी जाना है।
कुशल लेखक ने कार की खिड़की से हमें ताशकंद दिखा दिया और घटनाओं के ताने-बाने से सामाजिक उठापटक। सबरीना के बहाने मंद मंद संगीत भी बह रहा है, उपन्यास में।
सुशांत ने तो सीधे ही कह दिया मेरे साथ हिन्दूस्तान चलो सबरीना। सबरीना का उत्तर उसके चरित्र का उजला पक्ष है।
उपन्यास का घटनाक्रम बहुत कसा हुआ सा नहीं है, सुशांत के व्यक्तित्व के अनुरूप ही सरल ही है। परन्तु घटनाएं तेजी से बदलती रही हैं। असल में लेखक सारा देखा और समझा हुआ पाठक के पास भेज देना चाहता है। सबके आदरणीय प्रोफेसर तारीकबी की दुर्घटना में मृत्यु को खूब विस्तार से लिख कर लेखक ने उज्बेकों के चरित्र की शुचिता भी दिखाई है।
थोड़ा, भाषा पर बात
उपन्यास लिखने का मतलब अपने पात्रों के साथ रहना है। लेखक उनकी कल्पना करता है, वे सजीव होने लगते हैं। पात्र लेखक को धीरे-धीरे अपने तरीके से मोड़ कर, तोड़ कर प्रयोग करने के लिए विवश करने लगते हैं। ठीक यहीं पर लेखक की प्रतिभा सामने आती है। उपाध्याय जी शिक्षक हैं उनके व्यक्तित्व की छाप भाषा पर स्पष्ट है। उनकी भाषा श्रेष्ठ कथावाचक की भाषा है। चतुर और संवादी। उनकी भाषा संकेतों की भाषा नहीं है बल्कि जिसका चित्रण किया जा रहा है उसकी भाषा है। सरल और स्पष्ट। शब्दों का कौन-सा क्रम-प्रबंध वाक्य में सबसे अधिक भावात्मक शक्ति पैदा कर सकता है, लेखन ने इसका ध्यान रखा है। ठीक वैसे ही जैसे कक्षा में पढा़ते हुए एक एक शब्द को तोल कर बोल रहे हों। रचना की गुणवत्ता की परख भविष्य से होती है। रचना कालजयी हो। मुझे विश्वास है।
(मैंने भी उज्बेकिस्तान की यात्रा की ही है। अपने अनुभव फिर कभी – dr savita mohan)







