एक पत्रकार का कॉकटेल के विरोध में जन अभियान ::
वरिष्ठ पत्रकार और समाजसेवी भारत चौहान इन दिनों उत्तराखंड में नशा के विरोध आंदोलनरत है। उनका कहना है कि कमसे कम शादियों में कॉकटेल जैसी अप संस्कृति पर प्रतिबंध लगे। उन्होंने यह भी सलाह दी कि कॉकटेल का खर्चा सिर्फ व सिर्फ लोक दिखावा के लिए किया जाता है, जो आगे चलकर ईर्ष्या में तब्दील हो जाता है।

उल्लेखनीय हो कि उत्तराखंड के जानेमाने पत्रकार और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष के सूचना अधिकारी रहे भारत चौहान गांव गांव जाकर शादी से पहले मेंहदी के नाम पर काकटेल में लाखों रुपए खर्च न करे की अपील कर रहे है। उन्होंने बताया कि राज्य के जौनसार बावर समाज में शादियों के अनेक रूप हैं। कॉकटेल एक आयातित रूप है जो समाज को बांटने का कार्य कर रहा है। वे वर्तमान समय में शादियों के विकृत रूप से दुखी है। जिसे वे भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं मान रहे है। जब देखा – देखी में शादी से पहले मेहंदी की रस्म में ही शराब और कबाब पर लाखों रुपए लुटाए जाते हैं तो यह अच्छा संदेश नही है।
वे बहुत हैरान है कि राज्य का जौनसार बावर जनजाति क्षेत्र है। यहां के लोग सरल, सादगी से लबरेज है और यह क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा हुआ रहा है। जबकि यहां की सांस्कृतिक धरोहर, रहन-सहन और रीति रिवाज राज्य के अन्य समाज से अलग थे। उनका मानना है कि यह सभी मान्यताएं बनी रहें। जब इस क्षेत्र को अन्य समाज से अलग जनजाति का लाभ दिया जाता है और इस लाभ को प्राप्त करने के लिए समुदाय किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं तो समुदाय को परंपराओं से पृथक नही होना चाहिए। इसलिए जनजाति समुदाय में कॉकटेल की कोई गुंजाइश नहीं है। यह समुदाय जब बाहरी समाज की देखा – देखी में में खुद को बदलना चाहता है यही दुर्भाग्य है।
उन्होंने कहा कि शादी विवाह में कॉकटेल का बेहूदा रिवाज जौनसार बावर जनजातीय समुदाय में जो आ रहे हैं वह अच्छे संकेत नहीं है। वे बता रहे है कि जनजाति समुदाय में एक तपका ऐसा है जिन्हें अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या में रोजी-रोटी कपड़ा और छत तक ही नसीब है। जबकि बाहर के जनजातियों में यह सब नहीं हैं। इसलिए वे विवाह से पहले मेहंदी की रस्म में बेइंतहा खर्च को उचित नहीं मानते है।
वे चिंतित है कि विवाह के मौसम में राजधानी से जुड़े बाजार व कस्बे जैसे विकासनगर, हरबर्टपुर, जीवनगढ़ आदि के वेडिंग पॉइंट ऐसे गुलजार रहते हैं जैसे मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। जितना खर्च शादी में होता है उससे अधिक खर्च यहां मेहंदी की रस्म में हो रहा है।
उन्हे एक बात जरूर अच्छी लगी कि मेहंदी की रस्म में जौनसार बावर जनजाति समुदाय की महिलाएं अपने पारंपरिक परिधान में उतरती है। जिसे वह संस्कृति के संरक्षण और प्रचार प्रसार का अच्छा प्रयास कह रहे है।
उन्होंने दुखी मन से बताया कि विगत वर्ष विकासनगर क्षेत्र में जौनसार बावर के लोगों ने करीब 100 करोड़ से अधिक रुपया शादी में खर्च किया था। उनका सुझाव है कि इस धनराशि में से यदि कुछ अंश निकाल कर उस नवदंपति के लिए कोई रोजगार खड़ा करने में लगा देते तो निश्चित रूप से उस नवदंपति जोड़े को भविष्य के लिए एक रोजगार का आधार मिल जाता।







