Sunday, September 13, 2026
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तिलाड़ीसेरा : रवांई ढंडक का चश्मदीद गवाह

तिलाड़ीसेरा : रवांई ढंडक का चश्मदीद गवाह

By Dr. Arun Kuksal

तिलाड़ी क्रांति (30 मई,1930) की 92वीं पुण्य तिथि पर यमुना के उन 100 से अधिक बागी बेटों को नमन और सलाम जिन्होंने अपने समाज के जंगल के हक-हकूकों के लिए टिहरी राजशाही के सामने झुकने के बजाय जान देना ठीक समझा। और, आज उन्हीं वीरों के हम वशंज तथाकथित जनतंत्र की खाल ओढ़े अक्सर पहाड़ के जंगलों को मात्र तमाशाबीन बन धू-धू कर जलते हुए देखने की विवशता के आदी हो गए हैं।

‘तिलाड़ी क्रांति’ को याद करते हुए ‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के तहत रवांई के ‘सरबड़ियाड़’ क्षेत्र की यात्रा (13-16 जुलाई 2016) का एक भाग आपके सम्मुख है…

13 जुलाई, 2016
…देर शाम रात्रि विश्राम के लिए बड़कोट से गंगनानी (5 किमी.) की ओर चलना हुआ। ‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के सक्रिय सदस्य विजयपाल रावत भी अब हमारे साथ हैं।

विजय बातों-बातों में बताते हैं कि रवांई में एक कहावत है ‘दुनिया सरनौल तक है उसके बाद बड़ियाड है।’

मतलब यह कि सरनौल गांव के बाद ऐसा लगता है कि हम किसी नयी और अनोखी दुनिया में जा रहे हैं। विजय सरनौल तक पहले गए हुए हैं, पर पैदल। अब तो सरनौल तक गाडी जाती है।

आज के रात्रि ठिकाने पर पहुंचे तो नजर आया ’वन विश्राम गृह, गंगनानी, कुथनौर रेंज’।

आपने स्व: विद्यासागर नौटियाल जी का उपन्यास ‘यमुना के बागी बेटे’ पढ़ा है ? विजय उत्सुकता से प्रदीप से पूछतें हैं।

नहीं, पर अब पढ़ना चाहता हूं, प्रदीप ने कहा।

मुझे याद आया, अरे हां, यही तो वो डाकबंगला है, जहां पर टिहरी राजशाही के तत्कालीन दीवान चक्रधर जुयाल ने अन्य राजकर्मियों के साथ मिलकर तिलाडी कांड (30 मई 1930) की साज़िश रची थी। ‘यमुना के बागी बेटे’ उपन्यास में इस डाकबंगले का प्रमुखता से जिक्र है।

टिहरी रियासत के इतिहास का वो काला पन्ना याद करते ही सिरहन महसूस होती है। इस 100 साल पुराने डाकबंगले को नया स्वरूप दिया गया है। पर बंगले की आत्मा तो वही होगी, मैंने सोचा। रात इस बंगले में सोने का रोमांच अब और बढ़ गया है।

रवांई के लोगों के उस विद्रोह पर बात चल ही रही थी कि खबर आयी कि सरबडियाड़ क्षेत्र के 12 ग्रामीणों को पेड़ों को काटने के जुर्म में आज ही गिरफ्तार किया गया है। माजरा क्या है ? यह समझने में कुछ देर लगी। उसके बाद तो हर किसी के मोबाइल घनघनाने लगे। बात यह सामने आयी कि बड़ियाड़ क्षेत्र के लिए गंगटाडी पुुल से सर बड़ियाड गांव़ को वर्ष 2008 में स्वीकृत 12 किमी. की सड़क के अब तक भी न बनने के विरोध स्वरूप किन्हीं ग्रामीणों ने प्रस्तावित सड़क के आर-पार के सैकडों पेड़ धराशायी कर दिए थे।

पता लगा कि बड़ियाड़ क्षेत्र की ओर जाने वाली यह पहली सड़क होगी। 8 साल से सड़क आने की उत्सुकता और धैर्य जब जबाब दे गया तो ग्रामीणों का आक्रोश इस रूप में सामने आया। पेड़ काटने की जानकारी वन विभाग के अधिकारियों के संज्ञान में आने पर आज ग्रामीणों पर कार्यवाई हुई है। प्रदीप टम्टा (सांसद, राज्यसभा) उच्च अधिकारियों से बात करके यह समझाते हैं कि ग्रामीणों की मंशा कोई गलत नहीं थी। स्वीकृत सडक का 8 साल तक न बनना उनके प्रति एक अन्याय ही है। आखिरकार, देर रात पकडे गये 12 ग्रामीणों को छोडने में सहमति बन ही जाती है।

‘वन विश्राम गृह, गंगनानी, कुथनौर रेंज’ में सोने से पहले की गप-शप को विराम देते हुए विजयपाल रावत ‘तिलाड़ी क्रांति’ में दीवान चक्रधर जुयाल की क्रूरूरता पर बने लोकगीत को पूरी लय-ताल से सुना रहे हैं-

‘ऐसी गढ़ी पैंसी, मु ना मा्रया चक्रधर मेरी एकत्या भैंसी,
तिमला को लाबू, मु ना मा्रया चक्रधर मेरा बुड्या बाबू,
भंग कू घोट, कन कटु चक्रधर रैफलु को चोट,
लुआगढ़ी टूटी, कुई मरगाई चक्रधर कुई गंगा पड़ौ छुटी….

‘मतलब तो बता भाई, इस गीत का’ मैंने कहा।

मतलब ये है भाई सहाब लोगों कि, ढंडकी (राजशाही के विरुद्ध आन्दोलनकारी) गोलीबारी के दौरान कह रहे हैं कि ‘हे चक्रधर मुझे मत मार घर पर मेरी इकत्या भैंस है जो मुझे ही दुहने देती है। हे चक्रधर, मुझे मत मार मेरे माता-पिता बहुत बूढ़े हैं। तू कितना निर्दयी है चक्रधर, जो हमारी प्रार्थना को भी अनसुना कर रहा है। चक्रधर, तेरी गोली से कोई सामने मर कर गिर रहा है, तो बहुत से जान बचाने के लिए यमुना में कूद रहे हैं।’

अब रुक जा विजय भाई, कहीं रात को सपने में हमें भी न कहना पड़े कि ‘चक्रधर, मुझे मत मार, सोने दे यार’।

और, वाकई, रवांई ढंडक के इस कुख्यात बंगले में रात भर अजीबो-गरीब सपने आते-जाते रहे।

सुबह बंगले के चौकीदार से इसका जिक्र किया तो उसने कहा ‘हां साब, ऐसा यहां रात रुकने वाले सभी साब बोलते हैं।’ मैं सन्न होकर एकटक बस, उसी को देख रहा हूं…

14 जुलाई, 2016
बड़कोट बाजार के पास ही यमुना पर बने पुल को पार करके तीखी चढ़ाई की एक धार पर पंहुचते ही विजय ने कहा ‘वो रहा तिलाड़ीसेरा रंवाई ढंडक का चश्मदीद गवाह’।

(ज्ञातव्य है कि, उत्तराखंड का यह इलाका बिट्रिश काल में टिहरी राजा के अधीन था। क्रूर राजशाही के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाने के लिए 30 मई, 1930 को यमुना नदी के किनारे तिलाड़ीसेरा मैदान में हजारों स्थानीय लोगों के जमा होने के कारण तिल रखने की भी जगह नहीं थी। क्योंकि 20 मई, 1930 को इसी इलाके के राड़ीडांडा में हुए गोलीकांड का गुस्सा सारे रंवाई के लोगों में था। लिहाजा हजारों की संख्या में रंवाई के रवांल्टा टिहरी राजशाही के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ने को 30 मई, 1930 के दिन तिलाड़ीसेरा में जमा हुए थे। पर वे कुछ कर पाते उससे पहले ही राजा के करिन्दों ने एकत्रित भीड़ पर गोलियां चला दी, जिससे 100 से ज्यादा लोग मारे गये थे। इस घटना को उत्तराखण्ड का ‘जलियांवाला कांण्ड’ कहा जाता है।)

‘भाई लोगों, जहां हम खडे़ हैं, यहीं इसी धार से ढंडकियों (राजशाही का विरोध करने वाले लोग) पर कई राउण्ड गोलियां चली थी। धांय-धांय, धांय-धांय। कुछ गिरे, कुछ इधर-उधर भागे, तो कुछ ने यमुना नदी में छलांग लगाई जान बचाने को, पर बदकिस्मत जान गवां बैठे’। यमुना के उन ‘बागी बेटों’ को सलामी देते तिलाड़ीसेरा की ओर मुखातिब विजय हमें उस घटना के बारे में और भी जानकारी बताते जा रहें हैं।

कुछ दूर चलने के बाद विजय गाइड बन कर हमें बतला रहे हैं कि ‘और ये है भाई लोगों, डख्याट ग्राम सभा। कोई विशेष बात नहीं दिखी ना। चलो, आगे चलकर गांव के ऊपरी धार में पहुंच कर देखते हैं। ‘अरे वाह ! क्या घना जंगल है।’ एक साथ सब ऐसा ही कहते हैं। गांव की ऊपरी सार (हिस्से) पर बेमिसाल घना मिश्रित जंगल। विजय बताते हैं कि ये सब गांव के लोगों की मेहनत, लगन और दूरदर्शिता का फल है। इस पूरे पहाड़ पर ग्रामीणों ने वर्षों से देखभाल करके जंगल पैदा किया, उसे पाला-पोसा और आज वे उसका लाभ ले रहे हैं।

राजगढ़ी आने को है, टिहरी रियासत में राजा की रंवाई क्षेत्र की कोर्ट यहीं लगती थी। राजा का गढ़ सरनौल वाली सड़क से हट कर पहाड़ की चोटी पर है। रतन कहते हैं, चलो, फिर कभी देखेगें, अभी तो आगे का मुकाम सरनौल गांव तक जाने का है।

गंगटाड़ी से सरनौल गांव 15 किमी. है और रास्ता है पूरी तीखी चढ़ाई का। इस सड़क का पहला फेज पूरा हुये 3 साल से ज्यादा हो गया है। परन्तु अभी सड़क के पक्के होने में कितने साल लगेगें यह तो भगवान ही जाने। अव्यवस्थित कच्ची सड़क पर गाडियों का चलना बहुत जोखिम भरा है। सरनौल से पहले बूटाधार के पास लगा कि हमारी गाड़ी सरनौल तक पहुंच भी पायेगी क्या ? हमारे हलक भी सूखते महसूस हो रहे थे। पानी की कमी से नहीं और कैसे कहूं डर जो समा गया था मन में।

सरनौल इस इलाके बड़ा गांव है। पोस्ट आफिस, अस्पताल, इण्टर कालेज, चाय-पानी, राशन, कपडे की दुकानें हैं। गांव में रेणुका देवी मंदिर है, जिसकी प्रसिद्धी दूर-दूर तक है। मंदिर के प्रागंण में ग्रामीणों से भेंट होती है। देहरादून से चलने के बाद रास्ते भर स्वागत में मिली बाजारी नकली फूलों की मालाओं की जगह सरनौल गांव में असली फूलों की मालायें मिलीं तो लगा अब पहुंचे हम नैसर्गिक प्रकृति के पास।

संचालक महोदय मांग पत्र प्रस्तुत करते हैं, तो मैं हैरान, उसमें सबसे पहली मांग ‘गांव में मोबाइल टावर लगाने की है’। फिर दूसरी मांग गंगटाड़ी से सरनौल सड़क को पक्का करने की। संचार और यातायात आज की दुनिया में समुदायों की जरूरतों में पहले नम्बर पर हैं। यह तो समझ में आ ही गया।

बैठक में पुरुष कुर्सियों पर विराजमान तो महिलाओं की भीड़ मंदिर प्रांगण से बाहर दीवारों की ओट में लुकी-छुपी सी दिखाई दी। बार-बार उन्हें चौक में बैठने को कहा तो एक ग्रामीण चुपके से कहता है, नहीं आयेगीं साब, वे चौक में। पर क्यूं ? समझा करो, वो कहता है। अब मैं यह समझने की कोशिश में हूं कि क्या समझूं ?

सरनौल गांव से दोपहर बाद ही आगे चलना हो पाया। सरनौल के कई लोग गांव की सरहद से भी आगे तक छोड़ने आये। गांव लौटते बाजगी (ढ़ोल वादक) के ढ़ोल की आवाज धार पार करने तक सुनाई देती रही। लगा, हमारी वाकई एक नये लोक में जाने की विदाई हो रही है। तकरीबन 30 के करीब होगें साथ चलने वाले। लाठी या फिर छाता हाथों में और जरूरती सामानों से ठुंसकर फूले बैग सबकी पीठ पर कसे है।

बादलों की गड़गड़ाहट यह बता रही है कि बारिश होने ही वाली है। मौसम के बिगड़ते मिजाज और आगे की 10 किमी. की विकट पैदल दूरी का ख्याल सबको है। इसलिए आपसी बातों से ज्यादा तेज चलने में सबकी भलाई है। अभी सीधा और चौड़ा रास्ता है, इसे जल्दी पार कर लेंगें तो रात होने से पहले डिंगाड़ी गांव पहुंच जायेगें।

इस यात्रा के कर्ता-धर्ता रतन सिंह असवाल पीछे रह जाने वाले साथियों को सचेत करते चल रहे हैं। रतन असवाल उत्तराखण्ड के अग्रणी युवा उद्यमियों में है। प्रतिष्ठित विदेशी कम्पनी की ऊंचे ओहदे वाली नौकरी से मुक्त होकर वे स्वः उद्यम की ओर अग्रसर हुए। पहाड़ और पहाड़ियों की मूल चिंता पलायन को चिंतन में बदलकर उसके समाधानों की ओर कैसे बढ़ा जाय ? इस ओर उद्यमी रतन की तरह अन्य क्षेत्रों के रत्न जिसमें वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, प्रशासक, राजनेता आदि मिल बैठे तो ‘पलायन एक चिंतन’ टीम उभर कर सामने आयी। मुख्यतया सीमान्त और विकट इलाकों के जनजीवन की खोज-खबर लेने और शासन-प्रशासन तक उनकी बात पहुंचाने के लिए ‘पलायन एक चिंतन’ टीम निरंतर पदयात्राओं में रहती है।

रतन बताते हैं कि ‘वे अपने साथियों के साथ पहले भी 2 बार सरबड़ियाड़ क्षेत्र की यात्रा कर चुकें हैं। राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ‘पलायन एक चिंतन’ टीम की विगत यात्रा रिपार्ट से प्रेरित होकर आज स्वयं हमारे साथ चल रहें हैं। हमारा उद्वेश्य हिमालयी जनजीवन की विकटता और वैभव को राष्ट्रीय स्तर तक के नीति-नियंताओं तक पहुंचाने की है ताकि वे भी देश-प्रदेश के विकास के सुनहरे दृश्य की दूसरी ओर की दर्दनाक तस्वीर से वाकिफ हो सकें।’

सरनौल से अब तक का सारा रास्ता हल्की उतराई लिए है। रास्ते के किनारे पत्थर पर थकान विसारने को टेक लगाई ही थी कि देखा दोनों पैरों में जूतों पर चढ़ कर एक साथ कई जौंके सेवा (प्रणाम) लगा रही हैं। अभी चलें होगें ढेड-दो किमी. और एक, दो, तीन,…… कुल मिला कर सात जौंकों का हमला। उन्हें सम्मान के साथ एक-एक करके बाहर किया। पेंट, मोजे और जूतों का मिजान ठीक किया। थोड़ा समय लग गया लिहाजा साथ चल रहे रतन बातें करते-करते अचानक तेजी से आगे निकल गये। अब आगे-पीछे कोई नहीं, मैं निपट अकेला।

रास्ते ने एकदम घने जंगल की ओर रुख किया तो मन में थोड़ी हिर्र सी हुयी। यह सोचने में वक्त लग गया कि तेज चल कर आगे वालों तक पहुंचू या पीछे वालों का इंतजार करूं। इसी घंगतोल (असंमजस) में चलते-चलते आगे के साथी एक साथ दिख पडे़। वीरान जंगली रास्ते के किनारे दुकान। परचून के साथ चाय-पानी और भैजी, दाल-भात भी है।

दाल-भात की खुशबू ने मुहं तर कर दिया, भूख जो लगी है। पर खाना पौंटी गांव में होगा, ऐसा कह रहें हैं। जौंकों का प्रकोप अब आगे और ज्यादा होगा। पैरों में जूतों के ऊपर चौड़ी बेल्ट भी बांध ली है। जूतों और बेल्ट पर खूब सारा नमक छिड़का जा रहा है। नमक को पैरों में लगाऊं, मन नहीं मानता। पर जौंक के खौफ से बचने का यही उपाय है।

चलने को हुये तो ‘साहब, आपका बैग मैं ले जाता हूं।’ साथ चल रहे एक युवक ने कहा है।

‘नहीं भाई, मुझे कोई परेशानी नहीं है पर साथ-साथ चलते हैं।’

मैंने नाम पूछा तो वो बोला ‘बिशन सिंह’।

बिशन ने घिसी और टूटी चप्पल पहनी है। इसके लिए कहां गयी जौंकें ? मन हुआ बैग से निकाल कर अपने स्लीपर उसे दे दूं। पर मन स्वार्थी से बड़कर शातिर भी हुआ। रात-बेरात चप्पल की जरूरत पडे़गी। तब क्या करूंगा ? चलो वापसी में इसको ही दे दूगां। अपने ही मनमाफिक तर्कों से अपने को ही समझा भी रहा हूं।

वाह ! रे मेरी दरियादिली, क्या कहने ? आपसी मुसीबत में आदमी की संवेदनायें सिकुड़ जाती हैं, यह पता तो था आज उसका अपने से ही अहसास भी हो गया।

अरुण कुकसाल
फोटो – विजयपाल रावत

विशेष- संभावना प्रकाशन से प्रकाशित ‘चले साथ पहाड़’ यात्रा-पुस्तक का एक अंश।

‘चले साथ पहाड़’ पुस्तक अमेजाॅन पर उपलब्ध है।

उक्त के अलावा ‘चले साथ पहाड़’ यात्रा-पुस्तक ट्रांसमीडिया, श्रीनगर गढ़वाल (7060129056), किताब घर, पिथौरागढ (8077699217),
किताब घर, अल्मोड़ा (9412044298), बुक वर्ल्ड, देहरादून (98975 92383), समय साक्ष्य, देहरादून (7579243444) और संभावना प्रकाशन, हापुड़ (7017437410) में उपलब्ध है।

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