Sunday, September 13, 2026
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नयार नदी-स्ञोत से संगम अध्ययन यात्रा का एक अंश-

नयार नदी-स्ञोत से संगम अध्ययन यात्रा का एक अंश

By Dr. Arun kuksal
24 अप्रैल, 2025

ये दिल, ये जां जमाने के लिए…
…..कर्नल यशपाल नेगी और बीना नेगी के विरगण गांव के पैतृक घर पर हम यात्रा-साथी हैं। विगत तीन दिनों से जंगलों की छानी और जंगलात चौकी में रहने के बाद मित्र के घर पर आत्मीयता से पसरना परम दैवीय आनंद दे रहा है। दोपहर के भोजन का समय है। पर बातचीत का सुख भी हर कोई चाहता है। चलिए, बातचीत ही बात आगे बढ़ाते हैं-
नरेन्द्र सिंह नेगी जी के गीतों ने मानव जीवन के दर्द के मर्म को बयां किया है। जैसे-
‘‘यूं दाणी आंख्यूं मा झम-झम पाणी! आज किलै होळु आणू कुज्याणी…
वखी वीं डंडळी म छुट्द पराण, मन मा रै गे आखिरी स्याणी…’’
(बूढ़ी आंखों में आज न जाने क्यूं लगातार पानी आ रहा है…मन की यही लालसा रह गई है कि अपने प्राण पैतृक घर की देहली में ही छूटें….)

इस गीत में निहित संदेश के भावनात्मक पक्ष के साथ सामाजिक दायित्वशीलता को जीवनीय ध्येय बनाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं बीना नेगी और यशपाल नेगी।

आम गढ़वाली युवा की तरह विरगण गांव के यशपाल नेगी राजकीय इण्टर काॅलेज, वेदीखाल से 12र्वी करने के बाद 1981 में सेना में भर्ती हो गए। जीवन में आगे बढ़ने की ललक थी। और, वो मेहनत और दूरदर्शिता से ही हासिल हो सकती थी। इसी दिशा में चलते हुए 1990 में भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से सैन्य अधिकारी बनने में उनको सफलता मिल ही गई। सैन्य अधिकारी के रूप में कुफवाड़ा और सियाचीन जैसे दुर्गम और संवेदनशील बार्डर पर सेवायें दी। गौरवपूर्ण सैन्य सेवाओं का 39 साल का अनुभव लिए सेना आयुध कोर से 2020 में कर्नल के पद से यशपाल नेगी ने अवकाश प्राप्त किया।

कर्नल यशपाल नेगी के उक्त जीवन विवरण में उनकी व्यक्तिगत जीवनीय उपलब्धियां हैं। निःसंदेह, आज की युवाओं के लिए वे उक्त अर्थों में प्रेरणादाई हैं।

परन्तु, अपने लिए जिए तो क्या जिए, ये दिल, ये जां जमाने के लिए…की अदम्य इच्छाशक्ति उनके अवचेतन मन-मस्तिष्क में हमेशा कुलबुलाती रहती थी। नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों ने भावनात्मक रूप में तो उनकी वकील बेटी ने अपने पिता के साथ मां को भी सामाजिक सरोकारों के प्रति कर्मशील होने को प्रेरित किया।

आखिरकार कर्नल यशपाल नेगी ने अपनी पैतृक उद्यमीय विरासत को बचाने के साथ बढ़ाने का निर्णय ले ही लिया। सैनिक जब निर्णय लेता है तो परिणाम में जाकर ही विराम लेता है। और, सैनिक के निर्णय में उसकी अर्धागिनी का साथ होना स्वाभाविक ही है।

नेगी दम्पत्ति 21 फरवरी, 2021 को अपने पैतृक गांव विरगण लौट आये। वैसे, कहा भी जाता है कि ‘मकान’ रहने के लिए होता है, परन्तु ‘घर’ लौटने के लिए होता है। जहां, आदमी केवल रहता नहीं अपना जीवंत जीवन जीता है।

विरगण, जनपद-पौड़ी गढ़वाल के विकासखण्ड वीरोंखाल का एक खूबसूरत और खुशहाल गांव है। है, इसलिए कि उसकी खूबसूरती और खुशहाली कहीं गई नहीं बस अन्य पहाड़ी गांवों की तरह कहीं छुप सी गई है। उस छुपी हुई खूबसूरती और खुशहाली को जीवंत और साकार करने में जुटे हैं बीना और यशपाल की जोड़ी। अभी कुल जमा चार साल हुए हैं, उनके प्रयास अभी प्रारम्भिक ही हैं। इसलिए, समस्याओं का अम्बार है तो समाधानों की राह कठिन। लक्ष्य दूर है पर दिखता बिल्कुल साफ है।

नेगी दम्पत्ति ने इन चार सालों में अपने 130 खेतों में से 50 खेत पूर्णतयाः आबाद कर दिए हैं। अखरोट के 70 पौंध पनप गए हैं। गांव के नजदीक चारापत्ती के पौंधों का रोपण किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि इस क्षेत्र की पारिस्थिकीय के अनुकूल परम्परागत खेती-किसानी हमारे पूर्वज करते थे। उसी का अनुसरण वे कर रहे हैं। आधुनिक और नकद के सरकारी फेर में वे नहीं हैं। निःसंदेह, पहाड़ी फसलों और फलों से वर्षों से बंजर खेतों की महक ने अन्य ग्रामीणों को प्रेरित किया है।

कर्नल यशपाल मानते हैं कि गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्यायें विकट हैं। उत्तराखण्ड बनने के बाद ग्रामीण इलाकों में चीड़, बंदर, बंजर जमीन, खनन और शराब की खपत बड़ी है। आज गांव के 90 प्रतिशत खेतों में खेती नहीं हो रही है। प्राइमरी स्कूल में जहां पचासों बच्चे पढ़ते थे आज मात्र 5 ही हैं। स्वास्थ्य सुविधायें नदारत परन्तु शराब की होम डिलेवरी है। ग्राम पंचायत की आबादी विगत 20 वर्षों में 500 से घटकर 70 और पालतू जानवर 1500 से घटकर मात्र 80 रह गए हैं। परन्तु, उनका मानना है कि इन्हीं समस्याओं के साथ रहते और जूझते हुए हमें समाधानों तक पहुंचना है। वे दृडता से कहते हैं कि जब बाहर का आदमी यहां रोजगार के अवसर हासित कर सकता है तो हमारे युवा क्यों नहीं?

कर्नल यशपाल खेती-किसानी के साथ अन्य सामाजिक सरोकारों में भी अग्रणी भूमिका में हैं। उन्होने अपने गांव के प्रवेश स्थल पर गांव-इलाके के वीर सपूतों का भव्य स्मारक बनवाया है। ताकि, युवा पीढ़ी को अपने सामाजिक अतीत पर गर्व हो। उनका मानना है कि अग्निवीर योजना देश की सैन्य जरूरतों के हिसाब से उचित नहीं है। साथ ही राजनीति में धर्म का अनावश्यक हस्तक्षेप एक स्वस्थ्य और सभ्य समाज को बनाने में अवरोधक है। उनका मत है कि समाज को जनकल्याणकारी नीतियों से ही समृद्ध किया जा सकता है। वे गांवों में चकबन्दी के सख्त पक्षधर हैं। स्थानीय विकास के लिए वे वीरोंखाल, रिखणीखाल, थलीसैण, पोखड़ा और नैनीडांडा को मिलाकर नया जनपद बनाने में प्रयासरत है।

कर्नल यशपाल कहते हैं कि किसी सामान्य व्यक्ति के अमर होने की संभावनायें नगण्य है लेकिन अपने सद्विचारों एवं प्रयासों से हर कोई आने वाली कई पीढ़ियों तक याद जरूर किया जा सकता है। अपने पूर्वजों से प्राप्त आबाद खेत मेरी पीढ़ी में बंजर हो जांए यह नैतिकता का भी तकाजा नहीं है। इसलिए अपनी आने वाली पीढ़ी को आबाद खेतों को सौंपने का जिम्मा भी हमारा ही है। तभी, यह परम्परा आगे भी जारी रह सकेगी।

शाम के 4 बजने को है। विरगण गांव की ऊपरी धार से जगह-जगह खेतों में आडे (खरपतवार) जलाये जा रहे। उन आडों से निकलने वाला गहन और महीन धुआं इस समय प्रदूषण का नहीं गांव में अनावश्यक आ गई उद्यमीय जड़ता के समूल नष्ट करने के प्रतीक के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

विरगण, जिवंई, सुखई, बैजरों के उपरान्त देर रात स्यूंसी गांव में विश्राम हेतु पहुंचे हैं।
यात्रा लेखन जारी है…

यात्रा के साथी- जयदीप रावत, प्रेम बहुखण्ड़ी, सुमेर चन्द….
अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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