Thursday, May 14, 2026
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विविध भारती की वर्षगांठ पर अपने अनुभव साझा कर रहे है पत्रकार युनूस खान।

आज विविध भारती का स्थापना दिवस है.

 

3 अक्टूबर 1957 को विविध भारती की स्थापना हुई थी. विविध भारती क्यों शुरू हुआ इसके पीछे एक लम्बी कहानी है. दरअसल रेडियो सीलोन की बढ़ती लोक्रप्रियता और आकाशवाणी पर फ़िल्मी गानों पर लगाए गए प्रतिबन्ध की वजह से एक नए मनोरंजन चैनल की अवधारणा सोची गयी.

जब विविध भारती के स्वरुप के बारे में सोचा जा रहा था तो इसे “ऑल इंडिया वैराइटी प्रोग्राम” कहा गया था. तब तक विविध भारती नाम नहीं आया था. चूंकि इसे एक विविध रंगी चैनल की तरह गढ़ा जा रहा था इसलिए पंडित नरेंद्र शर्मा ने इसे “विविध भारती” नाम दिया था.

बहुत जल्द विविध भारती पूरे देश की आँखों का तारा बन गया था.
वंदनवार, हवामहल, जयमाला, चित्रशाला जैसे कार्यक्रम उसी दौर में सोचे गए थे.
जयमाला की शुरुआत तो अभिनेत्री नरगिस से हुई थी.
फिल्म उद्योग की तमाम मशहूर हस्तियों ने यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया है.

विविध भारती ने पूरे देश को जोड़ा. इसके ज़रिये लोगों ने हिंदी तक सीखी.
अभी इसी हफ्ते जब मैं एक फोन इन कार्यक्रम कर रहा था तो कोई कॉल त्रिपुरा से आया तो कोई कश्मीर से– जो साबित करता है कि विविध भारती की ध्वनि तरंगें देश के कोने कोने तक पहुंचती हैं और लोगों को जोड़ती हैं. मैंने त्रिपुरा के श्रोता से कहा, आपकी हिंदी कितनी अच्छी है….उनकी ख़ुशी छलक पड़ी.

मुझे भोपाल वाले, बचपन के अपने दिन याद आते हैं जब पैदल स्कूल जाते हुए हमें हर घर से आती विविध भारती की आवाज़ सुनाई पड़ती थी. और हम अंदाज़ा लगा लेते थे कि कहीं स्कूल पहुँचने में देर तो नहीं हो गयी है. हवामहल की झलकियों में कलाकारों की एक्टिंग की नक़ल करते. कौतूहल रहता कि इस शनिवार विशेष जयमाला कौन करने वाला है. मुझे याद आता है कि हम पिकनिक मनाने पातालकोट गए थे तो ट्रांसिस्टर लेते गए थे और वहाँ पंचम की जयमाला सुनकर कितना रोमांच हुआ था.

“ये विविध भारती है, आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम”
ये अनाउंसमेंट सुनकर कितना अच्छा लगता था. उस दौर के उद्घोषक हमारे लिए सितारे हुआ करते थे, चाहे कांता गुप्ता हों या कब्बन मिर्ज़ा और बृजभूषण साहनी। हम उनकी नक़ल किया करते थे.

विविध भारती का बड़ा योगदान है हमारे सांस्कृतिक मानस को रचने में.
फिल्मी गानों को हमारी नस नस में घोलने में. फिल्मों से दीवानगी की हद तक जोड़ने में. यही एक ज़रिया होता था फ़िल्मी हस्तियों की आवाज़ें सुनने का. उनके बारे में उन्हीं से जानने का. हम संगीत सरिता सुनते तो एक कॉपी में सारा ज्ञान अंकित करते चले जाते। कई रजिस्टर बनाए थे, जिनमें गानों की लंबी लंबी फेहरिस्त तैयार की। आज भी वो रजिस्टर हमारे पास हैं।

विविध भारती ने बहुत बड़ा डॉक्यूमेंटेशन किया है हमारे देश में।

विविध भारती जैसे जीवन का ऑक्सीजन बन गयी.
घरों, दुकानों, होस्टल्स सब जगह इसके स्वर गूंजते। बुज़ुर्गों की साथी, गृहिणियों की मीत, बच्चों को सिखाने वाली। विविध भारती के प्रति लोगों के प्यार और जुड़ाव की कहानियां सुनता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं.

एक बार मैं ऋषिकेश मुखर्जी से फोन पर बात कर रहा था तो विविध भारती के बारे में उन्होंने कितना सही कहा था कि विविध भारती भारत के मध्यवर्गीय जीवन का पार्श्व संगीत है.

एक दीवानगी भरा ख्वाब था. विविध भारती पर बोलने का. वो ख्वाब पूरा हुआ तो जैसे हम सातवें आसमान पर थे. यहां आने के बाद हर रोज़ कुछ नया जिया है. नया किया है. जाने कितनी हस्तियों से मुलाक़ात की है, उनसे बातचीत रिकॉर्ड की है… जो इसके सिवा मुमकिन नहीं था. यूं लगता है जैसे ये सब ख्वाब है

(Himoji प्रिय अपराजिता की बनाई हुई है। तुम नहीं हो लेकिन तुम्हारा काम कायम है अपराजिता Aparajita Sharma)

—यूनुस ख़ान

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