Monday, July 27, 2026
Home crime कहानी : बधाई हो, जज हुआ है, एक नर्स का यह कहना?

कहानी : बधाई हो, जज हुआ है, एक नर्स का यह कहना?

By – Deepa Shah 

कुछ साल पहले का वो कार्टून आज भी याद आता है। नर्स ऑपरेशन थिएटर से बाहर निकलती है, चेहरे पर थकान और होंठों पर मुस्कान, और कहती है “बधाई हो, जज हुआ है!”
माँ-बाप खुशी से झूम उठते हैं। कोई पूछे तो जवाब तैयार है “बेटा, पापा-दादा की लाइन है न!”

भारतीय न्याय व्यवस्था का यह सबसे मधुर मजाक है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यायपालिका का शीर्ष पद अब वंशानुगत व्यवसाय बन चुका है। कॉलेजियम सिस्टम वो चमत्कारी प्रक्रिया जिसमें जज खुद जज चुनते हैं, बंद कमरों में, बिना किसी बाहरी नजर के। जैसे कोई प्राइवेट लिमिटेड कंपनी हो, जिसमें बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स अपने बच्चों को प्रमोट कर रहा हो।

अगर IAS या IPS में भी यही सिस्टम होता। कोई कहता, “अरे बेटा, पापा चीफ सेक्रेटरी रहे हैं, तुम्हारा सिलेक्शन तो पक्का है। लिखित परीक्षा? वो तो बस औपचारिकता है।”
लेकिन न्यायपालिका में यह रोज का सच है।

कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि न्याय की कुर्सी पर बैठने का जीन ही परिवार में है। दादा जज, पिता जज, चाचा जज, अब बेटा-बेटी भी तैयार। जैसे न्याय कोई फैमिली ज्वेलरी हो जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहे। आम आदमी का बेटा, जो जिला अदालत में 15-20 साल वकालत करके, मुवक्किलों की कहानियाँ सुनते-सुनते थक गया हो, उसकी योग्यता पर सवाल उठता है। लेकिन ‘सही खानदान’ का लड़का? बस, “ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है”।

ट्रैक रिकॉर्ड का मतलब? पिताजी के साथ गोल्फ खेलने का रिकॉर्ड, या उन जजों के साथ जो परिवार के मित्र रहे हैं।
कॉलेजियम ने अब कुछ ‘सुधार’ किए हैं। अब वे वेबसाइट पर दो-चार लाइनें डाल देते हैं “योग्यता संतोषजनक पाई गई”।
अरे महोदय, यह तो वैसा है जैसे कोई अरेंज्ड मैरिज में कहे, “लड़की अच्छी है, ट्रस्ट us”।

पूरी मिनट्स? IB रिपोर्ट का पूरा विवरण? नहीं भाई। वह तो ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मुद्दा है।

सरकार अब फाइल लौटाती है, अच्छी बात है। लेकिन अंत में क्या होता है? वही होता है जो हमेशा होता रहा या तो नाम वापस आ जाता है, या थोड़ी बहुत काट-छाँट के बाद पास हो जाता है। जैसे परिवार में कोई कहे, “बेटा, चाचा नाराज हो गए हैं, जरा मना लो।”

सबसे सुंदर हिस्सा तो रिटायरमेंट के बाद का है।
जज साहब 65 या 62 में रिटायर होते हैं, और अचानक उन्हें ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ याद आता है। राज्यसभा, लोकसभा, या सरकारी आयोग की कुर्सी। कुछ तो वकील बन जाते हैं, जहाँ वही मुकदमे लड़ते हैं जो उन्होंने कभी फैसले सुनाए थे।
कल्पना कीजिए आज जो जज आपको सजा सुना रहा है, कल वही आपके मुकदमे का वकील बन सकता है। या फिर सत्ता पक्ष का सांसद।

न्याय की निष्पक्षता का यह सबसे बड़ा मजाक है।
सच तो यह है कि जब तक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) नहीं आएगी, तब तक यह सिलसिला चलेगा। एक खुली, कठिन, पारदर्शी परीक्षा। जिसमें देश के किसी कोने का होनहार छात्र भी अपनी मेहनत से हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच सके।

जिस जज ने खुद मुश्किलें देखी हों, ट्रेन की जनरल बोगी में सफर किया हो, गरीब मुवक्किल की कहानी सुनी हो, वह फैसला देते समय कम से कम “कॉकरोच” और “गंदी नाली के कीड़े” जैसे शब्दों का इस्तेमाल तो नहीं करेगा। क्योंकि वह जानता होगा कि ये शब्द किसी की बेटी, किसी की माँ, किसी की ज़िंदगी हैं।

कॉलेजियम ने न्यायपालिका को ‘एक्सक्लूसिव क्लब’ बना दिया है। समय आ गया है कि इस क्लब का मेंबरशिप कार्ड अब ‘मेरिट’ पर आधारित हो, न कि ‘बर्थ सर्टिफिकेट’ पर।
न्याय की माँ (Themis) अंधी है, यह हम जानते हैं।
लेकिन क्या यह जरूरी है कि उसकी आँखों पर सिर्फ उन्हीं परिवारों का पट्टा बँधा रहे?

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