Monday, July 27, 2026
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कहानी : दादी की चिट्ठी

आजकल छुट्टियों में गाँव जा रहे हो? मेरी इस कहानी को पढ़कर जाना – डॉ० ममता कुंवर

By – Dr. Mamata Kunwar

आज दादी सुबह से ही बहुत ख़ुश थीं। घर की साफ सफाई, मंदिर में पूजा करने से लेकर तरह तरह के पकवान बनाने में आधा दिन कब निकल गया पता ही नहीं चला।

यूँ तो दादी बुजुर्ग हो चली थीं लेकिन आज की फुर्ती देखकर लग रहा मानो पच्चीस बरस की हों। पूरे पांच साल बाद दादी का बेटा बहू अपने बच्चों के साथ गाँव आ रहे थे। दादी के लिए ये पल किसी उत्सव से कम नहीं था। शाम ढलते ही आँगन बच्चों की चहलकदमी से गुलजार हो उठा। पोती रागिनी पंद्रह वर्ष और पोता रियांश दस वर्ष का हो गया। दादी ने काली दाल चांवल से दोनों की नजर उतारी। रात के खाने में दादी के हाथों के पकवान खाकर बच्चे बड़े ख़ुश हुए। पहाड़ी राजमा की दाल, कद्दू के पत्तों की सब्जी,झंगोर की खीर,लाल कद्दू का रायता, गुलगुले, मंडवे की रोटी उसके ऊपर शुद्ध घी की डली। देखते ही मुँह में पानी आ रहा था। खाना खाने के बाद चूल्हे के पास बैठकट देर रात तक खूब बातचीत का दौर चला। फिर सफऱ की थकान से कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।

अगली सुबह घिन्दुड़ियों की चहचाहट से आँखें खुली तो गाँव की तरोताज़ा हवा, चटकीली धूप और चारों ओर पसरी हरियाली देखकर सबका मन प्रफुल्लित हो गया।
“दीदी यहाँ कितनी हरियाली है , वो देखो उस पेड़ पर झूला भी है चलो झूलते है “ रियांश ने अपनी दीदी से कहा और दौड़कर झूले की ओर भागा। रागिनी ने अपना मोबाइल निकाला और झूला झूलते रियांश की वीडियो बनाने लगी।

दादी यह सब देखकर ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थीं। दादी जो कल तक घुटने पकड़ पकड़ कर सीड़ियाँ उतर रही थी आज किसी छोटे बच्चे की तरह उत्साहित होकर सारे काम करने लगी। उसे तो आजकल सारी दुनियाँ की ख़ुशी मिल रही थी।लेकिन ये ख़ुशी बहुत देर तक नहीं टिकी….

दिन चढ़ते चढ़ते बेटा बहू पोता पोती धीरे-धीरे मोबाइल की गिरफ्त में आ गए। कभी फोटो खींच रहे तो कभी वीडियो बना रहे। फिर उसे इधर उधर भेज रहे फिर घंटो किसी से बात… और भी ना जाने क्या क्या…

इधर दादी बच्चों से बात करने उनके साथ समय बिताने के लिए तरस गई। अभी आते,तभी आते में दिन बीत गया। एक बार हिम्मत कर बेटे को कहा तो बोला कि माँ आजकल इसी का ज़माना है। बिना फोन के जिंदगी कुछ नहीं है। बेटे की ये बात सुनकर दादी विस्मित हो गई। मोबाइल के बिना जीवन भला कैसे अधूरा हो गया। दादी का उत्साह आसमान से जमीन पर पटक दिया गया । सोचा था बच्चों को खेत घुमाऊंगी, दूर धारे में कैसे जमीन से पानी आता है, वो दिखाउंगी। गाय बछियों से मिलाऊँगी। गांव के दूसरी ओर देवी के मंदिर में मेले में लेकर जाउंगी। लेकिन यहाँ तो सब इस मोबाइल में कैद हो गये। बहू अपना ऑफिस का काम भी इसी पर करती। उधर बेटा भी सुबह से रात तक इसी में घुसा है और रागिनी रियांश की नजरें इस फोन से हट ही नहीं रही। खाने खाते समय भी इसी पर चिपके हैं। तभी इनकी आँखों पर मोटे मोटे चश्मे लगे हैं। दादी मन ही मन सोचती। पूरा परिवार पास होकर भी साथ नहीं था।

एक दिन सुबह सुबह रियांश ने दादी को रसोई में आवाज़ लगायी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। सोचा गौशाला गई होगी थोड़ी देर में आ जाएगी। भूख से पेट में चूहे कूदने लगे। काफ़ी देर तक भी जब दादी नहीं आई तो सब इधर उधर ढूंढने लगे। दादी का कहीं कोई अता पता नहीं। इतने में रागिनी पानी पीने अंदर गई तो देखा चूल्हे के पास में एक कागज़ पर कुछ लिखा था। वह बाहर आँगन में वो कागज लेकर आई जिसमे दादी ने लिखा था, “ मेरे बच्चों! पिछले पांच साल से तुम्हारे आने की घड़ियाँ गिनती रही। कोरोना महामारी से लेकर आज तक किसी ना किसी बहाने तुम गाँव नहीं आ सके। इस बार आये तो लगा मुझे सारी दुनियाँ की खुशियां मिल गई। लेकिन मैं गलत थी। अब शायद तुम्हें मेरी जरूरत नहीं। तुम्हारी केवल एक दिन की सुबह और एक शाम मुझे मिली बाकी तुम्हारी सुबह- शाम -दिन -रात बस मोबाइल पर बीतती है । जब तुम्हें टोकती तो तुम्हारे माता-पिता को बुरा लगता इसलिए मुझे लगा जब यहाँ मेरे होने ना होने से किसी को कोई मतलब नहीं तो क्यों ना मैं उनके पास रहूं जिन्हे मेरी जरूरत है। मैं छानी जा रही। अपनी बकरियों के पास जिन्हे मैंने कुछ दिनों के लिए गाँव के रतनू लाटा को सौंपा था ताकि मैं निश्चिंत होकर तुम्हारे पास आनंद से रह सकूँ। बच्चों! इस बूढ़े शरीर का क्या भरोसा, कब ऊपर से बुलावा आ जाए। इसलिए मैंने एक एक घड़ी इसी सोच में बिताया कि तुम लोगो के साथ जीवन के इन पलों को जी भरकर जिऊँगी। लेकिन तुम लोगो ने मेरी आँखें खोल दी। मैं समझ गई कि आज नई दुनियाँ के बीच में हम पुराने सामान की तरह पड़े हैं। तुम्हारा जब तक मन करे गाँव में रहो। तुम्हें कोई तकलीफ ना हो इसलिए मैं अपनी छानी आ गई।”

दादी की चिट्ठी पड़ते पड़ते सबके आंसू आ गए। उन्हें अहसास हुआ कि जाने अनजाने उन्होंने दादी का दिल दुखाया है। तभी रियांश बोला, “ पापा ये छानी कहाँ है?

बेटा गाँव के ऊपर दूर जंगल में। वहां बकरियों का चरागाह है और रहने के लिए छोटा सा घर भी।
“चलो पापा हम भी वहीं चलते हैं, दादी के पास”, रागिनी बोली।

आंसू पोंछते हुए रागिनी की माँ बोली “सच में! आज के दौर में हम मशीन बन गये। चार दिन के लिए माँ के पास आये हैं और यहाँ भी मोबाइल से जकड़े हैं। आज के बाद मोबाइल का प्रयोग सब तभी करेंगे जब बहुत जरुरी हो। ठीक है? ”
सबने सहमति में सिर हिलाया और चल पड़े दादी को लेने।
कठिन चढ़ाई के बाद घास के बुग्यालों में बनी छानी देखकर बच्चो ने दौड़ लगा ली और झट से दादी से लिपट गए।
इतने में बेटा बहू भी आ गये।

“हमें माफ़ कर दो दादी…अब से जब तक गाँव में हैं,बस आपके पास रहेंगे।”
दादी ने सबको सीने से लगा लिया। आँखों से झरते आंसू फिर से अपनों को अपने पास होने का सुःख बयां कर रहे थे।
…………………………………………………..
कहानी सर्वाधिकार सुरक्षित ©डॉ.ममता कुंवर

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