Sunday, September 13, 2026
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21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई

21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई

After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people's souls started trembling.
After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people’s souls started trembling.

साल 2003 में जब वरूणावत पर्वत लगातार धंसता ही जा रहा था तो एक बार ऐसा लग रहा था कि अब उत्तरकाशी शहर का अस्तित्व मिटने वाला है। रात को लोग सोते नहीं थे और दिन में दूर जाकर या घरो की छत पर चढकर दिनभर वरूणावत पर्वत को देखते रहते थे। लोगों ने अपने नजर से जिस शहर को बनते देखा उसी को अपने ही नजरों के सामने दफन होते भी देखा। इस आपदा में कई बहुमंजिला होटल सहित 81 सरकारी और गैरसरकारी भवन ध्वस्त हो गए थे। हालांकि, उस समय यह घटना दिन में हुई थीं जिससे जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। लेकिन एक माह तक वरुणावत पर्वत से लगातार बोल्डर गिरते रहे। इन्द्रकालोनी, गुफियारा, जल संस्थान कालोनी में रह रहे परिवारो ने अपने जीवन की पूंजी को अपने ही आंखों के सामने दफन होते देखा है। और अब 21 वर्ष बाद यह खतरा फिर सामने दिखाई दे रहा है। जबकि वरूणावत पर्वत का ट्रिटमेंट 100 साल से आगे के लिए किया गया था।

पहले हम यहां पर्यावरणविद् सुरेश भाई को सुनते है। फिर आगे बाते करते है। –

हम और आप वैज्ञानिक नहीं है। पर जो मेरी इस रिपोर्ट को देख रहें होंगे उनमें से शायद कोई वैज्ञानिक हो तो कृपया कमेंट करके हमें सुझाये, ताकि हम आपके सुझाव सरकारी वैज्ञानिकों तक पंहुचा पाये। उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत से लगातार हो रहे भूस्खलन को रोकने के लिए कृत्रिम पहाड़ की परत लगाकर वरुणावत की ढलान को स्थिर किया जाएगा। यह सरकार का वरूणावत पर्वत के भूस्खलन को रोकने का उपचार बताया जा है। यह उपचार कितना कारगार साबित होगा यह भी हम नहीं जान सकते है। हमें तो बताया गया कि 2003 में वरूणावत पर्वत के भूस्खलन को रोकने के लिए 250 करोड़ खर्च किये गये है। और यह भी बताया गया कि इस उपचार की मियादी अगले 100 साल तक होगी। इसलिए लोग कह रहे हैं कि इस वैज्ञानिक उपचार ने तो 21 साल में ही अपनी पोल पट्टी खोल दी है।

After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people's souls started trembling.
After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people’s souls started trembling.

इधर भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अभी वरुणावत पर्वत पर पर हज़ारों टन ऐसा मलबा पड़ा है जो कभी भी ख़तरनाक रूप धारण कर सकता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि करोड़ो खर्च करने से क्या वरुणावत पर्वत पर जो हज़ारों टन मलबा है उसे रोका जा सकता है। आज तक का इतिहास बताता है कि जब कोई पहाड़ धंसता है तो ऐसे हजारो टन मलबा कुछ ही मिनटो में कब कहां पंहुच जाये जिसका अन्दाजा लगाना मुश्किल है। फिर सवाल उठता है कि करें क्या, कुछ न कुछ तो करना ही होगा। यह मानव जाती की फितरत भी है। एक बार फिर 21 वर्ष पहले उतरकाशी के वरूणवत पर्वत पर हुए भूस्खलन पर नजर डालते है। सितंबर 2003 से शुरू हुए इस भूस्खलन में अब तक हज़ारों लोग बेघर हुए थे। और छह सौ से भी ज़्यादा इमारतों के साथ ही लगभग 10 करोड़ की संपत्ति का नुक़सान हुआ था।

21 वर्ष बाद जब फिर से वरूणावत पर्वत धंसने लगा तो लोगों की रूहें कांपने लग गई। हालाँकि इन दिनों सूखे मौसम के कारण भूस्खलन की तेज़ी कुछ थम गई है। मगर अब भी रुक-रुक कर वरुणावत से गिर रहे पत्थर और पेड़ों की वजह से लोग किसी अनहोनी की आशंका में जी रहे हैं। स्थानीय निवासी कृष्ण भंडारी ने बताया कि रात में जैसे ओंस गिरनी आरम्भ होती है वैसे पत्थरों का गिरना चालू हो जाता है। इस दहशत में रहकर लोग कोई अनहोनी ना हो कई राते ऐसे ही गुजार चुके है।
यह घटना उत्तरकाशी मुख्यालय की है। मुख्यालय से मात्र 100 किमी के फासले पर विश्व प्रसिद्ध गंगोत्री धाम है। उत्तरकाशी शहर एक तश्तरी के आकार में पहाड़ों की तलहटी में बसा है। भागीरथी इसके बीच से बहती है। शहर का पुराना क्षेत्र वरुणावत की तलहटी में है। अचानक इस पूरे क्षेत्र को तब ख़तरा पैदा हो गया था जब 24 सितंबर 2003 को अचानक ही वरुणावत पर्वत धँसना शुरू हो गया। इस भूस्खलन से शहर का पूरा पुराना हिस्सा तबाह हो गया।

After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people's souls started trembling.
After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people’s souls started trembling.

अभी हाल ही में भूवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के एक उच्च स्तरीय दल ने वरूणावत पर्वत का जायज़ा लेने के बाद कहा है कि पहाड़ की ढलानों और चोटी को मज़बूत और स्थिर करके ही इस विपदा को रोका जा सकता है। भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक डॉक्टर पीसी नवानी ने बताया कि इस भूस्खलन का कारण उत्तरकाशी में 1991 में आया भूकंप है। उस भूकंप की वजह से पहाड़ में दरारें पड़ गईं और बारिश में उसमें पानी भर गया। अब पहाड़ इतना कमज़ोर हो गया है कि धँसना शुरू हो गया है।

डॉक्टर पीसी नवानी आगे बताते हैं की वरुणावत पर्वत पर जहां भूस्खलन हुआ है वह संवेदनशील क्षेत्र है। जो कि अब दोबारा सक्रिय हो गया है। इसके ट्रीटमेंट में देरी नहीं की जानी चाहिए। ट्रीटमेंट में देरी खतरे को बढ़ा सकती है। इस पर्वत पर भूस्खलन की एक बड़ी वजह मानवीय हस्तक्षेप है। पहाड़ की तलहटी को खोदने के साथ लोग अब ऊपर की तरफ बढ़ते जा रहे थे, इससे पहाड़ पर बोझ बढ़ा है। इसी वजह से भूस्खलन हुआ है। उन्होंने बताया कि छोटा भूस्खलन यह संकेत होता है कि जोन सक्रिय हो गया है। छोटे भूस्खलन को नजरंदाज करने की जगह उसका जल्द ट्रीटमेंट होना चाहिए, जिससे कि समस्या न बढ़े। वरुणावत पर्वत पर फिर कोई नया भूस्खलन एक्टिव न हो, इसके लिए जरूरी है कि पहाड़ की तरफ निर्माण न हो और बफर जोन खाली रहे।

After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people's souls started trembling.
After 21 years, when Varunavat mountain started sinking again, people’s souls started trembling.

भू-वैज्ञानिक डॉ.पीसी नवानी बतातें है कि वर्ष 2003 में जब भूस्खलन शुरू हुआ था तो पूरे उत्तरकाशी शहर को ही शिफ्ट करने की बात उठी थी। जिस पर उस समय 5000 करोड़ रूपए खर्च होते, जिसका उन्होंने विरोध किया था। जबकि उन्होने वरुणावत पर 23सितंबर 2003 में हुए भूस्खलन की एक महीना पहले ही चेतावनी दे दी थी।

राज्य सरकार ने भूवैज्ञानिकों की सिफ़ारिश को बरियता से लिया है। वरुणावत को फिर से मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी टिएचडीसी को दे दी है। आपदा प्रबंधन समिति के सदस्य विजयपाल सिंह सजवान बताते हैं कि इस काम में 35 करोड़ का ख़र्च आएगा। सीमेंट और चारकोल से पहाड़ पर पर्त बनाई जाएगी।

दरअसल उत्तरकाशी की स्थिति कुछ ऐसी ही है कि प्रकृति का कहर टूटता ही रहता है। वर्ष 1978 में गंगा भागीरथी में आई बाढ़ से भारी तबाही हुई। 1991 में आये भूकम्प ने असहनीय क्षती पंहुचाई। जिसमें भारी जन धन की हानी हुई है।

अब तक हमने वरूणावत पर्वत के धंसने और उसे उपचारित करने पर चर्चा की है। एक आम नागरिक की तरह देखें तो यह उपचार कितना कारगर हुआ है वह एक बानगीभर है। उत्तरकाशी शहर के तांबाखानी से लेकर गुफियारा तक पहले से ही बहुत ही खतरनाक जोन रहा है। इसी सिराहने पर वरूणावत पर्वत है। जिसने 2003 में भारी तबाही मचाई है। तब से लेकर यह जोन और खतरनाक हो गया है। जब आप और हम इसके उपचार को देखेंगे तो वरूणावत पहाड़ की चोंटी से लेकर कुछ सर्कील रूप में इसे सीमेंट से पोत दिया है। अब बरसात और बर्फवारी के दौरान इसका पानी सीधा शहर की तरफ आता है जो तांबाखानी से लेकर गुफियारा तक जमा हो जाता है। यानि वरूणावत की तलहटी में। इसी के लिए वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डा॰ नवानी बार बार अगाह कर रहे है। एक तरफ वरूणावत पर्वत की तलहटी कमजोर हो रही है और दूसरी तरफ वरूणावत पर्वत में पूर्व की पड़ी हुई दरारें धीरे धीरें खुल रही है। यही इस आपदा का कारण है।

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