Sunday, September 13, 2026
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साधना ही है जो भोग-विलास से निकालकर सेवा, संयम और शांति के मार्ग पर ले जाती है – बाबा भवानी गिरी महाराज

विशेष साक्षात्कार,

By – Harishankar singh

 

आज के दौर में जब भोग-विलास, दिखावा और तेज़ रफ्तार जिंदगी ने युवाओं को मानसिक रूप से अशांत और दिशाहीन कर दिया है, तब समाज को ऐसे मार्गदर्शकों की सबसे अधिक आवश्यकता है जो शब्दों से नहीं, अपने कर्मों से दिशा दिखाएं। देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में स्थित संतोषी माता गौशाला, नून नदी के तट पर स्थापित एकादश मुखी हनुमान मंदिर और निरंतर चल रही निःस्वार्थ गौ सेवा इसी कर्मयोग की जीवंत मिसाल हैं। इन सेवाओं के केंद्र में हैं बाबा भवानी गिरी जी महाराज, जिन्होंने सनातन धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर उसे करुणा, सेवा और संयम से जोड़ा है। सड़कों पर तड़पती गोमाता से लेकर भटकती युवा पीढ़ी तक बाबा का प्रयास है कि हर पीड़ा को धर्म के सहारे राहत मिले। बिना किसी सरकारी सहायता के, अपने सीमित संसाधनों से गौशाला चलाना और बीमार व दुर्घटनाग्रस्त गोवंश का इलाज कराना उनकी साधना का ही रूप है। वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर सिंह ने बाबा भवानी गिरी जी महाराज से विस्तार से बातचीत की। इस साक्षात्कार में बाबा ने सनातन धर्म की प्रासंगिकता, युवा पीढ़ी के भटकाव, गौ सेवा के संघर्ष, मां संतोषी माता की साधना और एकादश मुखी हनुमान भक्ति के माध्यम से जीवन में संतुलन और शांति के मार्ग पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं। यह संवाद केवल प्रश्न–उत्तर नहीं, बल्कि आज के समाज के लिए एक दिशासूचक चिंतन है। बाबा भवानी गिरी जी महाराज से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है साक्षात्कार के मुख्य अंश।

प्रश्न : बाबा जी, सनातन धर्म की सेवा में आने का मुख्य कारण क्या रहा? गौ सेवा, मां संतोषी माता पूजा और हनुमान भक्ति कैसे आपके जीवन का हिस्सा बनी?

उत्तर : देखिए, सनातन धर्म कोई अचानक अपनाने की चीज नहीं है, यह संस्कारों से जीवन में उतरता है। मेरे बचपन से ही परिवार में पूजा-पाठ, सेवा और साधु-संतों का सम्मान रहा। लेकिन जीवन की असली दिशा मुझे तब मिली, जब मैंने समाज की पीड़ा को करीब से देखा। 1990 के दशक में जब मां संतोषी माता मंदिर की स्थापना हुई, तब मैं पूरी तरह धार्मिक कार्यों में जुट गया। उसी दौरान सड़कों पर घूमती, बीमार और दुर्घटनाग्रस्त गायों को देखा।
गाय हमारी माता है, लेकिन उसे सबसे ज्यादा कष्ट भी वही देती है, जिसे हम विकास कहते हैं। जब पहली बार मैंने सड़क पर तड़पती हुई गाय को देखा, तो मन भीतर से हिल गया। उसी दिन मैंने तय किया कि पूजा के साथ-साथ सेवा भी करूंगा। मां संतोषी माता की कृपा से सेवा का मार्ग मिला और हनुमान जी की भक्ति से शक्ति। यही तीनों—गौ सेवा, माता की पूजा और हनुमान भक्ति मेरे जीवन की धुरी बन गए।

प्रश्न : एक व्यक्ति के जीवन में धर्म की भूमिका क्या है, खासकर जब भोग-विलास चारों ओर फैला हो?

उत्तर : धर्म जीवन को रोकता नहीं, दिशा देता है। आज लोग समझते हैं कि धर्म मतलब त्याग, कष्ट और दुनिया से दूर जाना। जबकि सच यह है कि धर्म हमें सही और गलत में फर्क करना सिखाता है।
भोग-विलास अगर सीमित हो तो जीवन का हिस्सा है, लेकिन जब वही जीवन का लक्ष्य बन जाए, तो विनाश तय है। धर्म हमें संयम सिखाता है। शांति सिखाता है। जब इंसान धर्म से जुड़ता है, तो उसका मन स्थिर होता है। उसे पता होता है कि पैसा, पद और सुख साधन हैं, साध्य नहीं। आज जब चारों ओर भटकाव है, तब धर्म दीपक की तरह रास्ता दिखाता है।

प्रश्न : आज की युवा पीढ़ी सनातन रास्ते से भटककर भोग-विलास में क्यों लिप्त हो रही है?

उत्तर : इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है संस्कारों की कमी। माता-पिता खुद तनाव में हैं, समय नहीं दे पा रहे। दूसरा कारण है दिखावासोशल मीडिया पर जो दिखता है, वही सच मान लिया जाता है।
युवाओं को लगता है कि पैसा, गाड़ी, शराब और ऐश ही सफलता है। उन्हें यह कोई नहीं बताता कि इसके बाद खालीपन आता है। जब आत्मा भूखी रह जाती है, तब इंसान नशे और गलत संगत की ओर जाता है।
सनातन धर्म से दूरी का मतलब है अपने मूल से दूरी। जब जड़ कमजोर होती है, तो पेड़ भी कमजोर हो जाता है।

प्रश्न : युवाओं को सनातन धर्म से जोड़ने के लिए आप क्या प्रयास कर रहे हैं?

उत्तर : हम किसी पर धर्म थोपते नहीं हैं। हम उदाहरण देते हैं। गौशाला में आने वाले कई युवा पहले सिर्फ देखने आते हैं। फिर सेवा करते-करते उनका मन बदलता है।
हम सत्संग में आसान भाषा में बात करते हैं। न डर दिखाते हैं, न पाप का बोझ डालते हैं। बस यह समझाते हैं कि सेवा से सुख मिलता है।
एक युवा जब घायल गाय को अपने हाथ से पानी पिलाता है, तब उसके भीतर करुणा जागती है। वहीं से धर्म की शुरुआत होती है।

प्रश्न : गौ सेवा आज के दौर में कितनी कठिन है और आप इसे कैसे निभा रहे हैं?

उत्तर : गौ सेवा सबसे कठिन सेवा है, क्योंकि इसमें लाभ नहीं, केवल जिम्मेदारी है। चारा महंगा है, दवाइयां महंगी हैं, इलाज महंगा है।
हम बिना सरकारी मदद के काम कर रहे हैं। कई बार आर्थिक संकट आता है, लेकिन सेवा नहीं रुकती। मैं मानता हूं कि जब उद्देश्य पवित्र होता है, तो रास्ता निकल ही आता है।
युवाओं से मैं कहता हूं अगर पूरी जिंदगी सेवा नहीं कर सकते, तो महीने में एक दिन आकर सेवा कर लो। वहीं से बदलाव शुरू होता है।

प्रश्न : मां संतोषी माता की पूजा जीवन में संतुलन कैसे लाती है?

उत्तर : मां संतोषी माता संतोष का प्रतीक हैं। आज सबसे बड़ी बीमारी है असंतोष।
मां की पूजा सिखाती है कि जो मिला है, उसमें खुश रहो। जब इंसान संतोष सीख लेता है, तो आधी परेशानियां खत्म हो जाती हैं।
युवाओं को मैं यही बताता हूं कि संतोष होगा, तो नशा नहीं चाहिए, दिखावा नहीं चाहिए।

प्रश्न 7 : एकादश मुखी हनुमान जी की साधना भोग-वासनाओं पर कैसे विजय दिलाती है?

उत्तर :हनुमान जी ब्रह्मचारी हैं, शक्ति और संयम दोनों का प्रतीक हैं। एकादश मुखी हनुमान जी की साधना मन को मजबूत बनाती है।
जो युवा नियमित हनुमान चालीसा, राम नाम और सेवा से जुड़ते हैं, उनके भीतर आत्मबल आता है।
मंत्र कोई जादू नहीं, अनुशासन है। जब अनुशासन आता है, तो वासना खुद पीछे हट जाती है।

प्रश्न :मंदिर के माध्यम से सनातन धर्म का प्रचार कैसे हो रहा है?

उत्तर : मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं है, यह संस्कार केंद्र है। यहां आने वाले कई युवा पहले गलत संगत में थे। धीरे-धीरे वे सेवा से जुड़े, नशा छोड़ा, परिवार से जुड़े।
यह चमत्कार नहीं, प्रक्रिया है। धर्म समय लेता है, लेकिन स्थायी बदलाव देता है।

प्रश्न : धार्मिक कार्यों में युवाओं की कमी क्यों है?

उत्तर : क्योंकि धर्म को बोझ बना दिया गया है। डर दिखाया गया है। मैं कहता हूं धर्म को सरल बनाओ, जीवन से जोड़ो। जब युवा देखेंगे कि धर्म से शांति मिलती है, तो वे खुद आएंगे।

प्रश्न : भविष्य की योजनाएं क्या हैं?

उत्तर : गौशाला का विस्तार, युवाओं के लिए सेवा शिविर, संस्कार शिक्षा और साधना केंद्र।
हम चाहते हैं कि युवा मंदिर को डर से नहीं, प्रेम से जोड़ें।

प्रश्न : भक्तों और युवाओं को आपका संदेश?

उत्तर :भोग को छोड़ो मत, उस पर नियंत्रण रखो।
सेवा, साधना और संयम—यही सनातन जीवन है।

प्रश्न :कोई ऐसा अनुभव जो युवाओं को प्रेरित करे?

उत्तर : मैंने कई युवाओं को टूटते देखा है और सेवा से जुड़कर संभलते देखा है। जब इंसान किसी और का दर्द समझ लेता है, तभी वह सच्चा इंसान बनता है। यही धर्म है।

(साधना ही है जो भोग-विलास से निकालकर सेवा, संयम और शांति के मार्ग पर ले जाती है – बाबा भवानी गिरी महारा)

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