Sunday, September 13, 2026
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जल संकट से उभरने के उपायों को रेखाकिंत करती पुस्तक।

जल संकट से उभरने के उपायों को रेखाकिंत करती पुस्तक।

By – Dr. Arun kuksal

सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही प्रकृति और जीवधारी अपने-अपने अस्तित्व को कायम रखते हुए एक दूसरे के पूरक बने। मानवीय सभ्यता के प्रारम्भिक काल में मानव प्रकृति से अपनी भूख की आवश्यकता की पूर्ति से ही सन्तुष्ट रहता था। उस प्रारम्भिक काल में भी मानव को यह अहसास था कि प्रकृति से प्राप्त संसाधन एवं अवसर महत्वपूर्ण तो हैं पर असीमित नहीं हैं।

अतः मानव प्रकृति प्रदत एवं अर्जित संसाधनों के संग्रह और संरक्षण की दिशा में गतिशील हुआ। भारतीय समाज ने इसी परम्परा का अनुसरण किया।

महात्मा गाँधी ने इसी विचार को समझाते हुए कहा कि ‘प्रकृति आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है पर लालच की नहीं।’ अर्थात जीवन जीने के लिए जितने संसाधन आवश्यक हैं उतने प्रकृति में उपलब्ध हैं पर आदमी के लालच जिसकी कोई सीमा नहीं होती उसकी पूर्ति प्रकृति नहीं कर सकती है।

उक्त विचारों के केन्द्र में ‘भारतीय मध्य हिमालय में जल: संस्कृति एवं आर्थिकी’ किताब समझाती है कि ‘‘जल जिसे नीर, अम्बु, तोय, वारि, सलिल, उदक, पानी, पय, अमृत, मेघपुष्प आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है, धरती पर जीवन का कारक है। इसके बिना जीवन की कल्पना करना शायद ही संभव हो पाये।…इसीलिए कहा गया है कि ‘जल ही जीवन है’। धरती पर प्रथम जीवन की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भी विज्ञानी जल को ही वह स्थान मानते हैं जहाँ जीवन पनपा।’’ (पृष्ठ-01)

जल मानव जीवन का प्राणतत्व है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत अंश के साथ जल तत्व विद्यमान है। जीवधारियों में जीवन्तता उनमें निहित पानी के कारण ही है। जीव और निर्जीव का भेद इसी आधार पर किया जा सकता है कि जीव में जल होता है जबकि निर्जीव जल विहीन होता है। मानव में जो लोच, संवेदना और गतिशीलता है, वह उसके अंदर पानी के कारण है।

ये प्रमाणिक है कि पृथ्वी का 75 प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा है। विडम्बना यह है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी का मात्र 3 प्रतिशत ही पीने योग्य है। उसमें भी 2 प्रतिशत बर्फ के रूप में है। अर्थात मात्र 1 प्रतिशत पानी ही पीने लायक है। विडम्बना यह है कि पानी का अभी तक कोई विकल्प सामने नहीं आया है। कहा जाता है कि पानी में सर्वाधिक लोच होती है। इसी कारण उसका जैसा और जितना उपयोग एवं उपभोग किया जा सकता है। पानी के ये गुण उस पर आये विकट संकट के कारक और कारण बने हैं।

इस संदर्भ में पानी हमें यह सबक भी देता है कि पानी जैसा सर्व उपलब्ध, सीधा, सरल, लचीला भी नहीं होना चाहिए। अन्यथा दूसरों द्वारा गलत इस्तेमाल किए जाने की संभावना बड़ जाती है।

हमारे समाज में जल को देवतुल्य मानते हुए उसमें विष्णु का वास माना गया है। सभी धर्म ग्रन्थ्रों वेद, पुराण, उपनिषद आदि में इसका उल्लेख है। शताब्दियों पूर्व कवि रहीम की यह पंक्तियाँ ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून, पानी गए न उबरे, मोती मानस चून’ प्रकृति और जीवधारियों के लिए पानी की अनिवार्यता और तत्कालीन समाज में पानी के प्रति गम्भीर और सचेत चिन्तन को सार्वजनिक करती हैं।

भारतीय जीवन दर्शन के ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटम्बकम्’ के विचार को संत कबीर जल की प्रकृति से सार्वजनिक करते हैं कि ‘‘कबिरा कुआँ एक है, पानी भरे अनेक, भांडे में ही भेद है, पानी सबमें एक।’’ अर्थात हम मानव रंग, रूप, आकार, जाति, क्षेत्र, धन-दौलत, शिक्षा आदि से अलग-अलग हो सकते हैं पर हममें निहित जल एक ही है। निःसंदेह, जल सम्पूर्ण जीवधारियों को एकाकार कर देता है।

‘भारतीय मध्य हिमालय में जल: संस्कृति एवं आर्थिकी’ किताब पढ़ते हुए मुझे गढ़वाल के इतिहास में उल्लेखित ‘बावनी का अकाल’ और सन् 1920 की स्पैनिश फ्लू महामारी से आम जनजीवन के उभरने के प्रेरक किस्सों का ध्यान आ रहा था। (विक्रम संवत् 1852 के अकाल को गढ़वाली लोकजीवन में ‘बावनी का अकाल’ कहा जाता है।) विक्रम संवत् 1852 (सन् 1795) के भयंकर अकाल में गढ़वाली लोग कई दिनों तक भूख से बेहाल रहे परन्तु उन्होने अपनी तोमड़ियों में सुरक्षित रखे खेती के परम्परागत बीजों को नहीं खाया। (बीज रखने के लिए तोमड़ियाँ बनायी जाती हैं। इस हेतु तंदुरुस्त लोकियों को झाल में ही सुखाया जाता है। फिर उनके अन्दर बचे-खुचे को बाहर निकाल कर उसके खोल में कृषि उपज के स्वस्थ्य बीजों को रखा जाता है। ऐसा करके बीजों पर कीड़ा नहीं लगता और वे दीर्घकाल तक सुरक्षित रहते हैं।) उनका विश्वास था कि अकाल के बाद के विकट समय को इन मौलिक बीजों के बल पर वे परास्त कर फिर खुशहाली का जीवन जियेंगे। ये विश्वास सही साबित हुआ।

इसी तरह सन् 1920 की स्पैनिश फ्लू महामारी (इस महामारी की वजह से उत्तराखण्ड की जनसंख्या जो सन् 1911 में 22 लाख थी घटकर सन् 1921 में 21 लाख अर्थात इन 10 सालों में 1 लाख कम हो गई थी।) के समय भी पहाड़ के लोग जान बचाने जगंलों की ओर भागते समय अपने मूल्यवान धन के साथ तोमड़ियों में खेती-किसानी के बीजों को ले जाना नहीं भूले थे। स्पैनिश फ्लू महामारी के टलने के बाद तोमड़ियों में सुरक्षित इन्हीं बीजों के कारण अपनी जीवन-चर्या को फिर से चलाने में उन्हें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई थी।

उक्त प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख इस संदर्भ में किया जा रहा है कि मध्य हिमालयी लोक जीवन की विरासत में मिली ऐसी प्रबल एवं सकारात्मक भावनाओं के बल पर आज हम अपने विलुप्तप्रायः जीवनीय संसाधनों को जीवन्त कर सकते हैं। संकटग्रस्त प्राकृतिक जल सम्पदा इनमें से एक है।

जल पर मूलभूत, प्रामाणिक एवं वैज्ञानिक जानकारियों को लिए यह किताब इसी तथ्य और कथ्य को बहुत ही रोचक और सारगर्भित रूप में सार्वजनिक करती है। यह किताब 19 अध्यायों के फैलाव में जल के बहुआयामों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करती है। यथा- जल और जीवन, जल का विज्ञान, सनातन संस्कृति में जल, उत्तराखण्ड में जल निधि, उत्तराखण्ड में मोक्षदायिनी गंगा, उत्तराखण्ड में जल संरक्षण, संचयन एवं प्रबंधन की पुरातन पद्धतियाँ, नौले: जल मंदिर, उत्तराखण्ड में जल संरक्षण, संचयन एवं प्रबंधन की आधुनिक पद्धतियाँ, उत्तराखण्ड में जल संकट के कारण, उत्तराखण्ड: जल एवं आर्थिकी, उत्तराखण्ड: जल संकट एवं आर्थिकी, पनचक्की (घराट अथवा घट), उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति एवं लोकसाहित्य में जल, उत्तराखण्ड में जल तथा वर्षा से सम्बन्धित देवी-देवता, वर्षा के अनुमान हेतु प्राचीन युिक्तयाँ, उत्तराखण्ड में जल पर आधारित स्थानों के नाम, उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में जल से सम्बन्धित बर्तन, रीति-रिवाजों तथा संस्कृति में जल, जलीय पौधे तथा उनका महत्व अध्यायों के साथ यह पुस्तक जल पर केन्द्रित एक शोधपरख संदर्भ पुस्तक है।

यह किताब जल की संरचना से प्रारम्भ होकर वैश्विक, भारतीय और मध्य हिमालय में जल संसाधन, जल संकट और भविष्य की संभावनाओं एवं समाधानों को इंगित करते हुए विराम लेती है। किताब पानी के तेजी से बड़ते व्यापारिक उपयोगों से उपजी चिन्ता को जाहिर करती है।

आज विश्व के सबसे बडे कारोबारों में पीने का पानी अपनी जगह बना चुका है। दूसरी ओर उपलब्ध पानी के असमान वितरण और उपयोग के कारण विश्व में 1.5 अरब लोगों को शुद्ध पानी नहीं मिल पा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व में प्रति वर्ष 20 लाख लोगों की पानी की अनुउपलब्धता और दूषित पानी के सेवन से मृत्यु हो जाती है। जिसकी भयावहता आने वाले समय में और भयंकर होगी। दुनिया के विभिन्न देशों, राज्यों एवं क्षेत्रों में आपसी तनाव, वैमनस्य और लड़ाइयों के मूलभूत कारणों में कहीं न कहीं पानी का संकट शामिल है।

आज विश्व के 43 देशों में आपसी तनाव और लड़ाई-झगड़े चल रहे है जिसमें 27 पानी के हक को पाने के लिए हो रहे हैं।

भारत में विश्व की कुल जल सम्पदा का 4 प्रतिशत है जबकि मानव आबादी लगभग 17 प्रतिशत और पशुधन 20 प्रतिशत है। गम्भीर बात यह है कि भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता तेजी से घट रही है। कुछ शोध तो इसमें 70 प्रतिशत की कमी मान रहे हैं, जो भयावह स्थिति है। विडम्बना यह है कि अन्य समस्याओं की तरह पानी के संकट पर चिन्ता तो है पर सही चिन्तन का अभाव है। विश्व में 80 प्रतिशत पानी का स्त्रोत पर्वत़ हैं। देश के 16 प्रतिशत भू-भाग में फैला भारतीय हिमालय 60 प्रतिशत जल की आपूर्ति करता है।

हिमालय को पानी की मीनार कहा जाता है पर आज पानी के मामले में हिमालय खुद बीमार है।

प्रस्तुत पुस्तक में गढ़वाल-कुमाऊँ में जल स्त्रोतों यथा- हिमनद, ताल, झील, भूमिगत जल, जलाशय, नदियाँ, चाल, खाल, चुपटौला, खंती, सिमार, नौला, धारा (सिरपत्या, मुणपत्या, पतबीड़िया), कुण्ड, गूल, कूल, ढ़ाण, धाब, गधेरे, गाड़, कुँए, बाँध, नहर, बैराज, हौज, टैंक, हैंडपम्प, चैकडैम, ट्यूबवैल, नलकूप, अमृत सरोवर, आदि पर मौलिक जानकारियाँ है।

इस किताब में उल्लेखित है कि उत्तराखण्ड में नौलों को ‘जल मंदिर’ का दर्जा दिया है। ताकि उसकी पवित्रता बनी रहे। अग्रेंज कुमाऊँ कमिश्नर ई.ई. ग्रे द्वारा सन् 1895 में धारानौला (अल्मोड़ा) के निर्माण के लिए व्यक्तिगत रूप से 10 रुपये दानस्वरूप दिए जाने की प्रकाशित खबर उस समय के अधिकारियों की जनसरोकारों के प्रति संवेदनशीलता एवं समर्पण को इंगित करती है। कवि सुमित्रानन्दन पंत के पैतृक गाँव स्यूनाराकोट (अल्मोड़ा) के प्रसिद्ध नौला का इस किताब में विशेष उल्लेख है। स्यूनाराकोट के इस नौले का निर्माण सन् 1522 में बताया जाता है। निर्माणकला और वास्तुकला का यह अनुपम उदाहरण है। स्यूनाराकोट का नौला राष्ट्रीय महत्व का प्राचीन स्मारक माना जाता है।

किताब में वर्तमान समय में नौलों के रखरखाव और उससे जुड़े रीति-रिवाजों के विलुप्त होने की चिन्ता और चिन्तन को प्रस्तुत करते हुए उनके पुर्नजीवन के लिए जन सहभागिता के प्रयासों का उल्लेख किया गया है। गढ़वाल-कुमाऊँ के जनजीवन में जल की महत्वा का एक उदाहरण यह भी है कि जब नव नवेली दुल्हन ससुराल के घर में प्रवेश करती है तो सबसे पहले उससे जल के प्राकृतिक स्त्रोत धारे अथवा नौले का पूजन कराया जाता है। पारिवारिक विरासत एवं सम्पत्तियों में सर्वप्रथम जल सम्पदा से दुल्हन का परिचय कराना जीवन में जल की सर्वश्रेष्ठता का प्रतीक है।

इस किताब में मध्य हिमालय की प्रमुख नदी गंगा के पौराणिक स्वरूप, उत्पति, सफरनामा, औषधीय गुण, प्रदूषण की स्थिति एवं स्तर तथा नमामि गंगे अभियान को विश्लेषित किया गया है। किताब बताती है कि गंगा का उदगम माना जाने वाला गोमुख ग्लेश्यिर तेजी से पिघल रहा है। यह दर लगभग 20 मीटर प्रति वर्ष आँकी गई है। इसका प्रमुख कारण बढ़ता तापमान, वनों का कटान, कम बर्फबारी, मानव हस्तक्षेप, प्रदूषण, ज्यादा बारिश आदि माने गए हैं। चिन्ताजनक है कि उच्च इलाकों में हिमपात से ज्यादा बारिश हो रही हैं। इससे ग्लेश्यिरों के पिघलने की दर तेज हो गई है। पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण ग्लेशियरों का रंग काला होने लगा है। इनके सतह पर कचरे एवं काबर्न की काली परत जमती जा रही है।

यह किताब इस ओर ध्यान दिलाती है कि जहाँ भूमिगत जलस्त्रोतों वाली नदियों का पानी विगत दशकों में निरंतर कम हो रहा है तो दूसरी तरफ ग्लेश्यिरों से जन्मी नदियों के पानी में अनायास ही बृद्धि हो रही है। भूमिगत जलस्त्रोतों के जलसंचयन क्षमता के घटने और जगह-जगह पर हो रहे खनन एवं अन्य मानवीय हस्तक्षेप से नदी क्षेत्र में जल प्रवाह कम होता जा रहा है। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से तेजी से पिघलते ग्लेश्यिरों के कारण ग्लेशियर से जन्मी नदियों में पानी बढ़ने लगा है। ये दोनों ही स्थितियाँ चिन्ताजनक हैं।

किताब में दर्ज जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की यह कविता जल संकट के परिपेक्ष्य में हम-सबके लिए चेतावनी है-
‘‘सारा पानी चूस रहे हो, नदी समन्दर लूट रहे हो।
गंगा-यमुना की छाती पर, कंकड़-पत्थर कूट रहे हो।
ऊफऽ ! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी।…

किताब के आलेख संकेत करते हैं कि पानी की बचत का विचार हमारे चिन्तन में तो है पर आचरण में नहीं है। दैनिक कार्यो एवं समारोहों में जिस तरह से पानी का अनावश्यक प्रयोग हम स्वयं करते और दूसरों को देखते हैं, वह चिन्तनीय है। विडम्बना यह है कि हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी अपने लापरवाह आचरण में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं ला पा रहे हैं।

बचपन में हमने गाड-गधेरे, झरने और मदमस्त नदियाँ देखी हैं। आज उनमें से अधिकाँश केवल हमारी यादों में बहते हैं। उन गाड-गधेरों की जगहों पर रौखड़ नज़र आते हैं। उनकी स्मृतियाँ आँखों को तरल करती हैं। तो क्या आने वाले समय में पानी आदमी की आँखों मे ही बचा रहेगा? आज पानी के लिए एक आम आदमी की जिन्दगी पानी-पानी हो रही है।

हमने आदमी का मरना देखा-सुना है पर नदियों का मरना हम देख रहे हैं। अगर अब नहीं चेते तो बाद में चेतने के लिए भी वक्त भी नहीं रह जायेगा। पानी के संरक्षण एवं सवर्द्धन में दुनिया ‘करो या मरो’ की स्थिति में है। ‘सूखेंगी नदियाँ तो रोयेंगी सदियाँ’। लिहाजा, पानी को हम सही तरीके बचायें या फिर धरती पर जीवन के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दें।

इस किताब के विद्वान लेखकों ने माना है कि एक सामान्य आदमी को अच्छे काम की शुरुआत करने का संकोच होता है। हमें सर्वप्रथम उस संकोच को तिलांजलि देनी होगी। असल में पानी को बचाना और स्वयं अपने अस्तित्व को बचाये रखना एक दूसरे के ही पूरक हैं। यह हम जान लें कि ‘पानी बचेगा तभी जीवन रचेगा’।

जल पर केन्द्रित शोध आलेखों की यह किताब प्रकृति एवं मानवीय समाज के बहुआयामी पक्षों को उनकी मौलिकता, उपलब्धता, उपादेयता के साथ उनकी समस्याओं, भविष्य के संकटों और उनके समाधानों को सार्थक रूप में रेखांकित करती है। समाज के विविध क्षेत्रों एवं विषयों से जुड़े प्रबुद्धजन, बुद्धिजीवियों, शोधार्थियों आदि के लिए एक संदर्भ साहित्य के रूप इस किताब ने अपनी लोकप्रिय पहचान बनाई है।

पुस्तक – भारतीय मध्य हिमालय में जल: संस्कृति एवं आर्थिकी
संपादन- डाॅ. जितेन्द्र कुमार लोहनी, प्रो. पी. सी. पाण्डे, डाॅ. अशोक कुमार पन्त
संस्करण- प्रथम, 2025, पृष्ठ- 223, मूल्य- ₹ 300
प्रकाशक- पीपुल्स एसोसिएशन ऑफ हिल एरिया लांचर्स (पहल), एवं शब्द संस्कृति प्रकाशन, देहरादून, उत्तराखण्ड

समीक्षक – डा० अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पो.- सीरौं-246163
पट्टी- असवालस्यूँ, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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