पिछले दिनों मुख्यमंत्री धामी की धान की रोपाई, हल चलाते हुए फोटो वायरल हुई। कई लोगों ने जमकर तारीफ की कई लोगों ने मजाक उड़ाया।
खैर, इस फोटो को देखकर पहाड़ से भी लाख हेक्टेयर के करीब बंजर पड़ी जमीन ने भी आवाज लगाई और लोगों से कहा कि फोटोशूट के बहाने ही वह वापस लौटे और उन खेतों को स्थाई ठिकाना बना चुकी झाड़ियों को काटे, जमीन के उपर बंजर पड़ उस मोटी परत को हल और कुदाल से उलटकर उस मिट्टी को उतना ही कोमल बनाए जितना वह रहा करती थी। नर्म और कोमल मिट्टी में बीज सृजन करते हैं, सख्त और बंजर जमीन पर झाड़ियां ही उग आती है जो अंततः गुलदार, जंगली सुअर का रिहायश बनती है और वह गांव के दूसरे लोगों और खेतों के लिए खतरनाक साबित होती है।
एक अनुमान के मुताबिक राज्य में 2,15,982 हेक्टेयर भूमि राज्य गठन के बाद बंजर हो गई है। राज्य हर साल औसतन 3672 हेक्टेयर कृषि भूमि गंवा रहा है। तराई इलाकों में कृषि भूमि पर तेजी से प्लाटिंग, आवासी परियोजनाएं उग रही हैं, पलायन की मार से पहाड़ी भूमि बंजर हो रही है। जलवायु परिवर्तन और जंगली जानवरों का प्रकोप भी लोगों को खेती से दूर कर रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का खेत में उतरना भले ही सांकेतिक हो, लेकिन मिट्टी में उतरने का भी जज्बा ही चाहिए। हां, यह भी हकीकत है प्रदेश में कृषि मंत्रालय की कमान ऐसे मंत्री के हाथ पर है जिस पर उद्यान में हुए करोड़ों के घोटाले का आरोप लगता रहा है, कृषि को लेकर उनकी समझ उतनी ही है कि खाली जमीनें बस उन्हे प्लॉट की तरह दिखते होंगे। इस बात की तस्दीक इस बात से होती है कि उनके खिलाफ फिलहाल आय से अधिक संपति जोड़ने का भी मामला भी लगातार सुखिर्यों में बना हुआ है।
हम देहरादून समेत तराई इलाकों में मिट्टी को सीमेंट के फैलते समुद्र में खोते देख रहे हैं, पहाड़ों में बंजर जमीनों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। बाकी कृषि योग्य भूमि विकास की महापरियोजनाओं की भेंट चढ़ रही है। कर्णप्रयाग रेलवे लाइन के लिए ही कुछ 800 हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया जिसमें से कई हेक्टेयर बेहद उपजाउ हिस्से भी थे जो अब रेलवे परियोजनाओं से उड़ रही धूल, मिट्टी से बंजर पड़ गई है। सुरंगों के निर्माण से पेयजल स्रोत खत्म हुए तो इस इलाके में धान की रोपाई भी भी बड़ा असर पड़ा। वहीं, 12 हजार करोड़ रूपए की लागत से बन रही 825 किमी लंबी ऑल वेदर रोड में भी हजारों हजार हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया।
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