हम-सबके अपने-अपने ‘वो साल चौरासी’
By Dr. Arun kuksal
‘‘…द ल्वाळआ कळया, अफुथैंन भारी हीरो समझदी क्य! पर क्य कन यार…त्वे दिख्याँ बिना भि नि रयेंदु! जब क्वी छोरी त्वे दगड़ बात करदी छई त मन ब्वादु छायो कि वींका भि अर त्यारा भी पळ्य द्वी आँखा निखोळी द्यूँ! अर हाँ…अच्छु व्ह्े वीं कु ब्यो व्हेगे, निथर तू वींका ही फेर मा पोडयूँ रैंदू…! (ओ रे लॉटे कालिये, अपने को बड़ा हीरो समझता है क्या! लेकिन क्या करूँ यार…तुझे देखे बिना भी रहा नहीं जाता! जब कोई लड़की तेरे साथ बात करती थी तब मन कहता था कि उसकी भी और तेरी भी आँखें एक ही झटके में निकाल दूँ! और हाँ…अच्छा हुआ उसकी शादी हो गई, नहीं तो तू उसके चक्कर में ही पड़ा रहता…!)’’ (पृष्ठ-42)
‘‘भैजी…आज से तुम्हारी रोज की दौड़ की छुट्टी। वीं कु ब्यो हे्ग्या (उसका विवाह हो गया)…मुझे काटो तो खून नहीं…मेरी तरफ से एक तरफ़ा ऐसा प्यार था जिसका आदि न अंत…!’’ (पृष्ठ-50)
‘‘…तुम्हें विश्वास न हो तो उस गेंठी के पेड़ को देख आना। जब भी हम घास काटने जाया करते थे, वह उस पर उसी चादर का एक और टुकड़ा बाँधती थी जिसे फाड़कर उसने कभी एक बार तुम्हारे दराँती से कटे अंगूठे पर बाँधा था। सच मानो तब से न किसी ने उस पेड़ से घास ही काटा न उसने किसी को घास काटने दिया।…उस पेड़ से उसने तुमसे शादी की मन्नत माँगी थी। तुम इतने निष्ठुर निकले कि उसका दिल तोड़ कर दिल्ली में ही मंगनी कर ली। और, उसकी खबर लेने तब आ रहे हो जब उसकी शादी हो रही है, ताकि उसकी डोली उठते देख सको।’’(पृष्ठ-99)
‘‘…उस पेड़ ने मेरी तीन बहुत प्यारी चीजों के संजोग को निभाया…। लेकिन मुझे उसकी पीर तीनों बार तब पता चली जब सब कुछ निबट चुका था।…! मेरा पहला प्यार…मेरे पिता और मेरे ताऊ…मेरा सब कुछ…!’’(पृष्ठ-107)
बस, इतनी सी कहानी है ‘वो साल चौरासी’ की।
पर इस बित्तेभर की कहानी की बैचेनी ने उससे ही उसको ताउम्र छीन लिया। ये बात और है कि नित्य-प्रतिदिन का जीवनीय वक्त उन घावों को उभरने नहीं देता है। परन्तु, उसकी कसक दिल के सबसे नाजुक कोने में हर समय उसे कचौटती रहती है। उसी कसक की कथा-व्यथा को उसने जग-जाहिर किया है।
सच तो ये है कि ऐसी ही मिलती-जुलती जीवनीय नियतियों से सभी गुजरते हैं। मेरी हम-उम्र के महानुभावों के अपने-अपने ‘वो साल चौरासी’ हैं और होंगे। इस किताब को पढ़कर एक भूली सी कहानी उनको जरूर याद आयी होगी। ये बात और है कि वे उस समय इस किताब को पढ़ते हुए मुस्करायें होंगे या फिर उस अतीत के अर्न्तद्वन्द्व में अनमने से हुये होंगे। इस समीक्षा की टिप्पणियों में वे इसे सार्वजनिक करेंगे या नहीं, यह सशंय है।
करेंगे भी तो मनोज इष्टवाल जैसे बेधड़ तरीके से तो नहीं, ये बात तय है।
मनोज इष्टवाल चर्चित पत्रकार हैं। बिंदास भी और बहुआयामी भी। जीने और कार्य करने का उनका तरीका और नज़रिया जरा हटकर है। इसलिए, मित्रों की जुबाँ और नज़र में वे बने रहते हैं। ‘वो साल चौरासी’ आत्म-संस्मरण से बतौर लेखक वे मित्रों और पाठकों में नई चर्चा में हैं।
चंगीज आइत्मातोव का विश्व चर्चित उपन्यास ‘पहला अध्यापक’ का नायक दूइशेन और नायिका आल्तीनाई के अनकहे प्रेम, पवित्र और त्यागपूर्ण संबंध इस विचार को पुष्ट करते हैं कि प्रेम में ‘केवल और केवल’ देना होता है। पाने की इच्छा मात्र ही प्रेम की आत्मा को कमजोर कर देता है।
लेखक मनोज इष्टवाल के मन ही मन के ऐसे ही प्रेम प्रसंगों की कशिश की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है ‘वो साल चौरासी’। लेखक ने स्वीकारा है कि ‘‘अतृप्त प्रेम एक गहरी भावना है जो व्यक्ति को मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से प्रभावित करती है। इसका प्रभाव सकारात्मक हो सकता है यदि इसे सही दृष्टिकोण से देखा जाए, और नकारात्मक हो सकता है यदि इसे संभालने में कठिनाई हो।’’
वास्तव में, ‘वो साल चौरासी’ पुस्तक की प्रेम कहानियों का एक प्रमुख हिस्सा मनोज इश्टवाल का व्यक्तिगत हो सकता है। परन्तु पुस्तक की मूल आत्मा बीसवीं षताब्दी के उत्तरार्ध के दशकों में जन्में उन अधिकाँश उत्तराखण्डी व्यक्तित्वों की ही है जो ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले और पढ़े। आधुनिक शिक्षा और जीवकोपार्जन को हासिल करने के लिए बाहरी दुनिया की ओर वो निकले। भौगोलिक विकटताओं, शैक्षिक पिछेड़ेपन और आर्थिक अभावों को पीछे धकेलते हुए वे जीवन और जीविका के क्षेत्र में विख्यात हुए। उनके जीवन को शिक्षा और आर्थिकी ने समृद्ध जरूर किया। लेकिन बाहरी जीवन की नित्य नई जरूरतों, अपेक्षाओं और दायित्वों के भ्रमजाल ने उन्हें जीवन-भर अपने में ही समेटकर रखा। इस जीवनीय प्रक्रिया में आज वे अपने मूल गाँव, इलाके और जन-जीवन से बेगाने हुए हैं।
वे उन व्यक्तियों को भुला बैठे जिनके साथ (लड़कपन में ही सही) जीवन जीने के वायदे वे कर चुके थे। जिस समाज और क्षेत्र से वे बाहर निकले थे, वो उनके जीवनीय नेपथ्य में विलीन हो गया। परन्तु मन के किसी कोने में अवचेतन अवस्था में समाई वे अनगिनत यादें कभी-कभार उनसे मुखातिब हो ही जाती हैं।
यह पुस्तक विगत शताब्दी के अस्सी के दशक के निम्न मध्यमवर्गीय पहाड़ी किशोर के माध्यम से उस दौर के युवाओं की मनोभावनायें, उनके संघर्ष, लोक जीवन से उनका लगाव, समर्पण, माता-पिता की परेशानियों को समझने की प्रवृत्ति, ग्रामीणों के अपने-अपने संघर्ष, उनके रिश्ते, आपसी मनमुटाव, ईष्या, पिता-पुत्र के आपसी रिश्तों का तनाव और लगाव, संयुक्त परिवारों का बाहुल्य, शहरी प्रवासियों की मनोवृत्ति, महानगरों में प्रवासियों की मजबूरियाँ, किशोर-किशोरियों के आपसी संवाद, युवाओं के एक-दूसरे प्रति आकर्षण के तौर-तरीके, उनके लड़ाई-झगड़े, शिक्षकों और विद्यार्थियों के आपसी उत्तरदायित्व, विद्यालयों का अनुशासन, शहर से गाँव में आये कुटम्बजन के स्वागत की परम्परा, तीज-त्यौहार, उत्सव, मेलों का परिदृश्य आदि को 16 अध्यायों में जीवन्त तरीके से सार्वजनिक करती है।
उस दौर के किशोर-किशोरियों के आपसी बातचीत के कोड वर्ड के एक रोचक प्रसंग का आनंद लीजिए- ‘बहे बक्या बबात बव्हे’’ ‘‘बकुछ बनि बबोली बएँन…!’’ भाषा में बात होने लगी…! क्या आप भी समझ सकते हैं इस भाषा शैली को? नहीं समझ तो हर शब्द के आगे का ‘ब’ निकाल दीजिए…। पूरी बात समझ में आ जायेगी। उन्हें लगा कि मैं कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं इस कोडवर्ड भाषा शैली को जानता था। मैंने वहाँ से खिसकना ही उचित समझा।’’ (पृष्ठ-31)
इस पुस्तक में लेखक की यादें निताँत व्यक्तिगत हैं। परन्तु इन यादों के खजाने को सार्वजनिक करके वह नये जमाने को बताने के लिए बेताब है। जीवन में यह क्यों, कब और कैसे घटित हुआ यह अभी भी अनुत्तरित है। आज ‘उसके लिए वे’ और ‘उनके लिए वो’ अन्जाने है। पर वो यादें हैं कि रोज चली आती हैं, वक्त-वेवक्त उससे मिलने, बतियाने और उसको सहलाने। ताकि जीवन की नर्म नमी जीवंत रहे।
मनोज इष्टवाल ने सीधी-सपाट भाषा में जीवन में जो हुआ, देखा और समझा उसे बेबाकी से अपनी आत्मकथा में सार्वजनिक कर दिया। अपने आत्म-संस्मरणों को संवेदनाओं की सरिता में लेखक ने निर्बाध रूप में बहने दिया है। उसे बांध कर एक निश्चित दिशा देने की उन्होने अनावश्यक चेष्टा नहीं की है। इसमें पहाड़ी नदी की तरह एक ठेठ पहाड़ी आदमी के निरंतर प्रवाहमान व्यक्तित्व की कहानी है जिसे कहीं ठौर नहीं।
लेखक जीवन में कहाँ-कहाँ नहीं भटका और कैसे-कैसे खतरों का बचपन से सयानेपन तक सामना नहीं किया? लेकिन भटकनों की इस यात्रा में उसका मन तो जखेटी इण्टर कालेज, धारकोट, नैल, खरगड़ नदी, क्रिकेट, गाय-बकरी चराना, किक्रेट, मुण्डनेश्वर मेला, अगरोड़ा, पैडुल, चिठ्ठी लिखना फिर उसे फाड़ना, चन्द्रप्रकाश, गोकुल, धर्मा जोगी आदि मेें अटका रहा। ‘ऊधौ मोहि बृज बिसरत नाहीं…यह मथुरा कंचन की नगरी मनिमुत्ताहल जाही’ जैसे चरम वियोग के भाव इस किताब में हैं। इसीलिए, लेखक के ‘मन का हंस’ तो आज भी यही कहता है ‘जैसे उडि जहाज कु पंछी, फिर जहाज पर आवे’।
ये महज आत्मकथा और आत्मसंस्मरण नहीं हैं। क्योंकि, ज्यादातर आत्मकथाओं और संस्मरणों में दिखाई देने वाली आत्ममुग्घता इस किताब के लेखक मनोज इष्टवाल के लेखन में सिरे से गायब है। यह उनकी लेखकीय ईमानदारी, हिम्मत, उदारता और साफगोई का ही कमाल है। ऐसा करके उन्होने पाठकों को भी अपनी-अपनी जिन्दगी के सच को स्वीकार करने का हौसला प्रदान किया है।
इन अर्थों में ‘वो साल चौरासी’ पुस्तक मात्र नॉस्टेल्जिया नहीं है।
यह किताब बताती है कि आदमी की नियति भी क्या है कि उसे दुनियादारी के तथाकथित मानकों को बनाये रखने के लिए प्यार तो छुप कर करना होता है। लेकिन अपना गुस्सा और नफरत को बेहिचक बोलने और करने में उसे कोई ज्यादा संकोच नहीं होता है। जिसे वह दिल से जिसे चाहता है उससे जाहिर करने में संकोच करता है। और जिससे बात नहीं करना चाहता उससे बात करना अक्सर उसकी मजबूरी हो जाती है। तभी तो मन की बात मन में ही रह जाती है। और इसी अधूरेपन में आदमी का संपूर्ण जीवन बीतता जाता है।
मित्र जयप्रकाश पंवार ने सही लिखा है कि ‘वो साल चौरासी’ जैसी पुस्तक उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में एक नवीन लेखकीय पहल है। इस पुस्तक के माध्यम से मनोज इष्टवाल ने हजारों-हजार उत्तराखण्डी मित्रों की मनोभावों को जग-जाहिर किया है। इस तथ्य को स्वीकारते हुए पत्रकार और लेखक मनोज इष्टवाल को इस चर्चित पुस्तक के लिखने और उसके प्रकाशन की बधाई और शुभाशीष।








