Sunday, September 13, 2026
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कब तक उपेक्षित रहेगा दलितों का पर्यावरण?

Himalaya diwas

@सुरेश भाई

देशभर में अनुसूचित जाति जिन्हें दलित भी कहा जा रहा है । उन पर लगातार कई हमले हो रहे हैं जो बहुत चिंताजनक है। इन्हें अछूत बनाकर रखना भी हिंदू समाज पर बहुत बड़ा कलंक है।
इस विषय पर यह लेख पर्यावरणविद सुरेश भाई ने लिखा है जिसे हम यहां साझा कर रहे हैं
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कब तक उपेक्षित रहेगा दलितों का पर्यावरण?
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आजादी के बाद बापू का सपना था कि समाज में अनुसूचित जाति को समान अधिकार दिलाएंगे। क्योंकि समाज में उनकी स्थिति आज भी अछूत जैसी है। इनके साथ अपराध के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। वे न तो खुले रूप से मंदिर में जा सकते हैं।अपनी बेटी- बेटा की शादी डोली या घोड़ी में बिठाकर भी नहीं कर सकते हैं। यदि किसी ने हिम्मत भी की होगी तो उच्च वर्ग के लोगों ने उन्हें प्रताड़ित किया। गांव समाज में भी उनके पक्ष में कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया है।आज भी उन्हें गांव में जल स्रोतों के पास पानी भरने के लिए तब तक इंतजार करना पड़ता है जब तक उच्च वर्ग के लोग वहां से पानी लेकर घर नहीं पहुंचते।
देश में बहुत सारी योजनाएं दलितों के नाम पर संचालित हो रही है लेकिन अधिकांश दलित समाज को पता ही नहीं है कि उनके लिए किस तरह से केंद्र और राज्यों में आर्थिक संसाधनों को उपलब्ध किया जा रहा है। उनमें से यदि किसी के पास जानकारी होगी भी तो आसानी से उन्हें मदद नहीं मिल पाती है। सत्ता और राजनीति भी ऐसी है कि आरक्षण के नाम पर चुने हुए जनप्रतिनिधि भी उपेक्षा महसूस करते हैं। अपने ही दलों के अंदर बड़े नेता उनके अपमान करने पर उतरु रहते हैं। अनुसूचित जाति के साथ इस तरह के अत्याचार का एक ही कारण है कि उच्च वर्ग के लोगों की मानसिकता में अभी इतना परिवर्तन नहीं हो पाया की जो शरीर, रक्त, हाथ- पैर, आंखें, दिमाग, सोचने और समझने की कला और एक जगह से दूसरे जगह जाने की हिम्मत उनमें है। वही दलित वर्ग में भी मौजूद है। जिस दिन उच्च वर्ग के हृदय में यह परिवर्तन हो गया समझ लीजिए कि उसके बाद ही दलितों पर होने वाले अत्याचार कम हो सकते हैं।
डॉ० भीमराव अंबेडकर ने भारत के संविधान में आरक्षण भी इसीलिए रखवाया ताकि उन्हें हर स्तर पर उनकी निश्चित जनसंख्या के आधार पर अधिकार मिले और वे हीन भावना से आगे निकल सकें। आज आरक्षण का विरोध भी कई राजनीतिक दलों के लोग स्वर्ण मानसिकता के कारण ही करते हैं। क्योंकि वे सोचते हैं कि दलित वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरी में आने की क्या जरूरत है? जो लोग वर्षों तक उनकी खेती बाड़ी का काम करते रहे, कृषि के औजार बनाये, पैरों को सुख देने वाले जूते बनाये, सुंदर-सुंदर डिजाइन के कपड़े सिले, खाने पकाने के बर्तन बनाये, भवन और मंदिर निर्माण के शिल्पी रहे। आज शिल्पकार दलितों के ये सारे काम पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट के पास चले गए हैं। जिसके कारण उनकी शिल्प कला हासिये पर चली गई है।उनका रोजगार संकट में पड़ गया।
जबकि दलित भी उसी पर्यावरण में रहते हैं जिसमें समाज के अन्य सभी वर्गों के लोग अपना जीवन यापन करते हैं। जब इस तरह के शोषित,उपेक्षित वर्ग के पढ़े लिखे युवक- युवतियां कहीं सरकारी नौकरी में दिखाई देते हैं तो वहां भी उन्हें दलित वर्ग में पैदा होने का एहसास होता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि सरकारी, गैर सरकारी और अन्य सभी कामकाज में यदि कहीं दलित वर्ग की हिस्सेदारी है तो समझ लीजिए कि वहां पर भी दो तरह का समाज स्वर्ण और अवर्ण में विभक्त दिखाई देते हैं।
आजादी के बाद समाज में इस विषमता को दूर करने के लिए लगभग दो दशक तक गांधी विचार के अनुयायियों और सत्ता पक्ष के प्रतिनिधियों ने मिलकर समाज में अछूत वर्ग को मंदिर प्रवेश करवाने का काम किया था। साथ-साथ उनकी बस्तियों में शिविर सम्मेलन के दौरान सामुहिक भोजन करने का एक सरकारी कार्यक्रम भी रहा है जो अब केवल चुनाव के दौरान में दलितों की बस्ती में वोट के नाम पर जलपान अथवा सामूहिक भोजन में नजर आता हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद उनकी बस्ती को झांकने तक की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
चिंता जनक है कि हर घंटे में दलितों के साथ 5 अपराध हो रहे हैं।सरेआम दलितों को जलाना, पीटना- मारना, शोषण करने जैसे अत्याचारों को हर दिन मीडिया प्रकाशित कर रहा है। हाल के दिनों में दलितों पर हुए अत्याचार के आंकड़े बताते हैं कि यूपी में 15368, राजस्थान में 8752, मध्य प्रदेश में 7753, बिहार में 6509, उड़ीसा में 2902, महाराष्ट्र में 2743 घटनायें हुई हैं।और इसके बाद के आंकड़े अन्य राज्यों में भी है। उत्तर प्रदेश इसमें सबसे आगे हैं जहां 15368 अत्याचारों में ही 189 मर्डर, 939 दलित महिलाओं पर हमले, 617 किडनैप आदि किए गए हैं। समाज में दलितों पर यह अत्याचार उच्च मानसिकता के कारण है। यह तभी रुक सकता है जब मनुष्य छुआछूत की भावनाओं को त्याग दें और हर रोज जिस तरह से पत्र- पत्रिकाओं में नेताओं की स्मृतियों के विज्ञापन छपते रहते हैं। उसी तरह से कोशिश होनी चाहिए कि दलितों के ऊपर अत्याचार रोकने के जितने भी कानून है उसका भी प्रचार- प्रसार हो। टेलीविजन पर भी हर राजनीतिक दल इन अत्याचारों पर खुलकर बोले। वे यह बोलना भी बंद करें कि मेरे राज में इतने दलित मरे और तब तक दूसरा कहता है कि मेरे राज में इससे कम मरे हैं।इस तरह की हास्यास्पद चर्चाएं रोकनी पड़ेगी। जिससे घटनाएं और अधिक बढ़ने वाली है। क्योंकि इससे समाधान के विषय पर कोई बात सामने नहीं आती है।
समाज में सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी और विपक्ष, सामाजिक संस्थाएं मिलकर दलित समाज और स्वर्ण समाज के बीच में सौहार्दता, समानता, एकता, प्रेम और सहानुभूति का वातावरण बनाने के लिए आगे आएंगे तो बहुत लंबा वक्त दलितों पर हो रहे अत्याचार को रोकने में नहीं लगेगा।

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