Saturday, March 7, 2026
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हिमालयी क्षेत्र में उड़ानों को नियंत्रित करना होगा।

हिमालयी क्षेत्र में उड़ानों को नियंत्रित करना होगा।

By Suresh Bhai

मनुष्य अपनी यात्रा को आरामदायक और जल्दी पूरा करने के लिए हेली सेवाओं का इस्तेमाल बड़ी तेजी से कर रहा है।आजकल मध्य हिमालय की पवित्र देवभूमि उत्तराखंड में स्थित चारधाम के दर्शन करने पहुंच रहे यात्री भी हेली सेवाओं के उपयोग करने में पीछे नहीं है। अनेकों कंपनियों के हेलीकॉप्टर यहां बड़ी संख्या में उडान भर रहे हैं। जिसको नियंत्रित करने के लिए गाइडलाइन भी बनायी गयी है। इसके बावजूद भी यात्रा प्रारंभ होने के  पिछले 40 दिनों में पांच हेलीकॉप्टर क्रैश हो गये है। जिसमें तीर्थ यात्रियों ने अपनी जान गंवा दी है।

इस उच्च हिमालयी क्षेत्र की संकरी घाटियों और ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के बीच से गुजर रहे हेलीकॉप्टर्स पहले भी दुर्घटनाग्रस्त हुये हैं।

यहां पर हो रही अंधाधुंध उड़ानें और उसकी तेज आवाज हिमालय की पारिस्थितिकी पर भी विपरीत प्रभाव डाल रही है। यहां हेलीकॉप्टरों की उड़ान के लिए मंदाकिनी नदी के तट से 600 मीटर की ऊंचाई तक का मानक है। यात्रियों की सुरक्षा के विषय पर भी विशेष सावधानी बरतने के लिए दिशा निर्देश दिये गये है। लेकिन हेलीकॉप्टरों की तेज गड़गड़ाहट से उच्च हिमालयी क्षेत्रों की जैव विविधता को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान के द्वारा भी इस हिमालय क्षेत्र में उड़ानों के संबंध में सुझाव दिये गये हैं, जिसे केदारनाथ की हेली सेवाओं की गाइडलाइन में शामिल किया गया है। यहां एक बार में केवल दो हेलीकॉप्टर ही आना जाना कर सकते हैं। सायं के समय की उड़ान पर प्रतिबंध भी लगाया गया है। इसके बावजूद भी यहां पर स्थित दुर्लभ  वन्य जीव जैसे हिम तेंदुए, कस्तूरी मृग,भरड़, भालू, मोनाल समेत अनेक वन्य जीवों व पक्षियों के झुंड के बीच नीची उड़ान के कारण भगदड़ मच जाती है जिसके कारण असुरक्षित दिशा में भागने से इन बेजुबान जानवरों की चट्टानों से गिरकर मौत हो जाती है। वन विभाग भी  समय-समय पर इसकी चेतावनी देता रहता हैं। लेकिन इसके कारण कितने जीव-जन्तु जान गंवा रहे हैं, उसके कोई आंकड़े सामने नहीं आते हैं।

चिंता जनक है कि हजारों हैक्टर में फैले केदारनाथ अभयारण्य, गंगोत्री वन्य जीव पार्क में रहने वाले जीव जंतु सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हेलीकॉप्टरों की नीची उड़ान के कारण वन्यजीवों के सहवास पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। अतः कहा जा सकता है कि प्रजनन पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव के कारण उनकी संख्या भी घट सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नीची उड़ान के कारण यहां पर स्थित ग्लेशियरों के पिघलने की दर को भी बढ़ा सकता हैं। जबकि पर्यटकों और सैलानियों के सैर-सपाटे लिए ओंम् पर्वत जैसे ग्लेशियरों के ऊपर भी उड़ानें भरी जा रही है।

अनियंत्रित पर्यटकों की आवाजाही इसका सबसे बड़ा कारण बन रहा है। क्योंकि बहुत समय से अनुभव किया जा रहा है कि चार धाम के यात्रियों को नियंत्रित करने के लिए जब-जब राज्य सरकार और पर्यावरणविद् पहल करते है तो स्थानीय स्तर पर पर्यटन से आय प्राप्त करने वाले संस्थान इसके विरोध पर उतारु हो जाते हैं। जिसका बार-बार खमियाजा भी भुगतना पड़ रहा है।

मध्य हिमालय में पहुंच रहे पर्यटक कम पैसे, कम समय में आरामदायक दर्शन करने के उद्देश्य से हेली सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। जिसमें यदि सावधानी के लिए बनायी गयी गाइडलाइन का इस्तेमाल नहीं होता है तो उत्तराखंड में पिछले दिनों में पांच हेलीकॉप्टर की क्रैश होने की घटनाऐं  इसकी गवाही है। जिसके बारे में कहा जा रहा है कि लापरवाही और मानकों की अनदेखी के कारण ही दुर्घटनाएं हो रही है। अंधाधुंध हेली सेवाओं के ऊपर विशेष जांच और मॉनिटरिंग की आवश्यकता भी है। जिसमें तकनीक और पायलट के अनुभवों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। मौसम विभाग की अधिकतर सूचनाएं सही साबित हो रही है। इसको भी ध्यान में रखकर लोगों की जिंदगी को बचाने के लिए उड़ानों पर नियंत्रण हो।

चारधाम में मई और जून के महीने में हेलीकॉप्टर दुर्घटनाओं ने बहुत चिंताजनक स्थिति खड़ी की है। जिसमें सबसे पहले 8

मई को उत्तरकाशी के गंगनानी में हेलीकॉप्टर क्रैश में 6 लोग मरे थे। जिसके चार दिन बाद बद्रीनाथ से लौट रहा एक अन्य हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया था। 17 मई को एम्स की हेली एंबुलेंस किसी यात्री को लिफ्ट करने केदारनाथ जा रही थी, लेकिन क्रैश हो गई। 8 जून को केदारनाथ जाने वाला एक और हेलीकॉप्टर क्रैश हो गया। 15 जून को केदारनाथ से गुप्तकाशी जा रहा है एक हेलीकॉप्टर गौरीकुंड के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसमें सात लोगों की जान चली गयी।

दूसरी ओर देखा जाए तो केंद्र  सरकार ने चार धाम के लिए चौड़ी सड़कों का निर्माण लगभग पूरा कर दिया है और इसमें दो बड़ी गाड़ियों के लिए आने जाने की सुविधा है। जितने अधिक से अधिक लोग बस, टैक्सी और जमीन पर चलने वाले वाहनों से यात्रा करेंगे उससे स्थानीय होटल और ढाबों को भी रोजगार मिलेगा। पर्यटकों, यात्रियों, सैलानियों को भी यहां की प्रकृति का नजारा देखने को मिलेगा। बाहर से आने वाले लोगों की मुलाकात स्थानीय लोगों से होगी वे यहां की संस्कृति और प्रकृति के साथ अनुकूल व्यवहार भी करेंगे।

उत्तराखंड हिमालय की संवेदनशील स्थिति और यहां के पर्यावरण से प्लास्टिक उन्मूलन को ध्यान में रखकर के बाहर से आने वाले लोगों की जिंदगी को बचाने के साथ ही हिमालय के इकोसिस्टम को बचा कर रखना होगा।

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