बढ़ई, सुनार, लोहार, डाकी, डोम, ब्राह्मण, खश, कोली जाने कितनी ही जातियों पर ऐसे गीत बनाए जा रहे हैं जिसके केंद्र में या तो जाति है, या वर्चस्व है या फिर महिला है इसलिए जाति और महिला दोनों ही विषय यहां मुद्दे के हैं क्योंकि यह आज गलत है।
माना कि कभी यह स्वाभाविक भी रहा हो लेकिन अपमान भी क्या कभी स्वाभाविक हो सकता है? लेकिन स्वाभाविक था क्योंकि व्यवस्था सामंतवादी थी पर आज तो संविधानवाद है। बदलाव मजबूरी भी है और आवश्यकता भी। इसलिए बदलाव कीजिए।
भोजपुरी में उतने गीत भाभी पर नहीं बने होंगे जितने जौनसार, बावर, देवगार, बंगाण, हिमाचल क्षेत्र में पुफी अथवा फूफी यानि (बुआ) पर बने होंगे। ऐसे में महान संस्कृति का बखान बस बातें हैं क्योंकि हर दूसरा गाना यहां आज भी महिला विरोधी है।
यह इत्तेफ़ाक समझो कि यहां के लोग बोल (लिरिक्स) पर नहीं ध्वनि, संगीत और लय पर चलते हैं अन्यथा हर तीसरा, चौथा गाना विवादित हो सकता है और यह हर गायक, लेखक, निर्देशक, निर्माता इत्यादि की बात है। पर आज का समय बदलाव मांग रहा है।
यह बदलाव गायकों, लेखकों से ही नहीं नेता और जनता से भी अपेक्षित है। उनकी शब्दावली में भी ऐसे जातिगत शब्द आम बात बनी हुई है। उनके समर्थक कहते हैं इन्हें अब ये नहीं कहें, पुकारें तो क्या कहें? यानि उनका घमंड, विचार अलग ही स्तर पर चल रहा है।
क्या हमें नहीं पता कि पहले के समय में बूढ़ी दिवाली, मौण, धाम में क्या गाने चलते थे? महिलाएं या तो दरवाजा बंद कर देरी थी या फिर अलग कोने में सिकुड़ जाती थी। यह हमारा दुर्भाग्य है कि कभी लिखा नहीं कुछ और सौभाग्य है कि उसमें बदलाव भी हो गया।
फिर हर चीज में बदलाव क्यों नहीं? क्या हमें इस इतिहास को ठीक से लिखना होगा या फिर आप ही उस इतिहास को भूल चुके हैं? ठीक से बदलाव कीजिए। बिना लाग, लपेट के स्वीकार कीजिए कि परिवर्तन संसार का नियम है और इसे स्वीकारना ही पड़ता है।
सामाजिक संगठनों, समाजसेवियों और अन्य आवश्यक माध्यमों से एक दिशा–निर्देश यह भी जरूरी है कि आम जन–मानस को क्या बोलचाल के शब्द इस्तेमाल करने चाहिए और क्या नहीं तथा क्यों नहीं। तभी कोई सामाजिक बदलाव संभव हो सकेगा।
पढ़ें–लिखे सवर्ण युवाओं को इसे अपना अहंकार नहीं जिम्मेदारी के रूप में लेना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि अनादर को दरकिनार करने का यही सही समय है। बड़ों के साथ रिश्ता बनाएं, आदर, सम्मान दें और हर प्रकार के वर्चस्व को विराम दें।
गीत, संगीत, समाज, सभ्यता और संस्कृति सभी सांझी विरासत होती है। सबका सहयोग ही इसे सार्थक बनाएगी और असहयोग सदा संघर्ष पैदा करेगा। यदि इसके बावजूद कोई बदलाव स्वीकार नहीं करता तो उसकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए भी तैयार रहना होगा।
बहुत लोग कहते हैं कि सर्टिफिकेट तो जाति का लेते हो फिर बुरा क्यों मानते हों? अरे भाई यह भी तो तुम्हारी क्षय का परिणाम है। और सर्टिफिकेट जाति का लेते हैं अपमानित होने का नहीं। अनुसूचित जाति लिखा होता है सर्टिफिकेट में उसपर केंद्रित रहो।
हमारा जातियों का वर्ग है और कोशिश है एकीकरण की। हम उसके लिए प्रयासरत हैं। किसी को अधिकार नहीं उसका अपमान करे चाहे वह संस्कृति हो या धर्म हो या फिर समाज हो। सबका आदर, समान करो और बदलाव स्वीकार करो। बदलाव की पहल करो।
संस्कृति के वाहक बनना है, समाज के हितैषी बनना है, धर्म का रक्षक बनना है या फिर अन्य कुछ भी बनना है सबसे पहले इंसान बनना सीखो। जाति, लिंग और वर्चस्व का त्याग कीजिए। विकृति का त्याग ही संस्कृति का संरक्षण और मानवता का संवर्धन होगा। धन्यवाद।







