महान हिमालय और हिमालयी सौंदर्य का दीदार
@Chandrashekhar Tiwari
लघु हिमालय के उत्तर दिशा में महान हिमालय का भू-भाग स्थित है। इसका विस्तार मुख्य केन्द्रीय भ्रंश से लेकर उत्तर में भारत-तिब्बत सीमा से पूर्व तक मौजूद है। इस भू-भाग में अनेक हिमाच्छादित पर्वत शिखर व हिमनद घाटियाँ पायी जाती हैं। लगभग 50 किमी. की चौड़ाई में फैले इस भाग का औसत उच्चावचन 4800 मी. से 6000 मी. के मध्य मिलता है। यहाँ की आन्तरिक चट्टानों में ग्रेनाइट, नीस, सिस्ट आदि की प्रधानता है। इसके बाद कायान्तरित व अवसादी शैल मिलते हैं।

अवसादी चट्टानों की तह में कई किस्म के जलीय जीवाश्म भी पाये जाते हैं। भूगोलवेत्ता महान हिमालय को हिमाद्रि, वृहत हिमालय अथवा महा हिमालय आदि नामों से भी जानते हैं। विश्व के कठिनतम हिम शिखरों में कई शिखर इसी भू-भाग में स्थित हैं। भारत की दो सर्वोच्च पर्वत चोटियाँ नंदादेवी (7817 मी.) तथा कामेट (7756 मी.) इसी भाग में स्थित हैं। इस भाग में हिम शिखरों की कईश्रेणियाँ हैं जिनमें अनेक हिमनद मिलते हैं। हिमनदों द्वारा इस भू-क्षेत्र में विविध तरह की स्थलाकृतियों का निर्माण किया गया है जिनमें U आकार की छोटी-छोटी हिम घाटियाँ प्रमुख हैं। यहाँ की अन्य प्रमुख पर्वत चोटियों में माणा (7273मी.), चौखम्भा (7138मी.), सतोपंथ (7075मी.), त्रिशूल (7045मी.), पंचाचूली (6905मी.), तथा बंदरपूंछ (6315 मी.) उल्लेखनीय हैं।
हिम शिखरों का दुर्गम परिवेश व उसकी नैसर्गिक सुन्दरता पर्वतरोहियों, पथारोहियों व साहसिक पर्यटकों को हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती है। हिम शिखरों से उद्गमित भागीरथी, अलकनंदा, धौली गंगा, जाड़ गंगा, पिंडर, गोरी, दारमा व कुटीयांगती नदियों ने इस भू-भाग में अनेक गहरी व संकीर्ण घाटियाँ बना दी हैं। इस भाग में तीव्र ढालदार भूमि की अधिकता व कठोरतम जलवायु कृषि कार्यों के लिए उपयुक्त दशाएँ उत्पन्न नहीं करती। फलतः यहाँ के निवासी पशुचारण, कुटीर विनिर्माण, व्यापार जैसे पारम्परिक उद्यमों में संलग्न रहते हैं।
इस प्रदेश में कड़ाके की ठण्ड पड़ती है। यहाँ का औसतन वार्षिक तापमान हिमांक 0 डिग्री सेल्सियस से निम्न रहता है। न्यूनतम तापमान जनवरी में – 12 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है। अधिकतम तापमान जून में 4 डिग्री सेल्सियस के करीब आ जाता है। कठोर शीत जलवायु के कारण प्रायः यहाँ वनस्पति का अभाव दिखायी देता है. हिमालय के निम्न भाग जो 4000 मी. की ऊँचाई तक स्थित हैं उनमें मखमली घास की घाटियाँ पायी जाती हैं। इन्हें यहाँ बुग्याल अथवा पयार कहा जाता है। ग्रीष्म काल में बर्फ पिघलने के बाद यहाँ की जमीन में अनेक किस्म की घास, पुष्प प्रजातियाँ व बहुमूल्य औषधीय वनस्पतियां उग आती हैं। फूलों की घाटी, वैदिनी बुग्याल, पंवाली कांठा, दयारा बुग्याल व हर की दून नामिक बुग्याल व छिपलाकेदार जैसे प्रमुख बुग्यालों का इस दृष्टि से विशेष स्थान है। पशुचारक ग्रीष्म ऋतु के दौरान इन बुग्यालों व इसकी निचली घाटियों में पशुचारण के लिए जाते हैं।
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र रिसर्च एसोसिएट है







