छात्र-जीवन से ही मेरा झुकाव वामपंथ की ओर रहा है, हालाँकि कभी किसी राजनीतिक पंथ से जुड़ा नहीं रहा. शुरू से ही मेरा मानना रहा है कि आदमी को उसी क्षेत्र में दखल देना चाहिए जिसकी उसे जानकारी हो. जिन्दगी भर अध्यापन करते हुए शब्द और भाषा की खेती करता रहा इसलिए यह विवेक शुरू में ही पैदा हो गया था कि राजनीतिक विचारों के विश्लेषण की हैसियत मुझमें नहीं है.
बड़े होने के साथ-साथ जब वाम और दक्षिण-पंथी विचारों के बीच से गुजरा, देखा कि ये शब्द अपना कोई स्थायी और शाश्वत अर्थ नहीं रखते, आदमी अपनी जरूरत के हिसाब से उसे तोड़ता-मरोड़ता रहता है. दोनों ही पंथों के बीच कट्टर और लिबरल दोनों तरह के रुझान रहे हैं, और जरूरत के हिसाब से आदमी अपने लिए बीच का रास्ता निकाल लेता रहा है.
हमारी सदी में इन दोनों विचारधाराओं को लेकर असंख्य बहसें हुई हैं फिर भी कोई ऐसी साफ लाइन नहीं उभरी जिसके आर-पार खड़े होकर एक सामान्य आदमी अपने लिए भूमिका तय कर सके.
ज्ञान की दुनिया में घुसने के बाद मैंने देखा कि लोगों ने खुद ही अपने को राजनीति के ऐसे झंझावत के बीच खड़ा कर दिया है जहाँ बीच का रास्ता सचमुच कोई नहीं है. हमारी बीती सदी ने राजनीति को एक ऐसी अपरिहार्य तृष्णा के रूप में अपना लिया था जिसकी प्यास धरती के स्रोत नहीं बुझा सकते थे, उन्हें विशालकाय बाँधों और मशीनों से पैदा होने वाला टैप-वाटर ही बुझा सकता था. लेकिन जीवन है तो प्यास लगेगी ही और प्यास लगने पर पानी का कोई अन्य विकल्प नहीं होता; और जब विकल्प ही नहीं है, उसे हर हाल में मौजूद पानी को गटकने के अलावा दूसरा रास्ता ही कौन-सा बचता है?
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मेरी शैक्षिक चेतना का आधार पश्चिम था; केम्ब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड की धरती से अंकुरित हुआ नेहरूवादी भारत, जो जन्म लेते ही इण्डिया बनाम भारत के द्वैध के बीच साँसें लेकर आकार ग्रहण करता चला गया. इस भारत की भाषा, शिक्षानीति और संस्कृति पर अपने दूसरे देशवासियों की तरह मुझे भी गर्व होने लगा था और मैं उसी के सहारे अपने सांस्कृतिक व्यक्तित्व को ढालता रहा. अपनी संस्कृति को लेकर मैंने वही सोचा जो मेरी किताबों और पाठ्यक्रम ने मुझे सौंपा; इसके अलावा जो हाशिए का चिंतन था, जिसकी बुराई की जाती थी थी, उसके प्रति अविश्वास पैदा होता चला गया. मेरे विचारों का सांस्कृतिक ढाँचा इस तरह बहुलतावादी समाजवादी चिन्तन का हिस्सा बन गया. मैंने उस भाषा में शिक्षा ग्रहण की जो मुझे नहीं आती थी, अपनी जड़ों की भाषा के बारे में भी मैं वही जानता था जो परायी भाषा के द्वारा दिए गए संस्कार की भित्ति पर निर्मित थी; उसने मुझे अपनी जड़ों की भाषा के प्रति नफरत करना सिखाया और इसी सोच ने मुझे इतना आत्मकेंद्रित बना दिया कि मुझे अपने ही दूसरे देशवासियों की भाषा और संस्कृति के प्रति दुराव करते हुए उनकी तरह मुझमें भी खुद के प्रति हीनता-बोध पैदा होता चला गया.
चार-पांच साल पश्चिम के शिक्षा-ढाँचे में हिंदी पढ़ाते हुए मुझे महसूस हुआ कि जिस भाषा के जरिये मेरे संस्कारों का ढाँचा बना है, उसने मुझे कितना खोखला बना डाला था.
हंगरी के जिस विवि में मैं हिंदी पढ़ाता था, वहाँ के विद्यार्थी न हिंदी जानते थे, न अंग्रेजी; सिर्फ अपनी भाषा हंगेरियन (मज्यर) जानते थे और उनकी सारी पढ़ाई जन्म लेने के बाद से उसी भाषा में होती थी. पुराने सोवियत संघ का हिस्सा होने के कारण हर विद्यार्थी अपनी मातृभाषा के अलावा रूसी और जर्मन भाषाएँ जानता था, अपने ज्ञान को इन्हीं के माध्यम से प्राप्त करता था, लेकिन उनका माध्यम केवल मातृभाषा थी. बच्चे रूसी भाषा से नफरत करते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि उस देश के लोगों ने उनको गुलाम बनाया है; अपनी जबान उन पर जबरन थोपी है. अंग्रेजी का कामचलाऊ ज्ञान होते हुए भी वे इसे न बोलते थे और न उसमें जवाब देते थे. जाहिरा तौर पर वो इसे शोषकों की भाषा कहते थे. इसी के कारण वहाँ के बच्चे साम्यवादी चिन्तन से चिढ़ते थे.
मुझे याद है, 1998 में जब नाटो देशों में शामिल होने के लिए वहाँ राष्ट्रव्यापी जनमत-संग्रह किया गया था, मेरे छात्रों ने मुझसे भी राय मांगी थी; और मेरे यह कहने पर कि यह उनका निजी मामला है, बार-बार उन्होंने मुझे कुरेदा कि अगर मैं उनकी जगह पर होता तो क्या निर्णय लेता? मेरे वो बच्चे अपनी जड़ों की बात करते थे, अपनी भाषा, संस्कृति और महान परम्परा की. छोटा-सा देश होते हुए भी उनके पास एक समृद्ध अतीत था, जिस पर उन्हें गर्व था इसलिए वे हमेशा उसकी ही बातें करते थे. बच्चे समझते थे कि महान रूस ने अपनी भाषा और आकार का आतंक दिखाकर उनका अपना अस्तित्व ख़त्म कर दिया है!
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नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि राष्ट्राध्यक्ष, जो पहले अनिवार्य रूप से अंग्रेजी में बोलता था, अपने देश में भी और विदेश में भी, दुभाषिए के साथ हिंदी में बोलने लगा. यह कोई मामूली परिवर्तन नहीं था, इसने एक साथ अनेक काम किये. इससे हिंदी का उतना नहीं, तमाम उन लोगों को लाभ पहुँचाया जो अपनी बोली बोलते थे. इस विचित्र कारनामे से उनकी वाणी को सहारा मिला जो अब तक अंग्रेजी नहीं जानते थे मगर देश की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते थे. कभी संकोच और कभी अपनी क्षेत्रीय पहचान बन जाने के डर से अपना मुँह सिल लेते थे. समाज के हाशिये के लोगों में तो इससे उनका आत्मविश्वास झरने की तरह फूट पड़ा और यह हिंदी गाँव-देहात ही नहीं, शहरी लड़के-लड़कियों और घरेलू कामकाज़ से जुड़े लोगों के मुँह से उसी विश्वास के साथ फूटने लगी.
इसने सत्ता के नीति-निर्धारकों को बेतरह उलझन में डाल दिया और वे हकबकाए हुए अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बँटकर एक-दूसरे को गरियाने लगे.
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आज, जब कि मैं अस्सी का हूँ, भारतीय समाज के बीच पैदा हुए इस विचित्र परिवर्तन के कारण खुद भी हक्का-बक्का हूँ. केम्ब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड के जिस ढाँचे ने मेरी पीढ़ी को यह संस्कार दिया था कि उच्च और शालीन सोच अंगरेजी के बगैर संभव ही नहीं है, उसे इसने धमाके से तोड़ा है. परम्परावादी नियोजनकर्ता भी परेशान हैं कि बोलचाल की भाषा को वो लोग कैसे विद्वानों की भाषा के बराबर का दर्ज़ा दे सकते हैं?
मगर जनता के बीच से उठी लहर को किनारा तो मिलना ही है और यह काम देश के भाषा-नियोजकों को ही करना है, चाहे वो इसे रो-धोकर करें या मर्जी से.
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