Sunday, September 13, 2026
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कहे-अनकहे रंग जीवन के: दिल से निकले उदगारों की श्रृंखला की काव्यकृति

Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart
Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart

कहे-अनकहे रंग जीवन के: दिल से निकले उदगारों की श्रृंखला की काव्यकृति

@मनोज इष्टवाल

यूँ तो मूर्धन्य कवि, लेखक व साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने इस काव्य संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर एक लम्बा व्याख्यान इसी बात को लेकर दिया कि हम कवि एवं कविता या काव्य संरचना की पांत में वर्तमान में कहाँ खड़े हैं? उनके संबोधन के बाद कुछ बचता नहीं है। मगर पाठको की नजर से देखा जाय तो इस काव्य संग्रह में कवि भारती आनंद ‘अनंता‘ ने सिटकनी लगे वे दरवाजे जरूर खटखटाये हैं जिनमें खामोशी तो थी लेकिन धडकनें व साँसे झरोंकों से खुली आँखों से दरवाजे की खटखटाने की आवाज सुन ही नहीं बल्कि देख भी जा रही है। प्रथम दृष्टा इस कविता संग्रह में कवितायें कम बल्कि मन के उन उदगारों को कागज़ में उतरता नजर आया, जिन पर समय की धूल की मोटी परतें जम चुकी थी। तभी तो “कहे-अनकहे रंग जीवन के” कविता संग्रह में भारती खुले मन से कह गई कि “जिसने जैसे समझा, वैसे ही जिया।

उद्गित सभी 82 कविताएं कुछ न कुछ न कह रही है, चिन्तन के लिए बाध्य कर रही है। स्वतन्त्रता और परतन्त्रता को भारती ने अपनी कविताओं में प्रबलता से उठाया है। हालांकि कवि भारती आनन्द ‘अनन्ता’ का यह पहला कविता संग्रह है। इसीलिए कविता संग्रह की भूमिका में सुप्रसिद्ध साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी ने भूमिका में लिखा है कि अनुभव प्रायः सबके पास होते हैं, पर उसकी अभिव्यक्ति सबके पास नहीं होती। या अलग ढंग से होती है। यह अलग होने का संघर्ष ही कविता को मौन कथन में बदल देता है।

वहीं अगली भूमिका में वरिष्ठ साहित्कार महाबीर रवांल्टा लिखते हैं कि पहाड़ में अपनी थाती-माटी के प्रति गहरे जुड़ाव के कारण भारती अपनी स्मृतियों में विचरण करती हैं। उनकी कविताओं में पलायन का दर्द भी दिखाई देता है। लेखिका भारती अपनी बात में लिखती है कि अपने मन के भावों को कविता के रूप में लिख पाना उसके लिए माउंट एवरेस्ट को पार करने जैसा था। चूंकि उनका पुस्तकों के प्रति बचपन से ही लगाव रहा है। तभी लेखन के बीज रोपित हुए है। किंतु कागज पर उन्हें उतारना इतना आसान नहीं था। स्त्री होने और घर की जिम्मेदारियों व जीवन को निभाने के बीच कितना कुछ खो देते हैं, हम स्वयं नहीं जान पाते। बस इसी खोये हुए को समेटने का एक सूक्ष्म प्रयास उनका यह काव्य-संग्रह है।

समय साक्ष्य प्रकाशन से प्रकशित 121 पृष्ठ की इस कविता संग्रह की 82 कविताओं में ‘प्रार्थना‘ से लेकर ‘प्रहरी सीमा के’ अर्थात आदि से अंत तक की आव्वोहवा में एक जिद, जद्दोजहद व मन आत्मा में उमड़ते घुमड़ते प्रश्नों के सार में एक ऐसी अतृप्त तलाश छुपी है जो प्रश्न उठाते ही उसका स्वयं हल ढूंढ़ने के लिए बेताब हैं। दरअसल इस काव्य संग्रह में इतने सरल शब्द व शब्दावली है कि आपको कभी कभी लगेगा कि यह कहानियों की ऐसी विवरणिका है जो आपके आगे प्रश्न तो रखती है लेकिन फिर खुद ही खुद से संतुष्ट दिखाई देती है। काव्य संग्रह की शीर्षक 11वीं कविता ”कहे-अनकहे रंग जीवन के” में कवि प्रश्न उठाती हैं। “जीवन है क्या? एक जलता दीया। जिसने जैसा समझा, वैसा ही जिया।” अर्थात यह चार पंक्तियाँ खुद में ही सम्पूर्ण कविता है। कविता की 48 अन्य पंक्तियाँ यही सब तो कह रही हैं जो भारती सिर्फ़ चार पंक्तियों में कह गई।

Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart
Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart

14वीं कविता में श्रृंगार व प्रेम का अद्भुत मिश्रण दिखने को मिलता है। ऐसे लगता है जैसे इस कविता की रचना कवि ने मस्तिष्क की सोच से परे उन्मुक्त हृदय से की हो, जिसमें प्रेम का अथाह समुद्र हिलोरे मार रहा हो। कविता के प्रति भारती आनंद का अनंत प्रेम नहीं अपितु अनंता प्रेम है। कैसे बहुत सरल शब्दों में भारती लिख देती हैं कि – ‘प्रेम एक अथाह अनंत’। शब्दों की खूबसूरती ही है कि चार शब्द और उनके आगे लगा दिया पूर्ण विराम। मानों मन हँसते हुए आँखों में सारा प्रेमरस लाकर तृप्त हो गया हो और होंठ बमुश्किल फड़-फड़ाकर कह रहे हों ‘प्रेम एक अथाह अनंत’। वह आगे लिखती –
‘प्रेम’ एक अथाह अनंत।
फूलों से, भंवरों का,
सूरज से, किरणों का।
सागर से,नदियों का,
प्रेम, अथाह अनंत।
चाँद से, चांदनी का,
गगन से पंछियों का।
जल से, मछलियों का,
प्रेम, अथाह अनंत।
मयखाने से, मय का,
बर्षा से पपीहे का।
प्रिय से, पिय का,
प्रेम अथाह अनंत।

कुलमिलाकर इतने सरल शब्दों में रूपकता की विशालता में तब हिचकिचाहट सी दिखती है जब हर दूसरी पंक्ति पर पूर्ण विराम दिखने को मिलता है। लगता है कि यह पूर्ण विराम हर बार प्रेम, अथाह अनंत के बाद ही आना चाहिए था। ताकि कविता के मूल मर्म में रूपक, श्रृंगार व प्रेमरस….., यानि प्रेम से गुजरकर उसके चरम अनंत तक की कल्पना को सार्थक कर दे।

Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart
Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart

भारती के काव्य संग्रह की 20वीं काव्य रचना अनचाहे रिश्ते बहुत कुछ कहने को आतुर है। लेकिन फिर अचानक शब्द बिखरते नजर आते हैं, मानों कवि हृदय वह सच कहते कहते अपने शब्द लोक के आवरण से गले में ही ढका कर रख दिया हो। जैसे वह लिख रही है –
अनचाहे ही पनप जाते हैं,
कुछ पौधे रिश्तों के।
जिन्हें बोया नहीं जाता,
जिन्हें संजोया नहीं जाता।
फैलाते हैं अपनी शाखाएं,
होकर प्रसन्नचित्त।

इन 06 पंक्तियों में बाद की दो पंक्तियाँ तुकबंदी में लपेटी हुई सी लगती हैं। जो ऊपर की चार खूबसूरत पंक्तियों की हत्या सी करती नजर आ रही हैं। इस तरह से कवि ने बाद में अपने शब्दों को बाँधने का पूरा जतन किया है, जिसमें वह सफल भी हुई है। 25वीं कविता में वह बहुत खूबसूरती से मानो घटित अतीत से वर्तमान पर प्रहार कर रही हो। तभी तो कवि लिखती हैं कि –
कौन सुनेगा, यहाँ सबकी,
अपनी कहानी है।
अपने दर्द हैं,
अपनी परेशानी है।

Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart
Kahe-Ankehe Rang Jeevan Ke: Poems from the series of quotes from the heart

इस पूरी कविता में ऐसा लगता है मानों यह हर व्यक्ति के हर हृदय की कथा-व्यथा सुनाकर आगे बढ़ती जा रही हो। वास्तव में मर्म को भेदते ये शब्द कुछ नया बेहतर करने को आतुर लगते हैं। भारती की 30वीं कविता जो चार पंक्तियों में सिमटकर सब कुछ कह जाती है कि –
खुशबु तेरी मुझे महका जाती है,
तेरी हर बात मुझे बहका जाती है।
सांस को बड़ी देर लगती है आने में,
हर सांस से पहले तेरी याद आ जाती है।

बहरहाल यह काव्य संग्रह पहले सरसरी नजर और बाद में टकटकी नजर से पाठको को मजबूर कर देती हैं। काव्य संग्रह को पढ़ने के बाद एक मंझा हुआ कवि यही कहेगा कि भारती के आगामी काव्य संकलनो में वह छनकर बाहर अवश्य आएगी जो इन्हे कवि या कवियत्री के रूप में स्थापित करेगा। सम्पूर्ण काव्य संग्रह में न सिर्फ़ उक्ति वरन युक्ति, सूक्ति, मुक्ति, कथ्य, तथ्य में जबरदस्त संघर्ष दिख रहा है। भारती आनंद ‘अनंता’ की काव्य संग्रह “कहे-अनकहे रंग जीवन के” नामक पुस्तक के शब्द सागर को जानने के लिए समय साक्ष्य प्रकाशन की यह पुस्तक संग्रहणीय है, क्योंकि इसमें कविलास भी है तो मधुमास भी।

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