अब केदारनाथ पर राजनीति शुरू।

सत्ता की हनक कितनी खतनाक हो सकती है यह नजारा आज कल उत्तराखण्ड़ से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक चर्चाओं में है।दिलचस्प कहानी ये यह है कि अब केदारनाथ के दर्शन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी कर सकते है, यह बात सनातनियों के गले नही उतर रही है और जनता खामोश है।
हिंदू धर्म ग्रन्थों में केदारनाथ की महिमा का ऐसा उल्लेख कहीं नही मिलता है कि बाब केदार को आवश्यकता अनुसार लोग कहीं भी प्रतीकात्मक स्वरूप से पूजा अर्चना करें। यही वजह है कि कालान्तर से लेकर अब तक लोग बाबा केदार के दर्शन करने सालभर के 6 माह में केदारनाथ ही जाते है। ऐसा भी कोई उल्लेख नहीं है कि बाबा केदार को कहीं और से लाकर केदारनाथ में स्थापित किया हो। यह तो साक्षात शिव का स्वरूप है जो केदारनाथ में ही लोगों को दर्शन देते है। इसी का ही बड़ा मातहम होता है।
यदि समय के अनुसार और राजनीतक महत्वाकांक्षा के कारण हिन्दू धर्म के इन धार्मिक प्रतिष्ठानों पर सत्ता की भनक सवार होती है तो यह आने वाले समय में लोगों को आपस में लड़वाने का काम करेगें। इस बात को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों ने घोर विरोध किया है। यहां तक कि चरोधामो के पुजारी और पुरोहित आंदोलन करने को बाध्य है कि वे किसी भी कीमत पर दिल्ली में केदारनाथ का मंदिर नही बनने देंगे।
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कुल मिलाकर केदारनाथ जैसे धार्मिक स्थल पर यदि राजनीति हो रही है तो यह सनातन धर्म को किस ओर ले जा रही है। यह तो समय बतायेगा, पर केदार नाथ मंदिर पर लगाया गया सोना भी तो अब खोटा हो गया है और मंदिर को कहीं ओर सिफ्ट किया जा रहा है। यह कितना सच है और कितना झूठ है यह जांच का विषय है।
उल्लेखनीय हो कि हिमालय के केदार श्रृंग पर महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना अनुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वरदान प्रदान किया। इस वरदान स्वरुप ही भगवान शिव का ये मंदिर केदारनाथ आज भी यहां मौजूद हैं और 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं। हिंदू धर्म के अनुसार, मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक हिंदू को चार धाम का तीर्थ करना आवश्यक है। धामों या पवित्र तीर्थ स्थलों का दौरा प्राचीन काल से ऋषियों, संतों द्वारा किया जाता रहा है और अभी भी श्रद्धा और भक्ति के साथ भक्त द्वारा दौरा किया जाता है। केदारनाथ मंदिर से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों सभी कौरव भाइयों और अन्य बंधुओं की हत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थें. जिसके लिए वह भगवान शिव की खोज में हिमालय की ओर गए. पांडवों को अपनी ओर आता देख भगवान शिव अंतर्ध्यान होकर केदार में जा बसे केदार का शाब्दिक अर्थ दलदल होता है तथा भगवान शिव दल-दल भूमि के अधिपति भी हैं इसलिए भी दल- दल यानि केदार के पति अर्थात केदारनाथ नाम पड़ा। महाभारत में इस भूमि में मन्दाकिनी, अलकनन्दा एवं सरस्वती बहने का उल्लेख भी मिलता है जो आज तक इस क्षेत्र में बह रही है । केदारनाथ में अनेक मुक्ति प्रदान करने वाले तीर्थ स्थान हैं।
बर्फ से ढकी चोटियों और जंगलों की शानदार पृष्ठभूमि में स्थित केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है और पंच केदार मंदिरों में प्रमुख स्थान रखता है। मंदिर में एक शंक्वाकार शिवलिंग है जिसे शिव का कूबड़ माना जाता है। कुलमिलाकर केदारनाथ मंदिर पर बहस गरम हो गई है। भविष्य में इस बहस का क्या होगा, पर इतना अवश्य है कि सनातनियो को केदारनाथ के प्रतीकस्वरूप मंदिर को दिल्ली में बनाना गलत लग रहा है।







