Friday, March 6, 2026
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हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल, सोशल मीडिया की अराजकता पर मंथन। पढ़े एक रिपोर्ट

लेखक गांव थानों (देहरादून) में “श्रेष्ठ भारत में हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष” विषय पर एक दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया है। कार्यक्रम में जानेमाने पत्रकार पद्मभूषण राय बहादुर राय मुख्यअतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि 21वी सदी की पत्रकारिता मिशन पत्रकारिता की ओर नहीं बल्कि व्यापारिक पत्रकारिता की ओर बढ़ रही है। यह संकट आज तब सामने आया जब तकनीकी ने अभूतपूर्व विकास किया है। सोशल मीडिया ने जिस तरह से सूचनाओं को लेकर चमत्कार किया है उससे अधिक हिंदी पत्रकारिता के विश्वसनीय रूप को बिगाड़ दिया है। यह संकट आगे भी दिखाई दे रहा है। एक और संकट है विशेषकर हिंदी भाषा को लेकर यानी आज की हिंदी पत्रकारिता तकनीकी रूप से काफी कमजोर नजर आ रही है।

वरिष्ठ पत्रकार पद्मभूषण राय बहादुर ने अपने संबोधन में आजादी से पूर्व और अब तक की हिंदी पत्रकारिता पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यदि देखा जाए तो हिन्दी का पहला पत्र सन 1700 में छपा था। तब से लेकर अब तक हिंदी की पत्रकारिता ने कई उतार चढ़ाव देखें है। फिर भी आज हिंदी पत्रकारिता अपनी जगह यानी मिशन मोड पर खड़ी है। उन्होंने देश के कुछ पत्रों का उदाहरण दिया है। जैसे मुंबई समाचार पत्र की पहली प्रति सन 1822 में छपी जो आज भी छप रही है। उड़ीसा में “समाज पत्र” और गोरखपुर से “कल्याण पत्र” हिंदी पत्रकारिता के सफल उदाहरण है। आजादी के बाद दो ऐसे अखबार है जिन्होंने गांधी जी का मार्ग दर्शन लेकर मिशन पत्रकारिता आरंभ की है। जिनमें आज का इंडियन एक्सप्रेस (अंग्रेजी) और कल्याण (हिंदी) पत्र प्रमुख है। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का अपना एक गौरवमई इतिहास है।

उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के कुछ खास पहलुओं पर चर्चा आगे बढ़ाई। कहा कि आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता शुद्ध रूप से मिशन पत्रकारिता ही थी।

1967 से लेकर 1977 तक हिंदी पत्रकारिता एक आंदोलन के रूप में सामने आई। 1987 – 88 में तो हिंदी पत्रकारिता ने एक खास पहचान बनाई। इस दौरान जब “बोफोर्स कांड” को हिंदी पत्रों ने सामने लाया तो देश दुनिया में हिंदी पत्रकारिता पर लोगो का और अधिक विश्वास हो गया। जबकि इमर्जेंसी के बाद यानी 1980 से लेकर 1990 तक और आज भी निरंतरता जो बनी है अर्थात भारतीय भाषाओं के लिए पत्रकारिता सामने आई जो एक ऊंचाई आज भी बनाए हुए हैं।

उन्होंने आज की नई पत्रकारिता पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने यह भी कहा कि जब मीडिया लोकतंत्र का हिस्सा है तो इसमें भी मनमानी नहीं चलनी चाहिए। यानी मीडिया के लिए भी नियमन की आवश्यकता है। आज के सोशल मीडिया जैसे माहौल में अब सरकारों को एक अनिवार्य “मीडिया कॉन्सिल” बनाने की नितांत आवश्यकता है। वैसे भी यह चिंता उन्होंने 1982 में कर दी थी। तब से लेकर अब तक के प्रधानमंत्रियों को वे बकायदा एक ड्राफ्ट दे चुके है कि मीडिया के लिए आवश्यक नियमन होने चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को छोड़कर सूचनाओं के प्रसार बाबत खास नियमन की आवश्यकता है जो आज प्रबल होती जा रही है। इधर मौजूदा समय में सर्वोच्च न्यायालय ने भारत सरकार को बाकायदा निर्देश किया कि “सोशल मीडिया” की अराजकता तीव्र बढ़ रही है। इस दिशा में त्वरित निर्णय लिया जाए। मगर भारत सरकार इस पर विवश बैठी है। यही हालात हिंदी पत्रकारिता पर संकट खड़े कर सकते है।

लेखक गांव के संस्थापक और पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ० रमेश पोखरियाल निशंक ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के अवसर पर कहा कि हिंदी पत्रकारिता का एक विशेष स्थान है। आजादी के आंदोलन से लेकर आज के भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में हिंदी पत्रकारिता ने अलग पहचान बनाई है। आज भी हिंदी अखबार के सर्वाधिक पाठक है। यह भी इन दो सौ सालों की उपलब्धि कही जाएगी।


डॉ० निशंक ने लेखक गांव की परिकल्पना का परिचय देते हुए आगे कहा कि यह स्थान भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेई की संकल्पनाओं के आधार पर बनाया गया है। यह देश का इकलौता “लेखक गांव” है। इसलिए कि दुनियाभर के सृजनशील लोग कहीं एक स्थान पर आकर अपनी अभिव्यक्ति का प्रदर्शन कर पाए। अतएव लेखक गांव में नालंदा पुस्तकालय की स्थापना की गई है। जहां भविष्य में 10 लाख पुस्तकों का एक विशाल संग्रह होगा। लेखक गांव में नक्षत्र वाटिका, नवग्रह वाटिका के साथ साथ लगभग 350 सीट वाला ऑडियो ट्यूरिम बनाया जा रहा है। यही नहीं जबकि लेखक गांव परिसर में 350 से अधिक की ऐसी पौधशाला है जो आयुष के लिए मुफीद होगी। प्रत्येक पौधे पर क्यू आर कोड है, स्कैन करने पर आप उस आयुष पौधे की जानकारी अपने मोबाइल में ले सकते है। इसके अलावा लेखक गांव में संजीवनी भोजनालय की स्थापना भी की गई है।

कार्यक्रम में सूचना आयुक्त व वरिष्ठ पत्रकार योगेश भट्ट, पद्मश्री डॉ० प्रीतम भरतवाण, पद्मश्री डॉ० माधुरी बर्थवाल, पद्मश्री प्रेमचंद शर्मा, HNB गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के VC प्रो० श्रीप्रकाश सिंह, वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल, वरिष्ठ पत्रकार अरुण शर्मा, HNB गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल में भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० मोहन पंवार, पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक डॉ० सविता मोहन आदि सम्मानित लोगों सहित सैकड़ों अध्येता, पत्रकार और पत्रकारिता के छात्र सम्मिलित हुए। कार्यक्रम में पहुंचे सभी अतिथियों और आगंतुकों का स्वागत स्पर्श हिमालय फाउंडेशन की प्रमुख और लेखक गांव की संयोजक डॉ० विदुषी निशंक ने किया। जबकि कार्यक्रम का संचालन डॉ० सुशील उपाध्याय ने किया है। 21वी सदी की पत्रकारिता पर विद्वानों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।

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