Sunday, September 13, 2026
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महेंद्र सिंह धोनी की इस तस्वीर में ऐसा खास क्या है?

इस तस्वीर में ऐसा खास क्या है?

@Laxaman singh Batrohi

अनेक जगहों पर यह तस्वीर वायरल हो रही है और अनेक किस्म की विचित्र प्रतिक्रियाएँ देखने में आ रही हैं. टिप्पणियों के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है, सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि ऐसा पहली बार हुआ है जब एक पिछड़े गाँव से अपनी प्रतिभा के बूते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उभरा यह नौजवान आज अपने घर के दरवाजे की उसी चौखट पर बैठा है, जहाँ से वह कभी प्रतिभा के असंख्य सपने समेटकर निकला था. यह यात्रा कितनी जोखिम-भरी रही होगी, इसका अन्दाज़ वही लगा सकता है जिसने यह गाँव देखा है.

Mahendre singh dhoni
Mahendre singh dhoni

मेरे पैतृक गाँव के ठीक बगल में पनार पार तल्ला सालम में एक मामूली-सा गाँव है ल्वाली. अल्मोड़ा की मुख्य नदी पनार किनारे का यह इलाका अतीत में कुमाऊँ के पैकों का खास रहवास था. चंद राजाओं के ज़माने में यहाँ के वीर लड़ाके पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थे. मूलतः पूर्वी नेपाल और भारत की सीमा पर बहने वाली काली नदी के किनारे बसे गुमदेश से आकर कुछ भैंस-पालक खश लड़ाके पूरे कुमाऊँ-गढ़वाल में फैले जो मुख्य रूप से पूर्वी और पश्चिमी कुमाऊँ के चरागाहों से भरी जगहों में बस गए. इतिहासकार डॉ. राम सिंह के अनुसार पिथोरागढ़ बस अड्डे के समीप के गाँव धौन में धौनी लोग बसे और कुमाऊँ की पश्चिमी सीमा के रामगंगा किनारे मौनी लोग. कहते हैं कि ये दो सगे भाई थे और इतने शक्तिशाली कि चंद राजा ‘पूरबो को धौनी, पश्चिमो को मौनी’ की दुहाई देकर राज्य की सुरक्षा को लेकर निश्चिन्त रहता था. इस इलाके में रहने वाली कुछ और युद्धप्रिय जातियों का जिक्र मिलता है जिनमें बोरा, कार्की, महर, सौन, फटक्वाल, हीत, बिष्ट, चौधरी, तड़ागी, गैड़ा आदि जातियों की वीरता का सारा इलाका लोहा मानता था.
खैर यह तो थी अतीत की बातें. वर्तमान में भी, जब लोग अपनी जड़ों की ओर आकर्षित नहीं होते दिखाई दे रहे हैं, एक ऐसी प्रतिभा का अपनी जड़ों की ओर लौटना और उन प्रतीकों से ताकत हासिल करना न भुलाई जाने वाली मिसाल है. कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि किसी के घर लौटने में कौन-सी खास बात है! इस घटना को महज अपने इष्टमित्रों से मिलने या पारिवारिक पूजा के सदर्भ में देखना अधूरा सच होगा. एक लगभग उजड़ने की कगार पर खड़े गाँव में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा बन चुके युवा का लौटकर आना छोटी बात कतई नहीं है. जहाँ तक अपने पुरखों और इष्ट-देवताओं को याद करने की चाहत है, इसका मखौल कोई भावनाहीन व्याक्ति ही उड़ा सकता है. व्यक्तिगत रूप से पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही है, निरुद्देश्य दिखावे के लिए किये जाने वाले पूजा-पाठ का मैं हमेशा विरोधी रहा हूँ. मगर यहाँ सन्दर्भ एकदम अलग है.

अगर महेंद्र सिंह धौनी को अपनी यात्रा का दिखावा ही करना होता तो एक इशारे की बात थी, सारा मीडिया उसके पीछे लग जाता. यही बात उसके द्वारा अपना जीवन-साथी चुनने के बारे में भी कही जा सकती है. उसे झारखण्ड या मुंबई या देश के किसी भी कोने में सजातीय लड़की न मिली हो, क्या यह बात आज के ज़माने में यकीन करने लायक है? या इसे सिर्फ संयोग मानना भी दुराग्रहपूर्ण तर्क ही कहा जाएगा. अपनी जड़ों से जुड़े किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह कोई सामान्य अनुभूति नहीं है कि पूरी दुनिया में सेलिब्रिटी बन चुका ल्वाली का लड़का, जो इस वक़्त झारखण्ड का अधिकतम आयकर देने वाला व्यक्ति है, पच्चीस मवासों के अपने पैतृक गाँव के हर बुजुर्ग के चरणस्पर्श करके ‘पैलाग’ कहकर संबोधित करता हो, ‘आमा, भल है रछा’, ‘काखी खेति-बाड़ि कस चल रै’ जैसे ठेठ घरेलू संबोधनों का प्रयोग कर रहा हो, गंगनाथ और सैम के मशहूर थान में पूजा कर रहा हो, गाँव की युवा पीढ़ी को उस वक़्त कैसा लगा होगा, इस भावना ने जिसके मर्म को स्पर्श नहीं किया होगा, उसके लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है कि वह अपनी जड़ों से उखड़ा एक सूखा ठूँठ-मात्र बचा है, अपनी धरती के स्नेह की अनुभूति उसमें नहीं बची है. हर बात को हल्के उपहास में लेने की मनोवृत्ति ने भी हमें समाज से काट दिया है. ग्लोबल और लोकल की बहसें तो हम बड़े-बड़े मंचों से करते हैं, जमीन पर आकर ये बातें अपनी निजी छवि बनने तक ही सिमटकर रह जाती हैं.

कुमाऊँ के परंपरागत इतिहासकार बद्री दत्त पांडे ने दानपुर के लोगों को दानववंशी माना है, अनेक दूसरे आधुनिक इतिहासकारों ने भी दौनकोट के दानव-वंशी क्षत्रियों को आज के ‘दानू’, ‘दाण’, ‘धौनी’ आदि युद्धप्रिय जातियों के साथ जोड़ा है. मैंने कई जगहों पर इस बात का जिक्र किया है कि क्रिकेट टीम के कप्तान के रूप में कठिन घड़ी में एक-के-बाद-एक छक्के और चौके जोड़कर उसने टीम इंडिया को जिस तरह जीत दिलाई थी, वह किसी सामान्य मानव के वश की बात नहीं हो सकती. वह कोई अति-मानवीय शक्ति-संपन्न व्यक्ति ही हो सकता है. इसके बावजूद उस पर अपने कौशल को लेकर जरा भी अहंकार का अहसास नहीं; एक आम पहाड़ी की तरह का निश्छल व्यवहार और अपनी मेहनत पर भरोसा. विदेशी पत्रकारों ने उसे ‘कैप्टेन कूल’ यों ही नहीं कहा. आज भी वह एक आम पहाड़ी की शांत-मेहनती प्रकृति के प्रतीक है. अपनी जड़ों और इष्ट-पुरखों को चुपचाप स्मरण करने की यह भंगिमा उसके कद को आज कहीं बड़ा बना देती है.

यही बात महेंद्र की पत्नी साक्षी रावत के बारे में भी कही जा सकती है, जो अपनी वेशभूषा, भाषा और परिजनों के साथ बोलचाल में ठेठ ल्वाली की ही बहू लग रही थी. मैं कभी उनसे मिला नहीं हूँ, मगर आदमी का चेहरा उसके कर्म और व्यवहार से निर्मित-विकसित होता है और शायद उन्हीं से व्यक्तित्व के सौन्दर्य से जुड़े मानदंड बनते हैं. इतनी कम अवधि में बॉलीवुड को उसके ऊपर एक सफल हिट फिल्म का निर्माण उसके इसी कर्मशील शांत चेहरे का ही कमाल है. काश, उत्तराखंडवासी अपने समाज के सौन्दर्य को खुद के दुराग्रहों से हटकर देख पाते!

(फोटो कमलेश बोरा की वाल से साभार)

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