Sunday, September 13, 2026
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वरिष्ठ पत्रकार सुनील नवप्रभात की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट्स।सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन : 10 दिन तक लगातार कवरेज के दौरान मैंने जो महसूस किया।

सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन : 10 दिन तक लगातार कवरेज के दौरान मैंने जो महसूस किया।

@Sunil Navprabhat

Silkyara tunnel
Silkyara tunnel

यमनोत्री हाईवे पर सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन आज 14वें दिन में पहुंच गया..उम्मीद की जानी चाहिए कि ऑपरेशन जल्द से जल्द अपने अंजाम तक पहुंचे और टनल में फंसे दो सुपरवाइजर समेत 41 लोगों की जिंदगी बचाई जा सके..

मैंने करीब दस दिन तक सिलक्यारा ऑपरेशन साइट से रिपोर्टिंग की..सुबह से शाम तक हर मूवमेंट पर खबर के लिहाज से नजर बनी रहती थी..मैं वर्टिकल, हॉरिजेंटल ड्रिलिंग के लिए सिलेक्ट की गई लोकेशन पर भी गया..तो टनल के एंड प्वाइंट बड़कोट वाली साइट पर भी गया..

बड़कोट साइट से 483 मीटर की दूरी है, जहां THDC काम कर रहा है..THDC दो डाया मीटर की टनल बनाते हुए आगे बढ़ रहा है..लेकिन THDC को इस काम में 30 से चालीस दिन का समय लगेगा.

अमेरिकन आगर मशीन के बाद अगर कोई दूसरा सबसे आसान विकल्प नजर आया तो वो था सिलक्यारा साइट से वर्टिकल बोरिंग का..यहां से टनल के जिस हिस्से में लोग फंसे हैं, उसकी डेप्थ 85 मीटर के आसपास है.

Silkyara tunnel
Silkyara tunnel

जब मैं ये बात लिख रहा हूं, तब आगर मशीन का काम एक बार फिर से ठप पड़ा हुआ है..मैं कुछ बेसिक चीजों की ओर आपका ध्यान खींचना चाहता हूं..केंद्रीय राज्य मंत्री वीके सिंह जी जब पहली बार ऑपरेशन साइट पर आए, तो मीडिया ब्रीफिंग में उन्होंने कहा कि इस तरह के ऑपरेशन एक जंग की तरह होते हैं..जिसे बिना समय गंवाए ठोस प्लानिंग के साथ वॉर फूट पर लॉच करना होता है..मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं..लेकिन, जिस ऑपरेशन साइट पर वीके सिंह जी ये बात बोल रहे थे, उसी साइट पर इन सभी चीजों का मैने घोर अभाव पाया.

Silkyara tunnel
Silkyara tunnel

मैने 2010, 2012, 2013 का उत्तरकाशी का प्रलय, रैणी की महाआपदा..जोशीमठ भू धंसाव और अब सिलक्यारा टनल हादसे को करीब से कवर किया..NTPC की लोहारीनाग पाला परियोजना मेरे सामने बनते बनते बंद हो गई..मनेरी भाली स्टेज टू को बनते हुए और फिर कमीशन होते हमने नजदीक से देखा है.

इस अनुभव के आधार पर मैं ये कह सकता हूं कि हम आज भी आपदाओं से निपटने में नौ सिखिए जैसा विहेवियर करते हैं..उत्तराखंड एक डिजास्टर प्रोन स्टेट है..लेकिन, कुछ सचिव और एक आध ऑफिसर को छोड़ दिया जाए, तो सारा सिस्टम आउटसोर्सिंग के जरिए रन कर रहा है..जिलों में तो हालत ये है कि यदि आपदा प्रबंधन की टीम को कहीं मूव करना है, तो एक अदद गाड़ी जुटाना, उसके लिए भारी पड़ जाता है.

Silkyara tunnel
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मुख्य बात पर आता हूं, सिलक्यारा टनल में हुई दुर्घटना क्यों गले की हड्डी बन गई, इसका करना है इसे शुरूआत में गंभीरता से नहीं लिया गया… मुख्य रूप से कार्यदायी एजेंसी NHIDCL ने इसको इतने हल्के तरीके से लिया जैसे बीच में कोई मलबा गिर गया हो और उसे बस जेसीबी मशीन से हटाना भर है.

इसका मतलब NHIDCL के पास एक्सपर्ट और अनुभवी इंजीनियर नहीं थे, जो इस घटना की भयावाहता का सही समय पर सटीक आंकलन नहीं कर पाए. जब इंजीनियर इसके सिरियसनेस को पकड़ नहीं पाए, तो जिला प्रशासन भी समझने में चूक कर गया कि ये घटना चैलेंजिंग होने वाली है..शुरुआत में बरती गई यही चूक, यही अनुभवहीनता पूरे ऑपरेशन पर भारी पड़ गई.

पहले चरण में टनल के अंदर से लोडर के जरिए मलबा हटाने का काम शुरू हुआ, लेकिन टनल में तो कैविटी बन चुकी थी, जितना हटाया उसका दुगना मलबा पहाड़ से टनल के अंदर भर गया..

Silkyara tunnel
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फिर 35 हॉर्स पॉवर की बोरिंग मशीन मंगाई गई..पूरा एक दिन मशीन के इंस्टालेशन में गुजर गया..ये मशीन एक घंटे में एक मीटर बोर करने की क्षमता रखती थी..लेकिन ये क्या ! मशीन ने जैसे ही बोरिंग शुरू की इसके वाइब्रेशन से पूरा पहाड़ खिसक गया… जो मलबा तीस मीटर में था वो धीरे धीरे साठ मीटर में पसर गया..ये मशीन केवल 45 मीटर तक ही बोर कर सकती थी.. सवाल उठा अब क्या होगा.. मलबा तो साठ मीटर में पसर गया.

दूसरी बात इस मशीन के एक्सपर्ट इंजीनियर आदर्श जैन का मैने इंटरव्यू किया..तो एक और चौंकाने वाली बात सामने आई..इंजीनियर को पता ही नहीं था कि जिस हिस्से में वो काम करने जा रहा है, वहां का सॉयल नेचर किस तरह का है..टनल के इस हिस्से में मिट्टी पूरी तरह टेलकम पाउडर की तरह थी (आप टनल के बाहर गिराए गए मलबे की फोटो देख सकते हैं) यानि की सीमेंट का बूरा जैसी थी…इस टेलकम पाउडर में ये मशीन अपनी पूरी कैपेसिटी में काम करने में कामयाब नहीं थी..इस मिट्टी में वो एक घंटे में लगभग आधा मीटर ही बोर कर पा रही थी. कायदे से मशीन लाने से पहले इंजीनियर को ये जानकारी होनी चाहिए थी या कंपनी को उसे देनी चाहिए थी.

Sunil navprabhat
Silkyara tunnel

खैर इसके बाद अमेरिकन आगर मशीन मंगाई गई..दो दिन इसमें भी बीत गए…ये मशीन साढ़े 17 सौ हॉर्स पॉवर की थी..इसके वाइब्रेशन से टनल थर्रा गई..ये मशीन भी 22 मीटर बोर करने के बाद बेयरिंग खराब होने और आगे हार्ड रॉक आने के कारण बंद हो गई..

उसके बाद जाकर प्लान A,B,C, D आदि आदि लॉन्च किए गए… टेल और फ्रंट साइड से माइक्रो टनलिंग, हॉरिजेंटल बोरिंग, वर्टिकल बोरिंग आदि आदि.. देशभर में मशीनें खोजी गई..जो अब तक भी पहुंच ही रही हैं..
इसी दौरान साइट पर और आगर मशीनें मंगा दी गई..जब मैं ये लिख रहा हूं , आगर मशीन ठप पड़ी हुई है..उसके आगे कुछ हार्ड मटेरियल आ गया है.

Silkyara tunnel
Silkyara tunnel

कितना अच्छा होता डे वन से ही टनल को भेदने के सारे प्लान लांच कर दिए जाते..शायद 6 में से एक प्लान में अब तक सफलता मिल जाती. खासकर 85 मीटर वाले वर्टिकल बोरिंग प्लान से..2015 में हिमानचल में ऐसे ही निर्माणाधीन मोटर टनल में फंसे श्रमिकों को 65 मीटर के करीब वर्टिकल ड्रिल कर नौ दिन बाद निकाल लिया गया था.

हालांकि, बाद में युद्ध स्तर पर शुरू हुए काम के कारण बोरिंग के लिए पहाड़ी पर करीब 15 सौ मीटर सड़क दो दिन में काट दी गई..लेकिन ये सब देरी से शुरू हुआ..ड्रिलिंग मशीनें राजस्थान, गुजरात, नासिक से मंगाई गई..सड़कों से पहुंचते पहुंचते तीन से चार दिन लग गए.

फिलहाल, अब आगर मशीन ही एक मात्र विकल्प है, जो भले घंटों बाद फिर से बोरिंग शुरू करने लग जाए, तब भी ये सबसे जल्द पहुंचने वाला और शेफ उपाय होगा.

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