Saturday, September 12, 2026
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हिमालयी रोमांच’ ,’मेरी पहली विदेश यात्रा’ – नीरज नैथानी

नीरज नैथानी जीश्रीनगर (गढ़वाल) के मूल निवासी हैं।वह इस देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं । साहित्य की विविध विधाओं में वह बहुत ही कुशलता एवं अधिकार पूर्वक अपना लेखन करते हैं। वास्तव में वह बहु आयामी प्रतिभा के धनी और यायावर प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। घुम्मकड़ पन छात्र जीवन से ही उनके रोम -रोम में बसा हुआ है। जब वह श्रीनगर यूनिवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे उस समय भी उन्होंने हिमालय पर्वत के दुर्गम क्षेत्रों में अनेक पथारोहण किए हैं, जिनके रोमांचक यात्रा वृतांत हमने उनकी पुस्तकों में और फेसबुक पर पढ़ें हैं। यह उनकी यायावरी प्रवृत्ति का ही परिणाम है की न केवल उन्होंने व्यापक स्तर पर देशाटन किया है, हिमालय में पर्वतारोहण किया है बल्कि अनेक देशों की विदेश यात्राएं भी की हैं। जैसा की मैंने पहले ही लिखा है कि उनका लेखन विभिन्न विधाओं में होता है तो अब तक उनकी विभिन्न विधाओं में अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं । ‘डोंगी’ उनका लघु कथा संग्रह है, ‘हिम प्रभा’ उनका काव्य संकलन है, ‘विविधा’ उनका निबंध संकलन है तथा ‘लंदन से लैस्टर’ ,’हिमालय पथ पर’, ‘हिमालय से हिमालय तक’, ‘थाईलैंड से लौटकर’, ‘हिमालय में पथारोहण’, ‘हिमालयी रोमांच’ ,’मेरी पहली विदेश यात्रा’ आदि उनकी संस्मरणात्मक पुस्तकें अभी तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
सुविख्यात साहित्यकार होने के साथ-साथ श्री नीरज नैथानी जी मूल रूप से एक शिक्षक हैं और एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण उनमें स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं। एक शिक्षक का यह कर्तव्य भी होता है और उसका नैतिक धर्म भी होता है कि उसके अंदर जो भी ज्ञान भरा हुआ है वह उसको सभी के साथ शेयर करें उसे प्रति पल सबमें बाॅंटते चलें। शायद अपनी इसी स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण श्री नैथानी जी ने अपनी जीवन यात्रा के दौरान जो भी कुछ अर्जित किया है, जो भी कुछ देखा और अनुभव किया है चाहे पर्वतारोहण के दौरान अनुभव किया हो, चाहे देशाटन के दौरान अनुभव किया हो और चाहे विदेश यात्राओं के दौरान अनुभव किया हो, उन्होंने जो कुछ भी अर्जित किया उसे उन्होंने शब्दों में ढाल कर पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया ,फेसबुक पर शेयर किया और अपने ज्ञान और अनुभव को सभी पाठकों तक पहुंचाने का एक समाजोपयोगी कार्य किया। अभी तक नैथानी जी ने अनेक विदेशी यात्राएं की हैं जिनके संस्मरण विभिन्न पुस्तकों के माध्यम से हमारे सामने उपलब्ध हैं लेकिन प्रस्तुत पुस्तक में जैसा की इस पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट होता है ‘मेरी चयनित विदेश यात्राएं’ अर्थात इस पुस्तक में नैथानी जी ने अपनी कुछ चयनित विदेश यात्राओं के संस्मरणों को ही प्रकाशित कराया है। यह पुस्तक आम पाठकों के लिए कितनी उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पुस्तक का प्रकाशन वित्तीय वर्ष 2024- 25 में उत्तराखंड भाषा संस्थान की पुस्तक प्रकाशन के लिए वित्तीय सहायता योजना 2024 के अंतर्गत संपूर्ण किया गया है।
इस पुस्तक में श्री नीरज नैथानी जी की निम्नलिखित चार विदेशी यात्राओं का वर्णन पढ़ने को मिलता है:-
1- अरब की धरती पर
2- सिंगापुर से क्वालालम्पुर
3- पिरामिडों के देश में
4- सात दिन भूटान में
यह सभी यात्राएं विदेशों में हिंदी साहित्य को महत्व देने तथा वहाॅं पर उसके प्रचार- प्रसार को आगे बढ़ाने के लिए सरकारी योजनाओं के अंतर्गत की गई हैं। इन यात्राओं के संस्मरणों को पढ़ने से न केवल हमें इन देशों में चल रही हिंदी साहित्य की गतिविधियों के बारे में काफी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं अपितु इन देशों के बारे में भी बहुत कुछ जानने का अवसर घर बैठे ही मिल जाता है। श्री नीरज नैथानी जी जब भी किसी देश की यात्रा पर जाते हैं तो वहाॅं की ऐतिहासिक, प्राकृतिक, भौगोलिक ,सामाजिक, सांस्कृतिक ,आर्थिक और दैनिक दिनचर्याओं का बहुत ही गहराई से और सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन करते हैं तथा फिर बहुत ही रोचक, आकर्षक और सधी हुई चुस्त भाषा में उन अनुभवों को संस्मरण के रूप में लिख कर हम पाठकों तक पहुंचाते हैं। संस्मरण लिखते समय उनकी पैनी दृष्टि से कोई भी चीज, कोई भी छोटी से छोटी घटना बच नहीं पाती है। सभी घटनाओं का वह ऐसा हृदयस्पर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं की दिल झूम उठता है। उनकी भाषा शैली इतनी जीवंत होती है कि पाठकों को घर बैठे -बैठे ही यह महसूस होने लगता है जैसे वह सुदूर हजारों किलोमीटर उस देश में नैथानी जी के साथ स्वयं भी सशरीर भ्रमण कर रहे हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में पहला संस्मरण ‘अरब की धरती पर’ है। नव सृजन गाथा छत्तीसगढ़ द्वारा 12 से 19 फरवरी 2013 तक संयुक्त अरब अमीरात के राज्यों दुबई, शारजाह ,अबू धाबी, अजमान तथा फुजीरोह में छठा अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें भारत से कुल छियानबे प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। संयुक्त अरब अमीरात की इस प्रवास अवधि में पाकिस्तान मूल के श्री कासिफ ने उनके लिए आठ दिनों तक गाइड का दायित्व निभाया। कासिफ ने उन्हें संयुक्त अरब अमीरात के विभिन्न स्थानों के बारे में बहुत गहन और सार्थक जानकारियाॅं दी हैं जो सभी के लिए जानने योग्य हैं। संयुक्त अरब अमीरात वास्तव में सात विभिन्न अमीरातों को संगठित करके बनाया गया एक गठबंधन है। इन सातों अमीरातों की वर्तमान में संयुक्त जनसंख्या कुल 85 लाख है। अपने 8 दिन के भ्रमण काल में नैथानी जी ने दुबई,एटलांटिक पाम सिटी सेंटर, डेजर्ट विलेज रिजॉर्ट, फुजैरा का किला,अजमान, आबूधाबी,जुमेराह मस्जिद, आदि पर्यटक स्थलों का व्यापक भ्रमण किया तथा वहाॅं के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारा। इस आठ दिवसीय यात्रा के दौरान हमें संयुक्त अरब अमीरात में चल रही न केवल हिंदी साहित्य की गतिविधियों की पर्याप्त जानकारी मिलती है बल्कि हमें दुबई व अबू धाबी समेत समस्त पर्यटक स्थलों की सौंदर्यता, उसके वैभव, उसकी विराटता और वहाॅं की संपन्नता तथा सुख सुविधाओं से अवगत होने का भी अवसर मिलता है। वहाॅं के स्वादिष्ट व्यंजनों के बारे में पढ़ते वक्त तो मुॅंह से पानी आना नहीं रुक पाता है। आठ दिनों की इस सुखद, मनोरंजक तथा रोचक यात्रा के बाद वह क्षण थोड़ा सा पाठकों को भी भावुक कर देता है जब यह दल अपने गाइड कासिफ से अलविदा कहता है। उस वक्त सभी पर्यटकों की आंखें नम हो जाती हैं। वह सभी कासिफ की व्यवहार कुशलता ,उसकी मिलन सारी और सभी स्थलों के बारे में उसकी विस्तृत जानकारी से बहुत प्रभावित हो गए थे और इसी कारण विदा होते समय कासिफ के लाख मना करने पर भी इन सभी पर्यटकों ने आपस में कंट्रीब्यूट करके एक अच्छी खासी धनराशि का लिफाफा बतौर टिप कासिफ को दिया और भारी मन से उसे विदा किया और स्वयं नई दिल्ली के लिए वापस प्रस्थान किया।
इस पुस्तक में दूसरा यात्रा वृतांत ‘सिंगापुर से क्वालालम्पुर’ का है। परिकल्पना संस्था लखनऊ (उत्तर प्रदेश) द्वारा दिनांक 20 जून से 26 जून 2017 तक मलेशिया व सिंगापुर में आयोजित होने वाले अष्टम अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में जाने के लिए उत्तराखंड से लेखक श्री नीरज नैथानी जी तथा उनके एक साथी जय कृष्ण पैन्यूली जी को आमंत्रित किया गया था ।इस यात्रा के लिए वह 19 जून को दोपहर में श्रीनगर गढ़वाल से रवाना हुए थे। इस यात्रा के दौरान उन्हें गाइड के रूप में एक बहुत ही आकर्षक, सौम्य एवं हॅंसमुख स्वभाव की महिला मिली जिसे सभी लोग ‘वा-वा’ के नाम से पुकारते थे। दक्षिण एशिया महाद्वीप में मलेशिया एवं इंडोनेशिया देश के मध्य में स्थित सिंगापुर वर्तमान समय में विश्व के प्रमुख महत्वपूर्ण बंदरगाहों में अपना स्थान रखता है। अनेक बार बसने- उजड़ने के क्रम में वर्तमान सिंगापुर को 20वीं शताब्दी में 1942 से लेकर 1945 तक जापान ने अपने अधीन रखा। पुनः द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात जापान की पराजय हो जाने पर यह द्वीपीय राष्ट्र ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया। वस्तुत: आधुनिक सिंगापुर की स्थापना का श्रेय ब्रिटेन को ही जाता है। पुनः 31 अगस्त 1963 को ब्रिटेन से मुक्त होकर यह द्वीप मलेशिया में विलीन हो गया, आज का आधुनिक सिंगापुर 9 अगस्त 1965 को मलेशिया से मुक्त होकर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया है।’ माजूलाह सिंगापुरा ‘ यहाॅं का राष्ट्र गान है। सिंगापुर में पीने का पानी मलेशिया से आयात किया जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि तमाम दिक्कतों के बावजूद सिंगापुर की अर्थव्यवस्था का विश्व में चौथा श्रेष्ठ स्थान है। अत्याधुनिक सिंगापुर कॉल सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, होटल व्यवसाय, मार्केटिंग, ट्रेडिंग, फाइनेंस, कॉमर्स का बूमिंग केंद्र बनकर सारी दुनिया में धूम मचा रहा है। यहां की संस्कृति पर मलाया की छाप देखने को मिलती है। इस यात्रा के दौरान सभी साहित्यिक पर्यटकों ने न केवल हिंदी साहित्य की गतिविधियों में बढ़ चढ़कर भाग लिया बल्कि सिंगापुर व कुआलालंपुर आदि के दर्शनीय स्थलों का भी व्यापक भ्रमण किया। इन स्थलों के प्राकृतिक सौंदर्य ,इनकी भव्यता और यहाॅं के स्थानीय रीति-रिवाज तथा स्थानीय खाद्य पदार्थों का बहुत ही रोचक एवं मनभावन विवरण आदरणीय नैथानी जी ने अपने इस संस्मरण में प्रस्तुत किया है। एक-एक घटना का बहुत ही बारीकी से विश्लेषण करते हुए उसे ज्ञानवर्धक ढंग से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है, जिससे सभी पाठक इन देशों की तथा इन स्थानों की कल्चर के बारे में समग्र रूप से जान सकें। क्लॉक टावर, चाइनीज टेंपल, चाइना टाउन,लूबूह अमपंग (लघु भारत), जॉर्ज टाउन , मर्डेका स्कावअर,न्यू किंग पैलेस,पुत्रजाया आदि महत्वपूर्ण स्थानों का यात्रा वर्णन बहुत ही सधे हुए तथा उपयोगी अंदाज में प्रस्तुत किया गया है। पढ़ते- पढ़ते ऐसा लगता है जैसे हम स्वयं उन स्थानों का अपनी आंखों से दर्शन कर रहे हैं। इन स्थानों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाॅं उपलब्ध कराने का कार्य उनकी गाइड ‘वा-वा’ द्वारा किया गया।’ वा-वा ‘ का व्यवहार सभी को बहुत अच्छा लगा। उनकी बात करने की शैली ,किसी जानकारी को बताने का तरीका, अनुभवों को साझा करने की प्रभावशाली विधि तथा उनका अंतरराष्ट्रीय मानवीय दृष्टिकोण सभी को काबिले तारीफ लगा। यात्रा के अंतिम दिन सभी साहित्यिक मित्रों ने भरे मन से ‘वा-वा’ को विदा किया तथा स्वयं स्वदेश के लिए प्रस्थान किया।
इस पुस्तक में तीसरा महत्वपूर्ण संस्मरण ‘पिरामिडों के देश में’ नाम से है। सृजन गाथा संस्था द्वारा दिनांक 6 जून से 17 जून 2022 की अवधि में 19वां अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रांतों के 55 प्रतिभागियों को सहभागिता के लिए चयनित किया गया।इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए सभी प्रतिभागी 7 जून 2022 को प्रातः 5:30 बजे काइरो एयरपोर्ट पर पहुंचे। यहां पर उन लोगों को इस यात्रा के लिए एक 32 वर्षीय युवा गाइड मोहम्मद मिला जिसने सभी अतिथियों का स्वागत किया। इस पूरी यात्रा में ठहरने के लिए होटल आदि की व्यवस्था तथा घूमने- फिरने के लिए वाहनों की व्यवस्था बहुत आरामदायक मिली। विदेशों में हिंदी साहित्य सम्मेलन आयोजित करने का अपना ही रोमांच होता है ऐसे आयोजनों में न केवल अपने ही देश के बहुत से विद्वान साहित्यकारों से अन्तरंग परिचय हो जाता है बल्कि विदेशों में हिंदी साहित्य की ध्वजा फहराने वाले अनेक विद्वान कवि व साहित्यकारों से भी बहुत घनिष्ठ परिचय हो जाता है जो जीवन भर अविस्मरणीय रहता है। निर्धारित साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग करने के साथ-साथ लेखक ने अपने अन्य साथियों के साथ इस देश के अनेक पर्यटक स्थलों का भी भ्रमण किया तथा वहाॅं की महत्वपूर्ण बातों को अपनी डायरी में नोट किया ताकि एक संस्मरण के रूप में उन्हें लिपिबद्ध किया जा सके। उन्होंने मुख्यरूप से ‘क्वटबे का सिटेडल’, ‘अबू अल अब्बास अल मूर्सी मस्जिद’,’इजिप्ट नेशनल म्यूजियम ‘, ‘युया का कोफिन ताबूत’,’अहमद शाकी म्यूजियम ‘,’काइरो रेलवे स्टेशन ‘, आसवान बाॅंध,फिला टेम्पल,कोम ओम्बो के मंदिर,न्यूबियन गाॅंव,एडफू,करनाक मन्दिर ,हैट्से पस्टू रानी का मन्दिर,वैली आफ किंग आदि महत्वपूर्ण स्थानों के भ्रमण का विवरण इस संस्मरण में बहुत विस्तार से तथा इस दृष्टि से किया है कि पाठकों को इन स्थानों की भौगोलिक, आर्थिक एवं ऐतिहासिक धरोहर के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके। इस संस्मरण को पढ़कर पता चलता है कि मिस्र का संपूर्ण इतिहास नील नदी के आसपास ही विकसित हुआ है। वस्तुत: मिस्र ,अरब गणराज्य का एक अवयव देश है। मिस्र का अधिकांश भाग उत्तरी अफ्रीका के परिक्षेत्र में आता है। यहाॅं का आसवान बाॅंध महत्वपूर्ण है। इसके निर्माण से नील नदी की बाढ़ पर अंकुश तो लगाया ही गया है साथ ही मिस्र के सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन को भी बढ़ावा मिला है। नील नदी में क्रूज पर यात्रा करते हुए उन्हें यह अनोखा दृश्य भी देखने को मिला की गतिमान क्रूज में बैठे टूरिस्टों को तेज दौड़ती इंजन बोट से कुछ व्यापारी अपना सामान बेचते हैं। यह दृश्य बड़ा रोमांचकारी होता है। ‘वैली ऑफ किंग’ में लगभग साढ़े तीन हजार साल पूर्व मृत लोगों के शवों को प्राचीन वैज्ञानिक विधियों से रसायन आदि का लेपन कर अनूठे अंदाज में संरक्षित कर देने का नायाब तरीका देखकर यहाॅं आने वाले पर्यटक दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं। विद्यार्थीकाल से ही हम सब मिस्र का इतिहास पढ़ते समय वहां के विश्व प्रसिद्ध पिरामिडों के बारे में जानकर अनेक प्रकार के कौतूहल से भर जाते हैं ,विशेष कर इस तथ्य को लेकर आश्चर्य होता है कि ऐसा क्या खास है उन त्रिभुजाकार आकृतियों में कि उन्हें दुनिया के सात अजूबों में शामिल किया गया है। नैथानी जी ने अपने संस्मरण में इन पिरामिडों के इतिहास ,उनके वास्तुकला और उनके सौंदर्य के बारे में विस्तृत रूप से लिखा है जो पढ़ने से ताल्लुक रखता है। इस संस्मरण को पढ़कर मिस्र और उसके आसपास के क्षेत्रों के बारे में वहाॅं की सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और स्थानीय रीति-रिवाज के बारे में विस्तृत और सटीक जानकारी मिलती है। वहाॅं की भव्यता, दिव्यता, संपन्नता और सुख- सुविधाओं के साथ-साथ वहां की भौगोलिक दुश्वारियों के बारे में भी बहुत कुछ जानने को मिलता है। नैथानी जी का यह कार्य बहुत ही प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय तथा पाठकों के लिए उपयोगी है। यात्रा के अंतिम चरण में सभी पर्यटकों ने वापसी के लिए एयरपोर्ट जाकर बहुत ही अपनत्व के साथ मन ही मन कहा अलविदा मिस्र ,अलविदा ऐतिहासिक विरासत ,अलविदा पिरामिडों के संसार, अलविदा ममीज, अलविदा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासत की धरती।
इस पुस्तक का चौथा और अंतिम संस्मरण है ‘सात दिन भूटान में’। भूटान में 4 से 12 जून 2023 की अवधि में आयोजित होने वाले 21वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में सहभागिता करने के लिए लेखक अपनी पत्नी श्रीमती माधुरी नैथानी के साथ 3 जून 2023 को पश्चिम बंगाल के नगर सिलिगुड़ी पहुंचे थे। सिलीगुड़ी घूमने के दौरान उन्होंने वहां इस्कॉन मंदिर के दर्शन किए । इस 9 दिवसीय 21वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भारत के विभिन्न राज्यों से कुल 103 साहित्यकारों, कवियों, लेखकों , संपादकों , पत्रकारों ने प्रतिभाग किया था। इस यात्रा के दौरान उन्हें गाइड के रूप में मिले 25 वर्षीय युवा कप्तान रमेश मोंगर जिन्होंने उन्हें इस पूरे क्षेत्र के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाॅं उपलब्ध कराई। भूटान एक पहाड़ी देश है जिसका सौंदर्य देखते ही बनता है यहां के स्थल बहुत ही रमणीय और मनभावन हैं। यहां पर सागर तल से 3150मीटर ऊंचाई पर दो चुला पास है । यहाॅं पर 108 स्तूप बनाए गए हैं ।इनका ऐतिहासिक महत्व यह है की एक बार आतंकवादियों ने भूटान के कुछ पहाड़ी क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था । भूटान की अपनी कोई सेना नहीं थी इसलिए भूटान नरेश ने भारत सरकार से आतंकवादियों से मुक्ति दिलाने हेतु आग्रह किया था। भारत सरकार ने तत्काल मित्र राष्ट्र का धर्म निभाया और अपनी सेना भेजी। कड़े संघर्ष के पश्चात उस क्षेत्र से आतंकवादियों को मार भगाया। उस सैन्य संघर्ष में वीरगति को प्राप्त सैनिकों को श्रद्धांजलि प्रदान करने हेतु दोचुला पास में यह 108 स्तूप बनाए गए हैं। भूटान में बहुत ऊंचे-ऊंचे हिम शिखर हैं जिनका सौंदर्य तथा विराटता मन को मोह लेती है। लेखक द्वारा भूटान के तीर्थ स्थलों का भ्रमण करना एक बहुत ही प्रशंसनीय कदम कहा जाएगा। भूटान में एक ऊंची पहाड़ी पर गौतम बुद्ध की 51.5 मीटर ऊंची पद्मासन मुद्रा में विश्व की सबसे ऊंची मूर्ति है और वहां से हिमालय श्रृंखला साफ दिखाई देती है। यह अलौकिक दृश्य मन में स्वाभाविक रूप से उतर जाता है। लेखक ने अपने इस संस्मरण में रॉयल टॉकिंन प्रिजर्व सेंटर, मोठिंग चिड़ियाघर, भूटान के राष्ट्रीय पुस्तकालय, दुरयाल दोजोंग किला स्थली,टाइगर नेस्ट,नेशनल म्यूजियम,फीचू मोनेस्ट्री तथा दार्जिलिंग की सैर का बहुत ही विस्तृत, संवेदनात्मक ,भावात्मक , रोमांचक तथा ज्ञानवर्धक विवरण प्रस्तुत किया है। दार्जिलिंग पर्यटन के लिए बहुत सुंदर स्थल है । जून के महीने में जहाॅं मैदानी इलाके गर्मी में झुलस रहे होते हैं पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम मस्त बना रहता है। यही कारण है कि दार्जिलिंग जैसे हिल स्टेशनों में पर्यटकों का सैलाब उमड़ पड़ता है। लेखक अपने संस्मरण में दार्जिलिंग की ट्वाय ट्रेन की विशेषता बताते हुए लिखते हैं कि यह ट्रेन बीच बाजार में सड़क को पार कर दूसरी तरफ के ट्रैक पर चलती है तो कईं बार सड़क के किनारे बने मकानों व दुकानों के बरामदों को छूते हुए निराले अंदाज में आगे बढ़ती है। रेल ट्रैक ऐसे -ऐसे घुमावदार रास्तों से गुजरता है कि आप आसपास की दृश्यावलियों का भरपूर अवलोकन कर सकें। इस यात्रा की अविस्मरणीय मधुर पर्यटन स्मृतियों को लेकर यह लोग वापस अपने-अपने घरों के लिए प्रस्थान कर गए।
वास्तव में श्री नीरज नैथानी जी ने यह सभी संस्मरण बहुत परिश्रम करके बड़े ही मनोयोग के साथ लिखे हैं। इन संस्मरणों को लिखने का उनका एकमात्र उद्देश्य यह रहा कि पाठक सुदूर विदेश में स्थित इन सभी स्थलों की भौगोलिक ,प्राकृतिक, राजनीतिक, आर्थिक ,सामाजिक, सांस्कृतिक, स्थानीय रीति-रिवाजों के बारे में घर बैठे ही जान सकें। सभी जगह के स्थानीय स्वादिष्ट व्यंजनों और वहां की परिवहन आदि की व्यवस्थाओं का बहुत ही गहराई पूर्ण वर्णन इन संस्मरणों में किया गया है। यात्राओं के दौरान आने वाली स्वाभाविक दिक्कतों का वर्णन भी इन आलेखों में बहुत सहजता और स्वाभाविकता के साथ मनोरंजन के पुट के साथ किया गया है। सभी संस्मरण इतने उत्कृष्ट ढंग से लिखे गए हैं कि एक-एक स्थल का चित्र जीवंत होकर हृदय पटल पर अंकित हो जाता है ।यह संस्मरण मेरे जैसे उन तमाम लोगों के लिए तो बहुत ही उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक हैं जो विदेश यात्रा तो क्या करेंगे जिन्हें देश में ही थोड़ी दूरी की यात्रा करते हुए भी बहुत हिचकिचाहट होती है । ऐसे लोगों के लिए यह संस्मरण घर बैठे बिठाये ही विदेश यात्रा कर लेने के समान है। मैं इस पुनीत कार्य के लिए आदरणीय श्री नीरज नैथानी जी को अपने हृदय की गहराइयों से मुबारकबाद देता हूॅं ।यह पुस्तक सभी के लिए न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय भी है। इस पुस्तक की आकर्षक तथा त्रुटि रहित छपाई करने के लिए और इसे प्रकाशित करने के लिए मैं समय साक्ष्य प्रकाशन का भी हृदय से आभार ज्ञापित करना चाहता हूॅॅं कि उन्होंने एक अनमोल पुस्तक को प्रकाशित कर पाठकों को उपलब्ध कराने का सराहनीय कार्य किया है।

पुस्तक – मेरी चयनित विदेश यात्राएं। प्रकाशक व मुद्रक:- समय साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून

पृष्ठ संख्या:- 160, मूल्य:- 250 रुपए मात्र

समीक्षक – सुरेन्द्र कुमार सैनी, रुड़की
मो.न. 7906191781

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