केंद्र से मिलने वाली रकम बाढ़ सुरक्षा कार्यों में खर्च न हो।
By – Pankaj kushwah
आज प्रधानमंत्री उत्तराखंड में आपदा प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करेंगे और उसके बाद देहरादून में अधिकारियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक करेंगे।
उम्मीद है कि हिमाचल, पंजाब की तरह ही उत्तराखंड को भी आपदा से हुए नुकसान की भरपाई के लिए राहत पैकेज मिले। हालांकि, पंजाब और हिमाचल में जिस तरह से आपदा ने तबाही मचाई उस लिहाज से आपदा राहत की राशि बहुत कम है लेकिन दोनों ही राज्यों में गैर भाजपा सरकार है पर उत्तराखंड में राज्य, निकायों, पंचायतों तक में भाजपा सरकार है, लोगों ने भाजपा को हर स्तर पर भर भर के वोट दिए हैं, ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि जितने नुकसान का आकंलन राज्य सरकार ने किया है और उसकी भरपाई के लिए पांच हजार करोड़ रूपए की मांग जो केंद्र सरकार के सामने रखी है उसके अनुरूप ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य को राहत अनुदान दें।
हालांकि, जितना मिले पर वह आपदा प्रभावितों की बेपटरी हो चुकी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने, आजीविका संवृर्द्धन, सड़कों के पुनर्निर्माण समेत उन अतिआवश्यक कार्यों में खर्च हो जिनसे व्यवस्थाएं पटरी पर आ सके। वह रकम बेवजह के बाढ़ सुरक्षा कार्यों के नाम पर खर्च न हो जिसमें सिर्फ ठेकेदार, अधिकारी, मंत्री, इंजीनियरर्स के खजाने भरे जाएं।
बाढ़ सुरक्षा कार्यों के नाम पर इस राज्य में खुली लूट की परंपरा दशक भर पुरानी है। मैं पंचायती चुनावों में एक पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष की ओर से अपने कार्यों के ब्यौरे को पढ़ रहा था तो उसने अपने गांव के किसी गधेरे में तक पांच पांच करोड़ रूपए के बाढ़ सुरक्षा कार्य करवाए जिससे न गांव को कभी खतरा था न किसी आबादी क्षेत्र का।
2012-13 में आपदा के दौरान हुए बाढ़ सुरक्षा कार्यों ने उत्तरकाशी को अब तक सुरक्षित रखा हुआ है लेकिन कुछ ऐसी जगहों पर भी काम हुए जो सिर्फ ठेकेदारों, कार्यकर्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिए था।
हमने ऐसे ऐसे गधेरों में भी बाढ़ सुरक्षा कार्य होते देखे हैं जिनका आबादी से, कृषि भूमि से, किसी महत्वपूर्ण जगह से कोई संबंध नहीं होता। हमारे पहाड़ों में हम आपदाएं भी अवसर बनकर आते हैं और बाढ़ सुरक्षा कार्य इकलौता ऐसा काम है जिसमें ठेकेदार, नेता, अधिकारी, इंजीनियर सब जमकर माल कमाते हैं।
जबकि, जरूरत प्रभावितों को समुचित राहत, उनके लिए रोजगार के विकल्प, ध्वस्त सड़कों, मूलभूत सुविधाओं को दुरूस्त करने की होती है।
आपदा को लेकर एक मिजाज बनते देख रहे हैं कि ‘एवरीवन लव्स ए गुड डिजास्टर’ जैसा माहौल हो गया है। इसलिए, नजर रखिए कि जब केंद्र की ओर से अनुदान मिले या सरकार आपदा प्रभावित इलाकों में बेपटरी जिंदगी को पटरी पर लाने का काम करें तो उसमें बाढ़ सुरक्षा कार्यों के नाम पर पैसे को ठिकाने लगाने का काम न हो।
ठेकेदार गिद्ध निगाहें लगाए बैठे हैं कि कब मानसून निपटे और बाढ़ सुरक्षा कार्यों के प्रस्ताव बुलेट ट्रैन की गति से इस टेबल से उस टेबल तक स्वीकृति तक पहुंच जाए।
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