Sunday, September 13, 2026
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हिमालय में साहसिक यात्राओं की बहुआयामी पड़ताल करती किताब

हिमालय में साहसिक यात्राओं की बहुआयामी पड़ताल करती किताब

By – Dr Arun kuksal

“बगन्या पाणी थामी जांछ
नै थामीनो मन”

(लोकगीत – कुमाऊँनी में न्योली और गढ़वाली में खुदेड़)
भावार्थ यह है कि, ‘बहते पानी को तो रोका जा सकता है पर मन को थामना बड़ा कठिन है।’

प्रो. शेखर पाठक और साथियों के गंगोत्री – कालिन्दीखाल – बद्रीनाथ यात्रा – 2008’ के बाद के 13 वर्षों की मन-मस्तिष्क की अनवरत ऐसी ही उथल-पुथल से उपजे सैलाब के प्रवाह और प्रभाव की परिणिति है, यह किताब।

सितम्बर, 2008 से फरवरी, 2021 के एक दशक से भी ज़्यादा फैलाव ने इस किताब को और भी यादगार बना दिया है।

कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल में इतिहास के प्रोफेसर, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान और नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय में फैलो रहे शेखर पाठक की हिमालयी इतिहास, संस्कृति, सामाजिक आन्दोलनों, स्वतंत्रता संग्राम तथा अन्वेषण के अध्येयता और घुमक्कड़शास्त्री की लोकप्रिय पहचान देश-दुनिया में है। कुली बेगार प्रथा, पण्डित नैनसिंह रावत, ‘हरी भरी उम्मीद’ (चिपको आन्दोलन और अन्य जंगलात प्रतिरोधों की परम्परा), ‘दास्तान-ए -हिमालय’ (दो खंडों में) तथा कैलास-मानसरोवर क्षेत्र आदि पर आपकी किताबें विशेष चर्चित रही हैं।

Pro shekhar pathak book
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शेखर पाठक ने हर दशक में आयोजित अस्कोट-आराकोट अभियानों (1974-2024) में हिस्सेदारी के साथ भारतीय हिमालय के सभी प्रान्तों, नेपाल, भूटान तथा तिब्बत के अन्तर्वर्ती क्षेत्रों की कई अघ्ययन यात्राएं की हैं। साथ ही, हिमालयी जर्नल ‘पहाड़’ के 20 अंकों सम्पादन किया है। ‘नीले बर्फीले स्वप्नलोक में’ के बाद ‘हिमांक और क्वथनांक के बीच’ लेखक की दूसरी यात्रा-पुस्तक है।

यात्रा-पुस्तक ‘हिमांक और क्वथनांक के बीच’ ‘गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008’ के दौरान दो अलग-अलग पर्वतारोही दलों पर सामुहिक रूप में आये कई अकल्पनीय संकटों में खोने और बचने की अन्तः कथा-व्यथा का मार्मिक और रोमांचित यात्रा-वृतांत है।

बकौल, शेपा (शेखर पाठक) ‘…गंगोत्री-बद्रीनाथ यात्रा पूरी तरह पैदल थी। किलोमीटर तो 100 से 125 होंगे पर हर किमी. अपने आप में 10 किमी. होता है ऐसे मार्ग में। यात्रियों को गोलोकवासी होने देने का रिकार्ड भी इस मार्ग का अव्वल था। यह दो तीर्थों को एक कठिन भूगोल और अति वर्जित रास्ते से होकर या प्राकृतिक रूप से भागीरथी तथा अलकनन्दा के ऊपरी जलागमों को जोड़ता था। भागीरथी-केदारगंगा संगम (गंगोत्री) से यह यात्रा शुरू होती और तमाम गलों और कलिन्दीखाल को पारकर सरस्वती-अलकनन्दा संगम (बद्रीनाथ के पास) पर समाप्त।’ (पृष्ठ-41)

आशंकाओं के अनुरूप ‘गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008’ उत्तराखण्ड के साथ-साथ देश-दुनिया में भी चर्चित रही। 9 से 22 सितम्बर, 2008 तक की इस यात्रा में दो दलों के 49 सदस्य थे। एक दल में शेखर पाठक, अनूप साह और प्रदीप पांडे के साथ 7 सहयोगी तथा दूसरे दल में 7 ऑस्टियाईयों के साथ 32 सहयोगी शामिल थे। अत्यन्त दुर्गम स्थलों की 100 किमी. से अधिक के इस पथारोहण में मौसम की प्रतिकूलता ने 50 घण्टे से भी ज़्यादा समय तक यात्रियों को भीषण संकट में दबोचे रखा। इस विकट समय के अंत का अत्यंत दुखःद पहलू यह रहा कि 6 सहयोगी यात्रियों को बचाया नहीं जा सका था।

शेखर पाठक मानते हैं कि ‘यात्रायें आदमी को और ज़्यादा संवेदनशील, सहज, समझदार, साहसी तथा जिम्मेदार बनाने में मददगार होती हैं। प्रस्तुत यात्रा में वह स्वयं, अपने यात्रा साथियों और नीति-नियन्ताओं को इन पांचों कसौटियों पर परखते नज़र आते हैं।

गढ़वाल हिमालय के लगभग अनुछुये एक छोर (जिसमें भागीरथी और अलकनन्दा के आदिम उद्गम स्त्रोत/स्थल छिपे हैं।) की यह यात्रा है।

परन्तु, विचार-मंथन के केन्द्र में कर्मठता के साथ सहजता का प्रतीक संपूर्ण हिमालय है।

इस यात्रा वृतांत में घुमक्कड़ी विधा के विश्व प्रसिद्ध विभूतियों यथा- मूरक्राफ़्ट, नैन सिंह, किशन सिंह, टाँम लाॅन्ग स्टाफ, मैलोरी, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, हेनरिश हारा, पीटर ऑफ़स्नेटर, प्रणवानन्द, एडमैण्ड हिलेरी, तेनजिंग, निर्मल साह, इरविन तथा इस मार्ग पर पूर्व में गए सुन्दरानन्द, जे. बी. ऑडेन, गाॅर्डन ऑस्मोस्टन, नीरज पंत, गोविन्द पंत ‘राजू’, गिल्बर्ट विग्नेस, एरिक शिप्टन, टिलमैन, थार्के, पासाङग भोटिया, कुन्साङग, प्रबोधानन्द, दलीप सिंह, ट्रेवर ब्राहम, भक्ति विश्वास, श्याम साह, मलिका बिरदी, महेन्द्र मिराल, थियो, रामनाराण, फ्रेंक स्माइथ, मौरिस हरजोग, रौजर डुप्लां, सी़ एफ. मीड, ई. जे. बरनी, मार्को पाॅलिस, अजय सोडानी तथा जूंको ताबेई की यात्राओं से भी पाठक परिचित होता चलता है।

तेरह अध्यायों का विस्तार लिए यह यात्रा पुस्तक है। प्रथम अध्याय में टिहरी रियासत के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ टिहरी बाँध और मनेरी-भाली परियोजना से उत्पन्न मानवीय और पारिस्थितिकीय दुर्दशा का उल्लेख है। शेखर पाठक का सीधा सवाल और प्रबल आशंका ये है कि-

Book intru
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‘…सरकारों या कि समाज को किसी नदी की हत्या करने या अधमरा बनाने का हक़ किससे मिला था? यह सवाल भविष्य की पीढ़ियाँ पूछेंगी ज़रूर। उन्हें यह चमक नहीं, ज़्यादा अंधकार पैदा करने वाली साज़िश लगेगी यदि वह हमारी पीढ़ी से ज़रा सी भी प्रबुद्ध होगीं तो। गुस्सा भी होंगी।’(पृष्ठ-20)

(जहाँ-तहाँ, ऐसा कुछ देखते हुए मुझे भी रसूल हमज़ातोव की ‘मेरा दागिस्तान’ में लिखी पंक्तियाँ अक्सर याद आती हैं-‘शामील अपने सूरमाओं से कहा करता था-‘कोई बात नहीं कि दुश्मन ने हमारे सारे गाँव, हमारे सारे खेतों पर कब्ज़ा कर लिया। लेकिन चश्मा (बहते पानी का स्त्रोत) तो अभी हमारे पास है, हम जीतेंगे।’ दुश्मनों का हमला होने पर कठोर इमाम शामील सबसे पहले तो गाँव के चश्मे की रखवाली करने का हुक्म देता था। जब खुद दुश्मनों पर हमला करता था तो सबसे पहले गाँव के चश्मे पर कब्ज़ा करने का आदेश देता था।’)

अपने देश में तो हम ही अपनी जीवनदायनी नदियों के दुश्मन बने हैं। और, गंगा की संतान होने का गौरव भी अपने पास ही रखना चाहते हैं।

दूसरे अघ्याय में शेपा (शेखर पाठक) उत्तरकाशी की ओर की अपनी पुरानी यात्राओं की याद को मलाशते चलते जा रहे हैं। (कहा भी गया कि मलाशना जीवों का परम सुख है। चाहे, याद ही क्यों न हों।) उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल के फ्रैडरिक विल्सन के हरसिल से गुजरते हुए ‘…उसकी पूरी कहानी बताने का मन कर रहा है। पर इस तरह हम कालिन्दीखाल कैसे पहुँचेंगे!’ (पृष्ठ-30) मन से ये कहकर उन्होने अपने को रोका। परन्तु, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन, हेनरिश हारा और पीटर ऑफ़स्नेटर की इस मार्ग की गई यात्राओं का जिक्र करते हुए वे विलक्षण पथारोही, पर्वतारोही और फ़ोटोकार स्वामी सुन्दरानन्द से मुलाकात का विस्तार से उल्लेख करते हैं। गंगोत्री क्षेत्र को गहनता से जानने-समझने के लिए स्वामी सुन्दरानन्द सर्वोत्तम गाइड जो थे।

तीसरे अध्याय से यह यात्रा-पुस्तक निर्जन जगहों की ओर उन्मुख होती है। जहाँ दूर-दूर तक पसरी और बिखरी अप्रतीम वन्यता का ही राज है। दुर्लभ जीव-जन्तु वहाँ उसकी शर्तों पर पनाह पाये हुए लगते हैं। मुझे, घुमक्कड़ लेखक नेत्र सिंह रावत की मिलम ग्लेश्यिर की ओर के यात्रा-संस्मरण ‘पत्थर और पानी’ की याद आनी स्वाभाविक है। शेखर पाठक प्रकृति और आस-पास के परिवेश का वैसा-जैसा ही चित्र सामने रखते हैं।

‘मेरे सामने पहले पेड़ आये, भागीरथी के दोनों तरफ़। फिर एक सूखा पहाड़ जिसमें मौसम के असर ने छोटे-छोटे भूस्खलन पैदा किये थे। उसके पीछे बर्फ़ से लबालब सुदर्शन शिखर। शोभा को और बढ़ाने के लिए एक गोलमटोल बादल बहुत समझदारी से बीच में आ गया। उसने न शिखर ढका और न सूखे पर्वत को। बल्कि बीच में लटक गया। जब चाँदी ने सोना होना शुरू किया तो यह अकेला चंचल बादल पहले चाँदी और फिर सोने के हिरन सा चरने लगा।’ (पृष्ठ-40)

‘…हर दृश्य को जब हमारी आँख ही नहीं पकड़ पाती तो कैमरा क्या पकडे़गा। कैमरा सदा हमारी आँख से कम पकड़ता है। कैमरे का देखा फ़ोटो में आता है पर आँख का देखा स्मृति में दर्ज हो जाता है। पर कैमरा वाले मानें तब ना! बहुत कुछ हम सतत यात्रियों की आँखों और अनुभवों में आने से इस बार भी रह जायेगा। हम कायनात के कुछ हिस्से ही देख पाते हैं और समझ तो और भी कम को पाते होंगे। कुछ रह भी जाना चाहिए। पूरी प्रकृति का डाक्यूमेंटेशन मनुष्य द्वारा संभव नहीं है और यह उसे पच भी नहीं पायेगा।’(पृष्ठ-84)

‘हमारे पैरों के नीचे लाखों साल पुराना गल (ग्लेश्यिर) सोया था। यह नींद में कभी-कभी हिलता था पर गोमुख के क़रीब के गलों के मुक़ाबले पक्की नींद लेता रहा था। कभी बडे़ भूकम्प या एवलांच में यह बड़बड़ाता ज़रूर होगा। सपने में यह गोंडवाना लैण्ड को देखता होगा और अफ्रिका से उसका तब के एशिया की तरफ़ सरकना भी। हम नाचीज़ उसके ऊपर सोने का सौभाग्य पाये हुए थे। बिना उसे बताये…’(पृष्ठ-108)

निःसंदेह, वन्यता का वहाँ राज है और विकटता के बावजूद दुर्लभ जीव-जन्तु वहाँ उसकी पनाह में अपना स्वतंत्र जीवन-निर्वाह कर रहे हैं। परन्तु, अब उन्हें यह बखूबी खबर हो गई है कि वन्यता और जीवों पर अपनी अतृप्त लालसाओं की तीख़ी नज़र रखने वाला मानव नाम के प्राणी की अनचाही उपस्थिति उनके प्रकृति प्रदत रहवासों में तेजी से बढ़ने लगी है। और, यह मनुष्य महत्वाकाँक्षा और लोक-परलोक सुधारने के कर्मकाण्ड में अपनी विकृतियों के निशान वहाँ जहाँ-तहाँ छोड़ते जा रहा है।

‘गल से नज़र हटा अपने अगल-बग़ल देखा तो कच्छे, कपडे़, प्लास्टिक और बोतलें यहाँ-वहाँ पड़ीं थी। दो-तीन जोड़ी चप्पल और जूते। एक जनेऊ या रक्षा का तागा जैसा था और एक फूटा हुआ नारियल भी। समझ में नहीं आ सका कि इतने आस्थावान लोगों में अपने किये को उठाने की बरकत क्यों नहीं है? यही वह बिन्दु है, जहाँ अंधता आस्था के बहुत पास है बल्कि उसकी बड़ी बहिन सी बन जाती है।’ (पृष्ठ-56)

ये बात सही है कि आम आदमी तीर्थों के दर्शन करते हुए अंधविश्वासों के वशीभूत होकर सामान्यतया विवेकहीन आचरण भी करते हैं। ऐसे धर्मान्ध व्यक्ति तीर्थों और शिखरों की पवित्रता और चिरकालीन शांति को भंग कर देते हैं। वाजिब सवाल यह है कि, यात्रा से अगर अनुचित व्यवहार में कोई बदलाव और सुधार नहीं आया तो तीर्थ अथवा साहसिक यात्रा का क्या लाभ है? चेतावनी के रूप में यह संदेश यात्रियों और घुमक्कड़ों को सबक के बतौर आत्मसात करनी चाहिए।

शेखर पाठक का मानना है कि ‘तीर्थयात्रियों, पर्यटकों, पथारोहियों और पर्वतारोहियों के लिए यह अनिवार्य हो कि वे अपने सामान का कोई भी हिस्सा ऊपर न छोड़ आएँ। जैसा कि चीन ने तिब्बत में सफलतापूर्वक किया है। आयोजक एजेन्सी की यह ज़िम्मेदारी होती है। सोलो खुम्बू यानी सागरमाथा क्षेत्र (नेपाल) में शेरपा समुदाय ने यह प्रयास किया है। कंचनजंगा क्षेत्र में सिक्किम के लोग समझदारी से अपने अतिथियों को ऊपरी क्षेत्र में ले जाते हैं। उन्हें प्लास्टिक और गंदगी रहित सिक्किम का अर्थ पता है। उत्तराखण्ड में तीर्थाटन के बावजूद यह समझदारी नहीं बढ़ सकी है।’ (पृष्ठ-49)

अपनी इसी यात्रा को प्रश्नों के घेरे में लाते हुए शेखर स्वयं से पूछते हैं कि ‘इन निर्मम ऊँचाइयों में घूमने का क्या मक़सद या मतलब हो सकता था? क्या यह सिर्फ़ ज्ञान-अर्जन? दुनिया देखना था? प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर क्या यह हिमालय और अपने इलाक़े को समझने का प्रयास था? क्या यह हमें शहरी मोनोटाॅनी से बचने में मदद या दुर्लभ जीव तथा वनस्पति प्रजातियों के दर्शन का मौक़ा देता था? क्या उस अध्यात्म को समझने में मदद देता था जो तमाम धर्मों, उनके ग्रन्थों और उनकी तमाम विरासत के माध्यम से हिमालय से जुड़ा था? क्या इस तरह की यात्राएँ देश और दुनिया को समझने का विवेक हमको देती हैं? दे सकती हैं?’(पृष्ठ-109)

शेखर ये जरूर स्वीकारते हैं कि उन्हें स्वभाव से झुकने और शरीर से तन के खड़े रहने की सीख हिमालय हमेशा देता रहा है। अब ये मुझ पर है कि जीवन की ये सीख मैं कितना ग्रहण कर पाया और कर पाऊँगा। यह सीख हिमालयी रहवासी, यात्री, पर्यटक और घुमक्कड़ सभी के लिए है।

इसी बिन्दु पर शेपा हिमालय की ओर से विचार करते हैं कि ‘काश हिमालय या उसके सौन्दर्य स्थल, जिनमें तीर्थ भी शामिल हैं, अपने विवेक सम्मत आगन्तुकों या भक्तों का चयन कर पाते।’(पृष्ठ-110)

अध्याय तीन से अध्याय नौ तक हिमालयी शिखरों की लगातार घनघोर नीरवता की छत्रछाया में ये शब्द-यात्रा रही है। इस हिस्से में, भोजवासा (3729 मी.), तपोवन (4460 मी.), नंदनवन (4337 मी.), वासुकीताल (4880 मी.), खड़ा पत्थर (5480 मी.), सेतागल (5520 मी.), एवलांच पीक (5500 मी.) को पार करते हुए कालिन्दीखाल (5948 मी.) पहुँचने तक 5 दिनों की लगभग 50 किमी. के कठिन पथारोहण का वर्णन है। स्वाभाविक है कि इन पड़ावों में जाना और उन्हें पार करना रोचकता और रोमांच से भरपूर रहा है। ऐसी स्थिति में, शेखर लिखते हैं कि ‘कैमरा कहता था क्लिक करो और आँख कहती थी मजे़ से देखो, बस।’(पृष्ठ-46)

‘दो कव्वे पोर्टरों के ऊपर मँडरा कर मेरी ओर आये। अगल-बग़ल ऐसे बैठ गये जैसे सहयात्री हों या कि सुपरिचित या यह पूछने आये हों कि अनूप कौन हैं और प्रदीप कौन? दरअसल ये परवाज़ इन ऊँचाइयों में जीवन के फुदकते निशान हैं और कितनी ही तरह की राहत हमें देते हैं। कव्वे यहाँ सबसे सुपरिचित और अनौपचारिक रिश्तेदारी निभाते हैं।’(पृष्ठ-87)

परन्तु, 5 दिनों और रातों से लगातार एक ही चाल-हाल से निढ़ाल हुए यात्रीगणों में शारीरिक और मानसिक थकान आनी ही है। ऐसी स्थिति में यात्रियों की आपसी बातचीत चुप्पी की हद तक पहुँच चुकी है। उनमें, साथ के साथियों की अपेक्षा अपने अन्दर के ‘मैं’ से संवाद होने लगा है।

पैदल चलने की कई विशेषताओं में एक यह है कि आसान और सुविधाजनक पैदल यात्रा में सहयात्रियों से खूब बात होती है परन्तु दुर्गम रास्ते में अपने आप से ही बातों की कछैड़ी (कचहरी) लगी रहती है। लम्बे समय तक की ऐसी विकट यात्राओं में रास्तेे की एकरसता से भी ऊब कर यात्री चल रहे परिदृश्य से बाहर निकलना चाहता है। दुर्गमता में आशंकाओं से उपजे डर का ही ये सह प्रभाव है।

‘गल के अलावा हमारे साथ थे पक्षी, कव्वे, तितली, मकड़ी और चील। और थे सूरज, चाँद, तारे, आकाशगंगाएँ, बादल और कोहरा। और विचित्र पर मौलिक सपने। कभी-कभी लगता था जैसे हम किसी और ग्रह के अपरिचित वीराने में भटककर आ गये थे। मेरा मन कभी-कभी अपने प्रियजनों को धात लगाने को करता था कि अरे, हमें बर्फ़ की परियों के देश से निकाल ले जाओ!’ (पृष्ठ-123)

इस यात्रा में निर्जन जगहों में लम्बे समयान्तर तक दिनों और रातों के विभाजनहीन निपट अतंहीन एकान्त की उकताहट में सबको अपने अस्तित्व के ही विलीन होने की सिरहन भी चौंकाने भी लगी।

लेकिन, आगे की समय यात्रा में जान जाने की जकड़न से भी जूझना पड़ेगा ऐसा उन्होने सोचा ही न था।

कालिन्दीखाल (5948 मी.) दर्रे से राजखरक (4920 मी.) पहुँचने तक मौसम की विषमता ने यात्रियों को आने वाली दुश्वारियों का आभास करा दिया था।

शेखर लिखते हैं कि शुरुआती दौर में चारों ओर की सभी असज स्थितियों में भी प्रकृति के प्रति यात्री उदार भाव रखे हुए थे। अपने अंदर कहीं दुबक चुके अपने जोश को होश में लाने के लिए वे मदमस्त होकर गीतकार शैलेन्द्र का गीत गाते हैं-

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत पर य़कीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर
हज़ार वेश धर के आई, मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी, चली गई वो हार कर…..
और, इसी यकीन पर इन यात्रियों ठान ही लिया कि-
हम होंगे कालिन्दी पार आज के दिन
ओहो मन में है विश्वास
पूरा है विश्वास
देर शाम राजखरक पहुँच तो गए पर आने वाला कल का दिन उनके सामने काल बन कर आ ही गया-
अगली भोर से ही राजखरक में तेज होती जा रही बर्फवारी ने आगे का मुकाम और भी कठिन बना दिया। घने कोहरे में आस-पास न दिखता था और न साहस और न ही समय। आगे का रास्ता और वापसी का रास्ता दोनों भयावह थे। ऐसे में आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। और, जहाँ विकल्प न हो वहाँ संकल्प ही जीने और जीतने का आधार बनता है।

ये तय हुआ कि राजखरक (4920 मी.) से उस दिन के 16 किमी. दूर के पड़ाव अरावाताल (3920 मी.) में न रुककर उससे आगे के 15 किमी. दूर पड़ाव घासतोली (4920 मी.) में पहुँचने का लक्ष्य रहेगा। इस प्रकार यह 31 किमी. की विकट यात्रा थी। स्थिति की नज़ाकत को शेखर पाठक ने सैटेलाइट फ़ोन के जरिए तत्कालीन मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड, नृपसिंह नपलच्याल को बताया। और, अनुरोध किया कि आज के निर्धारित पड़ाव घासतोली से आईटीबीपी. के जवान उनकी ओर सहायता हेतु आयें। ताकि, रास्ते में कहीं पर भी मिलने पर उन्हें सुरक्षित घासतोली तक पहुँचाया जा सके।

‘…सबके चेहरों पर सावधानी थी। गंभीरता ज़्यादा और एक छिपा हुआ भय भी। लेकिन सभी आज के कठिन अभियान के लिए तैयार थे। तैयार न होने का विकल्प न था।…इतनी ठण्ड में मैंने भीतर से अपने को भीगा पाया। ज़िन्दगी में पहली बार अपने को हिमाँक और क्वथनांक के बीच खड़ा देखा। बाहर का हिमाँक और भीतर का क्वथनांक। यह तो अभी चेतन-अवचेतन तक चला जाने वाला था। (पृष्ठ-146-147)

‘ख़तरे सदा एकता और बराबरी का भाव पैदा करते हैं। हमारी उत्तराखण्डी, नेपाली, गुजराती या ऑस्ट्रियाई-स्पानी पहचान ग़याब हो गई। हम मनुष्य थे और सिर्फ़ मनुष्य। हम एक संगठित और सघन समूह का रूप लेने लगे थे। एक मानवमाला जो इस ख़तरे में चलने की लगातार कोशिश कर रही थी। परसों तक हममें दूरियाँ, शक, अविश्वास, ‘हम ट्रैकर, तुम सहयोगी’ जैसा भाव था। पथारोहण और पर्वतारोहण अभियानों में संकट के समय ही शेरपाओं और सहयोगियों के असली मायने समझ में आते रहे थे। आज़ हम सभी एक ही श्रेणी के यात्री हो गये थे। संकट भी अनेक बार तात्कालिक ही सही, बराबरी और सद्भाव लाता था। काश यह स्थाई भाव हो जाता।…..कैमरों को भी एकाएक हमारे इस व्यवहार का अन्दाज़ा नहीं हुआ। कैमरे आपस में बात करते रहे होंगे कि जब इस यात्रा का सर्वोत्तम क्षण आया और महान जल विभाजक धार आई तो एकाएक उनका इस्तेमाल रुक गया। एक बूढ़े और ऊँचाइयों में बार-बार गये कैमरे ने अन्य नयों को कारण बताया और धैर्य रखने को कहा कि आदमियों की ज़िन्दगी से हमारी ज़िन्दगी जुड़ी है।’ (पृष्ठ-148)

शेखर पाठक जानते थे कि ये ही वो क्षेत्र हैं जहाँ अनेकों शेरपाओं के साथ मैलोरी, इरविन, रौजर डुप्लां, निर्मल साह, गिल्बर्ट विग्नेस आदि कितने ही पर्वतारोही हिमालय के इन गलों, दर्रों शिखरों में चिर-निद्रां में सोये हैं। उनका मानना है कि प्रकृति बहुत ज़िम्मेदारी से हिम समाधि में गये इन मनुष्यों के शरीरों की हिफ़ाजत कर रही है। इसलिए उनका इन सभी समाधिस्थ पर्वतारोहियों को सलाम करने का मन भी है। इस मार्ग पर हुई विगत यात्राओं के मुक़ाबले वे अपनी इस यात्रा की असमय विपदा को कम आंकते हैं। पर अपने पर आई मुसीबत स्वाभाविक रूप में ज्यादा ही लगती है। अपने मन को समझाने के लिए चाहे और कुछ भी सोच लीजिए।

पिछले 24 घण्टे से लगातार गिरती बर्फ़ ने आगे रास्तों के निशान पूरी तरह ढ़क दिए थे। बर्फ़ का गिरना कम होता होता तो बारिश का कहर और घातक लगने लगता। लगातार चलने से आई थकान और एकाएक विषम परिस्थितियों के भय का माहौल था जरूर पर आगे चलने हिम्मत अभी सभी में बरकरार थी।

‘….साथियों ने परामर्श दिया कि सामान छोड़ दो और जान बचाओ। यह ‘जान बचाने’ की बात किसी के मुख से मैंने पहली बार सुनी थी। यह ऑस्ट्रियाई दल का सहयोगी था पर उसके द्वारा व्यक्त भय सबकी भावना और समग्र स्थिति को उजागर कर गया। जिन साथियों ने यह सुना वे अपने को परखने की कोशिश शायद करने लगे।’(पृष्ठ-167)

‘मौत हमारे आस-पास मँडरा रही थी। वह किसी को भी दबोच सकती थी। यहाँ आज़ उसी का राज था।…. शब्द गले तक आते थे और लार में मिलकर नीचे उतर जाते थे। एक ओर जीवन से वंचित होते नीतेश के द्वारा रचा गया हिमाँक मेरे भीतर उथल-पुथल मचाये था और दूसरी ओर बेचैनी, विवशता और विडम्बना भाव से मचलता मेरा चेतन-अवचेतन क्वथनांक को पार कर रहा था। यह हम सबके मानस के ध्वस्त होने जैसा था। हमारा एक साथी हमारे साथ न था।… हममें से कोई नीतेश नहीं होना चाहता था। हम नीतेश होने से बचना चाहते थे। हम ज़िन्दा रहना चाहते थे। पर नीतेश हमारे भीतर बैठा था। छिप सा गया था।…. नीतेश को मन ही मन अलविदा कहते हुए मुझे रौजर डुप्लां की कविता याद आई….
When I die in the mountains
O Rope Comrade
I write this testament for you
Go and tell my mother
I died happy… (पृष्ठ-172-174)

‘हमसे आगे जो थे वे शायद बहुत आगे निकल गये थे। पीछे जो थे, बहुत पीछे रह गये थे। पीछे देखते तो बढ़ता अंधकार दिखता था बस। नदी की आवाज़ अब लगता था जैसे बढ़ गई थी। जैसे उसके दाँत निकल आये हों और वह अपने शिकार ढूँढ़ रही हो। पता नहीं सिर्फ़ आक्रामक हुई नदी पर मैं इतना अविश्वास क्यों करने लगा था! हमारी चुप्पी नदी की आवाज़ को और बढ़ाती थी। हिमालय में किसी नदी को सुनना कितना अच्छा लगता रहा था। आज़ पहली बार यह आवाज़ नहीं सुहा रही थी। कितने निर्मम और निष्ठुर हो गये थे हम! या परिस्थिति ने हमें बना दिया था ऐसा अमानुष।
दूर कुछ टाॅर्चों की रोशनी दिखी। गुम हो गई। फिर क्षण भर को दिखी। फिर बिल्कुल नहीं दिखी। शायद वहाँ पर मोड़ होगा। शायद वहाँ से उतार होगा। पता नहीं, वहाँ पर क्या होगा?’(पृष्ठ-175)

दो दलों में 49 सदस्यों की यह यात्रा आगे के रास्ते की अनभिज्ञता में अब आपस में ही छितरा गई थी। अपना ही होश और जोश नहीं था तो अन्य साथियों की क्या सोचें। यात्रियों पर थकान और घबराहट में कौन ज्यादा प्रभावी है बताना मुश्किल था। अब राह चलते-चलते शेखर पाठक, प्रदीप पांडे, अनूप साह के साथ एक नया साथी विजय भी जुड़ गया था। एक बड़े से पत्थर के नीचे पनाह लिए इनको लगता था कि यह रात कभी खत्म नहीं होगी। उसका नित्य-प्रतिक्षण स्याह होता चेहरा उन्हें और बेचैन करता था।

शेपा (शेखर पाठक) के शब्दों में उनके ‘लाटा’ हो जाने की स्थिति थी। जैसे, डर, हिम्मत, आशंका जैसी भावनायें पथरा गई हों। ऐसे में, होश और बेहोशी की तन्द्रा में आये उचके सपने सबके दिवंगत होने के बाद की स्थितियों के लिए माहौल तैयार कर रहे थे।

पर इन यात्रियों के अवचेतन में कहीं जिन्दा रह पाने की बलवती इच्छा भी जीवंत कुलबुला रही होगी। जो इस आंतकी समय से बचाने के लिए उनको बचपन की अन्ताक्षरियों के खेल में ले गई। बचपन माने आनंद से भरपूर बेखौफ़ समय और स्थितियाँ। बचपन की नादानियों में सीखी गई इन अन्ताक्षरियों के खेल ने इन चारों सयानों पर उस आतंकी रात के निष्ठुरपने को उनमें हावी होने से बचा लिया।

भोर होने को हुई कि नीचे नदी किनारे ओर टाॅर्च की रोशनियाँ इनके लिए नव जीवन का संदेश लिए आती हुई दिखाई देने लगी। इन सब यात्रियों के लिए उस समय दो नेपाली साथियों को अपनी ओर आते देखना ज़िन्दगी की जीत पर यक़ीन करना था और कुछ नहीं। उनका ‘फिगर नि करन्या’ कहना बहुत कुछ बीती रात के बारे में कह गया।

आखिरकार, घासतोली से बचाव के आये आई.टी.बी.पी के जवानों ने इस पथारोहण में शामिल कुल 49 सदस्यों में से 43 सदस्यों को बचा लिया। दुःखद बात यह थी कि इसके 6 सदस्यों को जीने का ये अन्तिम मौका नहीं मिल पाया।

‘पहली बार किसी यात्रा के अन्त में हम रो रहे थे’ प्रो. शेखर पाठक की यह घुमक्कड़ी किताब इस वाक्य पर विराम लेती है।

शब्द-यात्रा के इस बिन्दु पर पहुँचा किताब का पाठक भी सहज नहीं रह पाता है। और, इसी असहजता को लिए उसका चिन्तन-मनन किताब में उठाये गये सवालों और समाधानों के प्रति आरम्भ होता है।

‘गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा-2008’ की उक्त यात्रा आरोप-प्रत्यारोपों के साथ लम्बे समय तक चर्चा में रही। इस यात्रा-पुस्तक के परिशिष्ट में तमाम सहायक सामाग्रियों के साथ उक्त यात्रा के आलोक में हिमालय क्षेत्र में साहसिक यात्राओं के दृष्टिगत अनूप साह, शेखर पाठक और प्रदीप पांडे का तैयार किया गया एक स्थिति पत्रक शामिल है। जो कि 2 नवम्बर, 2008 को उत्तराखण्ड शासन को प्रेषित किया गया था। इसमें उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इनर परिमिट जारी में सावधानी, सम्बधित प्रशासनिक संस्थाओं का आपसी समन्वयन, पोर्टरों की गहन मेडिकल जाँच, समुचित संसाधन और सम्मानजनक मानदेय दिए जाने, उनका यात्रा अवधि में अनिवार्य जीवन बीमा कराये जाने (उनके विदेशी होने पर भी), कठिन यात्रा मार्ग पर शैल्टर्ड शैड बनाने, प्रामाणिक सूचना साहित्य तैयार करने, यात्रा समय निर्धारित करने, एवं विदेशियों पर्यटकों से संवाद के लिए आवश्यक सम्प्रेषण भाषा जानकार की व्यवस्था किए जाने के सुझाव शामिल थे।

विडम्बना यह है कि, उक्त सुझावों पर क्या अमल हुआ यह आज तक सार्वजनिक नहीं है।

यह किताब इंगित करती है कि, उच्च हिमालय पर्यटकों, पथारोहियों और पर्वतारोहियों के लिए रहस्य और रोमांच की होती हैं परन्तु यहाँ जीवकोपार्जन के अवसर खोजने वाले व्यक्तियों के लिए ये अर्थ उपार्जन का साधन है। वास्तविकता यह है कि वे प्रकृत्ति के इस रहस्य और रोमांच के भोगी नहीं वरन भुक्तभोगी होते हैं। और, ऐसी स्थितियाँ प्राकृतिक से कहीं अधिक व्यवस्थाजन्य होती है।

उक्त यात्रा में 6 सहयोगियों की मौत इसी सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्थाजन्य घोर अमानवीयता का दुखःद परिणाम है। हर बार पर्वतारोहियों के अदम्य साहस की तो चर्चा होती है, परन्तु इनके सहयोगियों और शेरपाओं की कठिन जीवनीय हालातों की चर्चा कहीं सुनाई नहीं देती है।

‘रास्ते भर सड़क में कार्यरत सीमा सड़क संगठन के श्रमिक मिले। ज़्यादातर रांची (झारखण्ड) के थे। अनेक श्रमिक सपरिवार थे। उनके बच्चे इस कठिन जलवायु में यहाँ रहने और अपने माँ-पिता को मदद करने को विवश थे। हम पथारोहियों और बद्रीनाथ के तीर्थयात्रियों के पुण्य कार्यों की सूची में इन बच्चों की मदद करना तो था ही नहीं। मन उन्हें देखकर पसीज गया।’ ’(पृष्ठ-201)

हमारे समाज और हमारी सरकार के नीति-नियताओं का मन भी ये देखकर ऐसे ही पसीजता होगा। फ़िर क्यों नहीं, इनके लिए समुचित सुविधायें सामाजिक व्यवस्था में साकार हो पाती हैं?

घुमक्कड़ी किताब- हिमांक और क्वथनांक के बीच
(गंगोत्री-कालिन्दीखाल-बद्रीनाथ यात्रा में निर्जन सौन्दर्य और मौत से मुलाक़ात)
लेखक- शेखर पाठक
प्रथम संस्करण- मई, 2024
पृष्ठ- 252, मूल्य- ₹ 425
प्रकाशक- नवारुण (मोबाइल नंबर-9811577426), ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश
‘हिमांक और क्वथनांक के बीच’ पुस्तक अमेजान में उपलब्ध है।

लेखक संपर्क –

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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