माई नि मेरिये…सिड्डू खाणा जरूर
@Manu Panwar
सिड्डू हिमाचल प्रदेश के सबसे लोकप्रिय पकवानों में से है। इनमें से भी अगर कुल्लुवी सिड्डू हो तो अहा ! फिर तो कहना ही क्या !!! कुल्लुवी सिड्डू को हिमाचली सिड्डू में इलीट अर्थात् अभिजात्य का दर्जा हासिल है। इसकी वजह है इसे बनाने का तरीका और इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री। ये बात हमें तब पता चली जब हम पहुंचे कुल्लू में अपने परिचित सूद परिवार के घर। मंडी के बाद अपना अगला ठिकाना कुल्लू ही था।
जिन्हें पता न हो, उन्हें बता दूं कि हिमाचल प्रदेश में सूद जो हैं, वो बिजनेस कम्यूनिटी है। मल्लब व्यापार इनके खून में है। ये लोग मूल रूप से कांगड़ा जिले के परागपुर से हैं लेकिन पूरे हिमाचल में फैले हुए हैं और कांगड़ा से लेकर शिमला तक बिजनेस में खासा नाम और दाम दोनों कमा रहे हैं।
कुल्लू में हमारी मेजबान थीं हमारी परिचित श्वेता सूद। वैसे तो हिमाचली डिश सिड्डू का स्वाद अपने मित्र Nishant Dhiman के साथ एकाध बार किसी हिमाचली उत्सव में चख चुका था, लेकिन कुल्लवी सिड्डू पहली बार कुल्लू में श्वेता सूद के परिजनों के सौजन्य से प्राप्त हुआ।
कुल्लू के सिड्डू की बात ही निराली है। इसकी जो स्टफिंग होती है वो ड्राई फ्रूट्स और खसखस के मिश्रण से तैयार की जाती है। हमारे मेजबान सूद परिवार ने अखरोट, खसखस, बादाम की गिरी, मूंगफली की गिरी के मिश्रण के साथ हमारे लिए सिड्डू तैयार किया। सबसे खास बात ये है कि सिड्डू स्टीम्ड फूड है। मतलब इसे स्टीमर में रखकर स्टीम किया जाता है। मतलब भाप से पकाया जाता है।
कुल्लुवी सिड्डू का टेस्ट जितना बेमिसाल है, इसे पकाने में उतनी ही ज्यादा मेहनत, ज्यादा समय और ज्यादा धैर्य की जरूरत होती है। हां, लेकिन खाते वक्त धैर्य जवाब दे जाता है। ऐसा लगता है कि बस खाते जाओ, खाते जाओ। हम भी सूद परिवार के हाथों से बना इतना सिड्डू दाब गए कि कोई गिनती ही नहीं है।
असल में सिड्डू बहुत हल्का भोजन है। आपको इसे खाकर भारीपन महसूस नहीं होता। सिड्डू को खाने का तरीका भी बड़ा दिलचस्प है। घर में तैयार घी में जैसे ही आप सिड्डू को डुबोते हैं और फिर उसे अपनी जिह्वा पर धरते हैं तो उसका स्वाद खाने वाले के लिए ‘गूंगे का गुड़’ मुहावरे की तरह हो जाता है।

सिड्डू और घी का नाता मेड फॉर ईच अदर टाइप है। हिमाचल के प्रसिद्ध लोकगायक किशन सिंह सहगल ने तो इसे अपने एक लोकप्रिय सिरमौरी गीत में बिम्ब की तरह इस्तेमाल किया है, जिसकी पंक्तियां मुझे मित्र और बड़े भाई जैसे Mohan Sahil के सौजन्य से मिली हैं।
‘नाचना उछा छुबीये
बाँठने बोलो तेरे मुजरे आए
मुजरे दा बोलो पावणा ढोबो
ढोबो सिड़ो साथे घिओ।’
इसका हिंदी में तर्जुमा कुछ इस तरह से हुआ- “हम तुम्हारे नृत्य आयोजन में आए है। हमें उन्मुक्त होकर नाचना है। जैसे सिड्डू के साथ घी जंचता है, वैसे ही नृत्य आयोजन में मेहमान जँचता है।’
सिड्डू बेहद लोकप्रिय पकवान तो है ही, उदार और लोकतांत्रिक भी है। उसमें ‘अहं ब्रह्मास्मि’ वाला भाव नहीं है। वह खुद भी कई सामग्रियों के गठजोड़ से बना है और उसे अपने होने का अहसास कराने के लिए देसी घी से लेकर टमाटर और हरे धनिये की चटनी की जरूरत पड़ती है। इनके साथ मिलकर वो स्वाद का ऐसा तगड़ा गठबंधन तैयार करता है कि बस पूछिए मत !
हम खुशनसीब रहे कि सूद परिवार ने इतना समय खपाकर और बड़े स्नेह से ये सब तैयार किया। वरना तो सिड्डू बनाने की प्रक्रिया काफी टाइम टेकिंग है। बिना छिलके वाली उड़द की दाल को अच्छे से धोकर करीब दो घंटे तक भिगोये रखना। फिर आटा गूंथना। खमीर लगाना। अखरोट और ड्राई फ्रूट्स पीसना। जब आटा फूल जाए तब इसकी स्टफिंग करना। सिड्डू को स्टीम करना। ये सब एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है।
तो अगर हिमाचल प्रदेश के लोक जीवन को देखना-जानना-समझना चाहते हों तो पहले सिड्डू से मिल लीजिए। मज़ा आ जाएगा।
लेखक : वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार है







