बीसवीं सदी की वह रात
@Manorama nautiyal

सुदूर हिमालय के मानसखण्ड में एक घना वन था। देवदार और बाँज के कृष्णहरित वृक्षों से सुसज्जित वन की सुषमा देखते ही बनती थी।
वह बीसवीं सदी की एक चमत्कारी रात थी। एक सिद्ध बाबा के स्वप्न में देवता प्रकट हुए और उन्होंने बाबा से मानसखण्ड के घने वन के बीच घास-फूस का एक आश्रम बनाने की इच्छा प्रकट की।

बाबा के हृदय में द्वन्द्व प्रारंभ हो गया- वन के बीच आश्रम कैसे बनेगा? हरे-भरे वृक्षों की हत्या का पाप लगेगा। हे प्रभु, इस अनिष्ट के लिए मुझ निरीह को ही क्यूँ चुना?
देवताओं की इच्छा के सम्मुख नतमस्तक बाबा अनमने मन से वन की ओर चल दिए। किंतु, यह क्या! वन के मध्य में बड़ा सा खाली तप्पड़! सपाट और समतल।
इस दिव्य दृश्य को देखकर बाबा अचंभित हो गए। नेत्रों से हर्ष के अश्रु प्रवाहित होने लगे-

आपकी महिमा अपारम्पार है भगवन्! वे वृक्ष भी महान अंतर्यामी थे जिन्होंने प्रभुसेवा में आत्बलिदान दे दिया। यह वन भी पूजनीय है जिसने आश्रम के लिए अपना हृदय खोल दिया, सीना चीर दिया। अहा!’
वृक्षों ने स्वयं ही लोप होकर बाबा को वृक्षहत्या के जघन्य पाप से बचा लिया।

इसके उपरांत बाबा ने उस तप्पड़ में एक छोटा सा घास-फूस का आश्रम बनाया।
तब से लेकर आज तक आश्रम में अंग्रेजी भारतीय, भारतीय अंग्रेज, उत्तराखण्डी राजे-महाराजे, काकचेष्टु-बकोध्यानी विद्यार्थी, कामसाधक, जामयोगी इत्यादि समय-समय पर वानप्रस्थ का अनुभव प्राप्त करने हेतु प्रवास करते रहते हैं।

सघन वन के क्रोड में स्थित सैकड़ों देवदार-बाँज के त्याग का प्रतीक यह घासफूस निर्मित आश्रम पर्यावरणविद, वृक्षमानव, मानवविज्ञानी, पशु-पक्षी रक्षक व वनप्रेमियों के लिए वैसे ही चरम भंगश्रद्धा का केंद्र है जैसे रिकॉर्डप्रेमी, रीलाभिलाषी, सुट्टाभक्तों के लिए श्रीकेदारनाथ जी।
(नोट-कथा काल्पनिक, चित्र प्रतीकात्मक हैं और इंटरनेट से लिए गए हैं)







