Saturday, March 7, 2026
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कपड़े सिलते पिरमु भाईजी।

Story pirmu bhaiji
Story pirmu bhaiji

By – Manorama nautiyal

दादाजी ऋषिकेश से कपड़ा लेकर आते और गाँव में पिर्मु भैजी से सिलवाते। हम बच्चों की झगुली, दादी और माँजी के कुर्ता-सदरी, रजाई और तकियों के खोल, सब पिर्मु भैजी ही सिलते। बुढ़ी और पुफु को भी दादाजी धोती-टालखी के साथ कुर्ता-सदरी सिलवाकर ही देते।
कोई विशेष पैंट-कमीज होती तो ही थत्यूड़ के टेलरों के पास जाती अन्यथा पिर्मु भैजी ही हमारे रजिस्टर्ड फैमिली टेलर मास्टर थे।
सिलाई में दादाजी उन्हें उनकी इच्छानुसार अनाज और पैसे देते।

कपड़े पिर्मु भैजी बहुत बढ़िया सीते लेकिन वे हर कपड़े से कुछ कपड़ा बचाकर रख लेते अपने लिए। तो जितने कपड़े में तीन खोल सिलने थे उतने में दो ही सिलते। कभी कुर्ते का कपड़ा कम पड़ जाता तो कभी सदरी का। दादाजी उन्हें झिड़कते तो वो हँस देते।

एक बार दादाजी ने तरकीब निकाली जिससे पिर्मु भैजी को कपड़ा बचाकर अलग रखने का मौका ही न मिले। सिलाई मशीन सहित पिर्मु भैजी को घर पर ही बुला लिया:

“आज तू खाना भी यहीं खाएगा और यहीं बैठकर कपड़े सिलेगा।”

दादाजी मन ही मन अपनी ट्रिक पर खुश हो रहे थे।
पिर्मु भैजी दादाजी से ज्यादा खुश! हर आधा घण्टे में चाय मंगवाते, घाम सेंकते और मजे से कपड़े सीते।

शाम होने से पहले सब काम निपटाकर वे अपनी मशीन उठाकर घर चल दिये।

दो दिन बाद पिर्मु भैजी की ब्वारी किसी काम से घर आयीं। उनके कुर्ते के आगे वाला पल्ला ठीक उसी कुर्ते जैसा था जो भैजी ने दादी के लिए सिला था।

दादाजी देखकर दंग रह गये। सारा दिन तो मैं उसके साथ बैठा रहा। ये कारस्तानी कब हुई!!

शाम को मास्टर जी हँसते हुए घर की फैड़ियां चढ़ रहे थे:

“काका! ये तो आप भूल जाओ कि औजी कपड़े सिलेगा और अपने लिए नहीं रखेगा। मैंने जानबूझकर वो कपड़ा ‘उसके’ कुर्ते में आगे लगाया ताकि आपकी नजर पड़ जाये।

जबरि तुम चाइ बणाण वर बीड़ी कु बण्डल लेण भितर गये…!”

(चित्र में पिर्मु भैजी के सिले हुए कुर्ता-सदरी पहने माँजी, कोथी में बाल Vimal )

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