Friday, March 6, 2026

‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा’-भाग-06
स्यूँसी से सतपुली वाया-सन्तूधार
25 अप्रैल, 2025


‘‘मैं आईटीआई करने बाद काम की तलाश में कुछ साल दिल्ली-बम्बई खूब घूमा। परिवार की ऐसी जिम्मेदारियाँ थी कि वापस घर आना पड़ा। अब तो दशकों पुरानी बात है।…रास्ते में घास ज्यादा हो गई है, गड्डों में पानी भी है, साँप बहुत दिखते हैं इधर….आप चिन्ता न करें आपकी बस ठीक सवा पांच बजे मेरी दुकान के सामने से गुजरती है।’’ दिनेश जुयाल बोलते हुए लाठी से पगडण्डी के दोनों ओर ठक-ठका भी रहे हैं। अपनी मोबाइल की लाइट को आगे-पीछे ही नहीं दायें-बायें वो बारी-बारी से चमकाते हैं कि कहीं कोई कुछ हो उसका पता चल जाए।

सुबह के पौने पाँच बजे हैं। अभी हल्का अंधेरा ही है। स्यूँसी गाँव से खेतों के बीच की पगडण्डी से मैं और दिनेश जुयाल स्यूँसी बाजार की ओर आ रहे हैं। दिनेश रोज प्रातः इसी समय और रास्ते से अपने टी स्टाल को आते हैं।

आज मुझे ‘वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं से ‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा’ के विविध आयामों पर बातचीत करने भरसार पहुँचना है।

दिनेश ने दुकान खोलते ही गैस जलाई और देखते ही देखते एक गिलास चाय मुझे तुरंत पेश कर पानी से भरी बड़ी केतली उस पर रखकर आंच धीमी कर दी है। ‘‘आप यहां पर बैठो मैं मंदिर में दिया-बत्ती करके आता हूं।‘’ कहकर तेजी से सड़क पार कर गये। ये इतनी जल्दी हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। वैसे, रोज का कार्य मशीनी गति से ही होता है।

चाय पीते हुए मेरी नज़र नैनीडांडा की सड़क की ओर ही है। दिनेश के मन्दिर से अपनी दुकान पर आते ही पौड़ी को जाने वाली वाली बस दिखती है। बस की सीट पर बैठते ही मैं समय देखता हूं। ठीक सवा पाँच हो रहा है। एक हल्की मुस्कराहट दिनेश जुयाल के लिए स्वतः ही आ गई है।

सुबह की बस से स्यूँसी, बैजरों, सुखई, जिवंई, गौणीछेड़ा, गरसारी, भीड़ा, गंगाऊ, मजगांव, थलीसैण के सड़क किनारे बोर्ड, दुकान और घर जैसे एकान्तवास में हो। थलीसैण से 10 किमी. चढ़ाई की सड़क के बाद कन्यूर में पूरी खिली हुई सुबह दिखती है। कैन्यूर गाँव कत्यूरी राजाओं का प्राचीन गाँव माना जाता है। आज भी भरा-पूरा और जीवन्त गाँव।

चौंरीखाल में सवारियों के सुबह के नाश्ते के लिए बस रुकी है। समतल और ऊँची धार पर सुबह नाश्ता, दोपहर खाना और रात खाना-पीना और रहने की व्यवस्था वाली पाँच दुकानें हैं। सामने हिमालय की कतारबद्ध सावधान की मुद्रा में बंदरपूंछ, गंगोत्री, त्रिशूल, धौलागिरी, चौखम्भा, नंदादेवी, नंदाखाट, केदारनाथ के हिम शिखर हैं। सामने की दीवा डाँडे पर इस इलाके की इष्टदेवी देवा देवी का मंदिर कुछ-कुछ दिखता है। दीवा देवी का एक मंदिर चौंरीखाल में भी है।

चौंरीखाल, के बाद भरसार विश्वविद्यालय में मैं पहुँचा हूं। चारों ओर से घने जंगलों से घिरे भरसार की नई पहचान औद्योनिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय से होने लगी है। बताते हैं कि बिट्रिशकाल में यह संपूर्ण क्षेत्र मैक मिलन नाम के अग्रेंज की निजी सम्पत्ति थी। सरल प्रवृत्ति के मैक मोहन को स्थानीय लोग ‘जोगी सहाब’ संबोधित करते थे। उन्होने यहाँ सेब, अखरोट, आडू, नाशपाती, प्लम, आलू और विविध सब्जियों का बगीचा विकसित किया। उस काल में यह एशिया के सर्वश्रेष्ठ बगीचों में शमिल था। सन् 1951 में यह उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग, उत्तर प्रदेश को सौंपा गया था। वर्ष-2001 में इसे पंतनगर विश्वविद्यालय का औद्यानिक महाविद्यालय बनाया गया। और, वर्ष- 2011 में यहां वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उत्तराखण्ड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार की स्थापना की गई। वर्तमान में, भरसार, पौड़ी (गढ़वाल) और रानीचौंरी, टिहरी (गढ़वाल) इसके दो महाविद्यालय परिसर हैं। इस विश्वविद्यालय में देश भर के छात्र-छात्रायें औद्योनिकी एवं वानिकी की उच्च षिक्षा ले रहे हैं।

विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में कार्यरत प्रेम सिंह बताते हैं कि ‘‘भरसार शब्द का स्थानीय अर्थ धन-धान्य और नैसर्गिक सुन्दरता से भरपूर क्षेत्र से है। गढ़वाली भाषा में ‘सार’ खेती-बाड़ी वाले हिस्से को कहते हैं। वो क्षेत्र जो वर्ष भर फसलों से भरा रहता है उसे ‘भरसार’ कहा गया। भरसार क्षेत्र (समुद्रतल से ऊँचाई 1800 से 2300 मीटर) 175 हेक्टयर में फैला है। जिसमें, 104 हैक्टयर में घना जंगल और 71 हेक्टयर में बागवानी क्षेत्र शामिल है।’’

प्रेम सिंह जानकारी देते हैं कि ‘‘नवम्बर से फरवरी तक अधिकांशतया भरसार क्षेत्र औसतन 1 से 2 फीट तक बर्फ से ढ़का रहता है। मण्डुआ, धान, गेहूँ, गहथ, माल्टा, संतरा, सेब, नाशपाती, खुमानी, अखरोट, बेर, कीवी, प्लम, खुमानी, हेज़लनट, आलू यहाँ की मुख्य पैदावार हैं। पूरे क्षेत्र में अन्य जंगली जानवरों के साथ रिक्ख (भालू), सुअर, बारहसिंगा और बाघ प्रमुखतया विचरण करते हैं।’’

प्रेम सिंह का मानना है कि ‘‘इस विश्वविद्यालय के यहाँ होने से स्थानीय जनता में उद्यान एवं वानकी के प्रति नवजागृति आयी है तो युवाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के नये अवसर उपलब्ध हुये हैं। साथ ही, स्थानीय क्षेत्र के लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है। नतीजन, इस क्षेत्र से पलायन की समस्या किसी हद कम हुई है।’’

प्रेमसिंह ने हाथ के इशारे से दायें ओर के पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी में घने जंगल से घिरे स्थल की ओर इशारा करते हुये बताया कि ‘‘वहाँ बूढ़ा भरसार मंदिर है। यहाँ से 4 किमी. पणजीखाल और वहाँ से 3 किमी. की दूरी पर बूढ़ा भरसार है। पूरा रास्ता है तो चढ़ाई का पर तीखी चढ़ाई नहीं है। लेकिन, पानी बहुत कम जगहों पर है और जंगल बेहद घना और बीहड़ है। वहाँ जाने के कई रास्ते दिखाई देते हैं। इसलिए भटकने का खतरा हर दम रहता है। कोहरा, बारिश, और बर्फ में तो जाना बेहद कठिन है। वहाँ जंगली जानवरों का खतरा हर कदम पर है।’’

छात्र-छात्राओं के साथ सांय 3 से 5 बजे तक का 2 घण्टे का संवाद बहुत रोचक एवं सार्थक रहा है। देश के विविध अंचलों से आये इन युवाओं का हिमालय और उसके पारिस्थिकीय तंत्र को जानने और समझने तीव्र उत्कंठा है। परन्तु, अध्ययन के दौरान ऐसे अवसर उन्हें नहीं मिल पाते हैं। उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण वे यहाँ चार साल रहने बाद भी हिमालय और हिमालयी जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं प्राप्त कर पाते हैं। यह विश्वविद्यालय चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर है। परन्तु, लगभग सभी युवाओं ने गढ़वाली जी के सामान्य परिचय के बारे में भी अनभिज्ञता व्यक्त की है। यह शोचनीय है।

बेहतर होगा कि विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली से संबंधित प्रकाशित साहित्य अवश्य उपलब्ध कराया जाय। साथ ही, इस परिसर के प्रमुख स्थल पर गढ़वाली जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में संक्षिप्त विवरण पट/बोर्ड लगाया जाय। जिसे यहां अध्ययनरत विद्यार्थी, शिक्षक, अभिकर्मी और विभिन्न अवसरों पर आने-जाने वाले संदर्भ व्यक्ति चन्द्रसिंह गढ़वाली जी पर एक संक्षिप्त प्रामाणिक जानकारी को जान सके।

युवाओं ने दूधातोली, राठ और नयार नदी के केन्द्र में इस यात्रा के विविध पक्षों को जानने में बहुत अभिरुचि दिखाई है। उचित समय पर इस यात्रा की उनको जानकारी होती तो कुछ युवा इस यात्रा से जरूर जुड़ते। लेकिन आगामी यात्राओं में कई युवाओं ने भाग लेने की बाद कही है। विशेषकर अस्कोट-आराकोट अभियान-2034 में कई युवाओं ने भाग लेने वायदा किया है।

26 अप्रैल, 2025
भरसार, नौठा, चिफलघाट-(1102 मी.), साँकरसैण के उपरान्त पैठाणी (1272 मी.) पहुँचा हूं। राठ महाविद्यालय में आयोजित गोष्ठी में उपस्थित छात्र-छात्राओं के सम्मुख पश्चिमी नयार नदी अध्ययन यात्रा दल के सभी सदस्यों ने अपने विगत पाँच दिनों के रोचक अनुभव सुनाये। यह उल्लेखनीय है कि यात्रा में राठ महाविद्यालय परिवार के पाँच सदस्य इस यात्रा में सक्रियता से शामिल हैं। युवा छात्र कुलदीप, यश और सागर ने नयार नदी के घटते जल स्तर और उसमें बढ़ते खनन कार्यों को पूरे तथ्यों के साथ प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया। जंगलों में बढ़ते चीड़ और नये मिश्रित वनों के न पनपने के कारणों को स्पष्ट किया। इस यात्रा में ग्रामीणों और विशेषकर पशुचारकों की कार्य स्थितियों और समस्याओं को उन्होने सबके सामने क्रमबद्धता से रखा। डाॅ.देवकृष्ण थपलियाल और डाॅ. बीरेन्द्र चंद बदलते जलुवायु परिवर्तन और नयार नदी की सहायक जलधाराओं की स्थिति और स्तर को उजागर किया। प्रधानाचार्य डाॅ. जीतेन्द्र नेगी ने इस अध्ययन इस यात्रा को भविष्य के नीति-निर्धारण में महत्वपूर्ण और उपयोगी माना।

आज की आगे की यात्रा पैठाणी, सांकरसैण, चिपलघाट, कलगड्डी, पाबौ, खिर्कू के बाद मासों (मवालस्यूँ) में रात्रि विश्राम की है।

कलगड्डी से आगे पश्चिमी नयार के पार के जंगल में आग लगी है। जंगलों में आग लगने की ऐसी घटनायें इस यात्रा के दौरान जगह-जगह पर हमें दिखाई दे रही हैं। अप्रैल का ही महीना है। अभी से वनाग्नि की घटनायें हो रही हैं तो मई-जून में तो ये घटनायें विकराल रूप ले लेंगी।

वन विभाग की गाड़ी भी सड़क किनारे खड़ी है। उस गाडी के बोनट पर वनाग्नि से बचाने का बैनर लिपटाया गया है। सड़क किनारे से पांच अभिकर्मी हाथ में लाठी लिए खड़े हैं। ये सब निरीह आखों से नदी पार की भड़कती आग को देखते जा रहे हैं। उनकी आपस में भी कोई बात नहीं हो रही है। उनके लिए यह दृश्य आम है। उन सबको मालूम है कि पश्चिमी नयार नदी पार करके सामने के जंगल में तुरंत नहीं जाया जा सकता है। और, अगर चले भी गए तो वहाँ जाकर वे कैसे इन आग की लपटों को बुझा सकते हैं? उनके पास इस हेतु कोई साधन भी नहीं हैं।

यश तिवारी का कहना है कि दूधातोली के ऊँचे भागों के जंगलों में वनों की रक्षा के लिए ग्रामीण सचेत हैं। उन्होने स्वयं जंगलों का पालन-पोषण किया है। तभी वहां घना और मिश्रित जंगल हैं। उनका मुख्य पेशा पशुपालन है, इसलिए वे वनों की अहमियत जानते हैं। उसकी रक्षा के लिए हर समय तैयार भी रहते हैं। लेकिन इस जंगली आग के नजदीकी दायरे के लोग पूर्णतया उदासीन लग रहे हैं। वे प्रयास करें तो कुछ तो आग पर काबू पाया जा सकता है।

‘‘हो सकता है, यह आग गाँव के लोगों ने जानबूझ कर लगाई हो। जिससे बाद में अच्छी घास पनप सके।’’ सागर बिष्ट अपनी बात कहता है।

‘‘हो नहीं, पक्का गाँव के लोगों ने ही यह आग अच्छी घास के लालच में लगाई है। पर वे नहीं जानते कि उन्होने कितना ज्यादा वानस्पतिक और जीव-जन्तुओं का नुकसान कर दिया है। जिसकी भरपाई करना कठिन होता है।’’ यश तुरंत कहता है।

यात्रा साथी कुलदीप के अनुसार ये बात सच है कि उच्च हिमालय के लोग अपने वनों को बचाने और विकसित करने के प्रति मध्य हिमालयी लोगों से ज्यादा जागरूक हैं। अपने परम्परागत हक-हकूकों के वनों को हासिल करने के लिए वे अन्य गाँवों से भी संघर्ष मोल ले लेते हैं। कुलदीप बताता है कि ‘‘लगभग 25 साल पहले हमारे गांव कुण्डील और नजदीकी कठूड गाँव के साथ जंगल का विवाद हुआ था। तब बार-बार के इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए दोनों गाँवों के सयानों में तय हुआ कि एक-दूसरे गांव के जानवर लड़ायें जाएं। जिस गाँव का जानवर जीत जायेगा उसी गाँव का ये जंगल हो जायेगा। इस लड़ाई में कठूड गाँव का बागी और कुण्डील गांव का खाडू था। दोनों को लड़ाया गया और आश्चर्यजनक बात यह हुई कि कुण्डील गांव का खाडू जीत गया। इस कारण तय शर्त के अनुसार वो जंगल कुण्डील गांव का हो गया और कठूड गाँव को अपने जंगल के हक से हाथ धोना पड़ा। फिर हमारे गाँव ने उस जंगल में नई पौंधों को पनपाया और उनकी खूब देख-रेख की आज वह हमारे गाँव की सारी जरूरतों के लिए प्रर्याप्त है।’’

सागर बिष्ट, यश तिवारी और कुलदीप सिंह राठ महाविद्यालय, पैठाणी के छात्र हैं। परन्तु, इनका परिचय इतना भर नहीं है। मेरे लिए इस यात्रा में इन युवाओं के साथ दिन-रात लगातार चलने और रहने का यह अवसर अपने युवापन को फिर से जीने के आनंद को पाना है। सच तो यह है कि इस यात्रा की जीवंतता के केन्द्र बिन्दु ये ही युवा रहे हैं।

देर शाम मासों गांव (मवालस्यूं) में पद्मश्री यशवन्त सिंह कठौच के घर पहुंचे हैं। बुजुर्ग यशवन्त सिंह कठौच 92 वर्ष के हैं। उत्तराखण्ड के इतिहास लेखन के वे शीर्ष व्यक्तित्व हैं। हम सब यात्री साथियों के उनके घर आने से उनकी खुशी देखने लायक हैं। मित्र कैलाश थपलियाल से उनके ही गाँव मासों में मुलाकात होती है।

27 अप्रैल, 2025
‘‘चौंदकोट की पट्टी मवालस्यूं का सबसे उत्तरी गाँव है मासों- जो गहरे गर्त में बहती पश्चिमी नयार नदी के बायें किनारे पर बसा है। इसकी उत्तर दिशा में मसेटा मासों तथा दक्षिण में बुडोली, ढुकण्डी सहित सासों पड़ोसी गाँव हैं। पूर्व दिशा में, कुछ ऊंचाई पर घुड़दौड़स्यूं के पांग, थापली, किमखोली आदि गाँव बसे हैं। दोनों मासों के ‘सैण’ हजारों-लाखों वर्ष पूर्व पश्चिमी नयार द्वारा निर्मित चबूतरे हैं जिन्हें भूगोल की शब्दावली में ‘वेदिका’ कहते हैं। इसी कारण, सैण के नीचे नदी के गोल-मटोल गंगलोड़े भरे हैं, जिसके ऊपर कालान्तर में उपजाऊ चिकनी मृत्तिका बिछ गयी है।’’

उक्त विवरण डाॅ. यशवन्त सिंह कठोच की पुस्तक ‘गढ़वाल का एक गांव-मासों’ की प्रारम्भिक पक्तियां हैं। कठोच जी ने आज प्रातः ही सस्नेह यह पुस्तक भेंट की है।

सुबह की बातचीत में कठोच जी बताते हैं कि मासों (867 मी.) प्राचीनकाल में बद्री-केदार यात्रा मार्ग का प्रमुख पड़ाव था। कोटद्वार-कण्व ऋषि आश्रम से आने वाले यात्री मासों से भी यात्रा करते थे। इस गाँव से विभिन्न क्षेत्रों में ख्यातिप्राप्त व्यक्तित्व हुये हैं, जिन्होनेे देश-दुनिया में महत्वपूर्ण कार्य किये थे। परन्तु, अधिकांश अपने गाँव मासों के विकास में सार्थक योगदान नहीं दे पाये। यह विडम्बना उत्तराखण्ड के सभी पहाड़ी गाँवों की रही है। जबकि, गाँव में ही निवास करने वाले उद्यमीय ग्रामीणों ने यहां की जमीन को धन-धान्य से परिपूर्ण किया था। लगभग 8 किमी दूर पिनगड से पानी की कूल लाकर मासों के सम्पूर्ण सैण को सिंचित कर दिया था। आज भलेे ही लोग कृषि कार्य से विलग हो रहें हैं परन्तु कुछ ही दशकों पहले यह गाँव अपनी जरूरतों को की पूर्ति गाँव के उपलब्ध संसाधनोें से कर लेता था।

सभी यात्रा साथी पदमश्री डाॅ. यशवन्त सिंह कठोच के सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान एवं सेवाओं के लिए ‘पहाड़’ की ओर से ‘यायावर’ सम्मान उन्हें प्रदान करते हैं। उनके घर का आतिथ्य ग्रहण करना सभी यात्रा साथियों के लिए खुशनुमा यादगार है।

मासों, साँसों, किर्खू गाँव के बाद राजीव नवोदय विद्यालय, संतूधार के विद्यार्थियों से संवाद करना बहुत सार्थक रहा। बच्चों ने इस अध्ययन यात्रा से हटकर कई अन्य विषयों पर रोचक प्रश्न पूछे। अपने परिवेश को जानने और समझने की उनकी जिज्ञासू प्रवृत्ति के भविष्य में सकारात्मक परिणाम आयेंगे।

संतूधार से जन-संपर्क करते हुए ज्वालपादेवी पहुँचे हैं। पश्चिमी नयार के दांये तट पर ज्वालपा देवी का मन्दिर है। इस क्षेत्र का यह प्रसिद्ध मन्दिर होने से यहां हर समय श्रृद्धालुओं का आना-जाना रहता है। ज्वालापादेवी में संचालित संस्कृत महाविद्यालय के छात्रों से इस यात्रा के बारे में संवाद होता है।

ज्वालपादेवी, पाटीसैण (660 मी.), बौसाल, मलेठी के उपरान्त सतपुली- (617 मी.) में पहुंचे हैं। संयोग से पूर्वी नयार अध्ययन यात्रा दल का भी सतपुली पहुँचना हुआ है। नगरपंचायत, सतपूली एवं जनसमुदाय की ओर से पूर्वी नयार और पश्चिमी नयार अध्ययन यात्रा दलों का हार्दिक स्वागत समारोह किया गया है। सभी यात्रियों ने अपने यात्रा अनुभवों को आपस में और उपस्थित जन समुदाय के सम्मुख साझा किए। साँय को दोनों दलों ने जवाहर नवोदय विद्यालय, खैरासैण (596 मी.) के विद्यार्थियों एवं अध्यापकों के मध्य इस यात्रा के विविध पहलुओं और अनुभवों को व्यक्त किया। रात्रि विश्राम के लिए सुंदर सिंह चैहान बृद्ध आश्रम, मलेठी हम यात्रा साथी पहुँचे हैं।………

यात्रा के साथी-बीरेन्द्र चन्द, देवकृष्ण थपलियाल, कुलदीप सिंह, सागर बिष्ट, यश तिवारी…..
यात्रा लेखन जारी है………..

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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