Thursday, May 14, 2026
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चंद्र दास से IAS चंद्र सिंह तक का सफर

चंद्रदास से चंद्रसिंह आई ए एस बनने तक का सफर

By Dr. Yogesh dhasmana

उत्तराखंड में बहादुर राम टम्टा के बाद सीमांत उत्तरकाशी जनपद के दूसरे आई. ए एस . चंद्रसिंह का सफ़र बेहद रोमांचक ओर चुनौतीपूर्ण रहा हैं।दलित ओर वंचित समुदाय से संबंध रखने वाले चंद्रसिंह सीमांत गांव भंकोली जो भटवाड़ी ब्लॉक का अंतिम आबादी का गांव भी है।

साल 1943, में पिता अब्बलदास के घर पर जन्मे चंद्रदास के कुल 07भाई ओर 03 बहिनें हैं। पिता का मूल व्यवसाय दर्जी टेलरिंग का कार्य था।

चंद्रसिंह मेधावी ओर लगनशील विद्यार्थी थे। एक दिन स्कूल में निरीक्षण पर आए इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल ई चौफीन ने चन्द्र दास की लगन और उसके सुलेख को देखकर, कहा कि तुम्हे एक दिन इस क्षेत्र का नाम रोशन करना है।उन्होंने प्रधानाचार्य से उनकी टी सी. मांगकर चंद्रादास को काटकर चंद्रसिंह कर दिया।

इस प्रशंसा से अभिभूत चंद्रसिंह ने प्राइमरी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर इलाके में अपनी धाक जमा ली थी। आगे की शिक्षा के लिए उन्हें गांव से 06 किमी दूर उत्तरकाशी जाना पड़ा। कड़ी मेहनत और पक्के इरादे के साथ पुनः दसवीं परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में पास की। आगे की शिक्षा तब उत्तरकाशी में नहीं थी।

इस बीच प्रख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा उनके गांव में आए। उनकी भेट तब चंद्रसिंह के पिता से हुई। उन्होंने आगे पढ़ने की इच्छा जताई, इस पर श्री बहुगुणा चंद्रसिंह को अपने साथ टिहरी ले आए। यहां ठक्कर बाबा आश्रम में रहकर चंद्र सिंह ने 1961 में इंटर परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में पास की।

अब उच्च शिक्षा के साथ सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने का सपना बुनने वाले चंद्रसिंह एक दिन चुपचाप 100 रुपए लेकर टिहरी से इलाहाबाद जाने के लिए निकल गए। ऋषिकेश बस अड्डे पर फिर उनकी मुलाकात सुंदरलाल बहुगुणा से हो जाती हैं। पूछने पर उन्होंने अपनी इच्छा बता दी। इस पर श्री बहुगुणा ने उन्हें अपनी जेब से 40 रुपए देकर सरदार इंद्रसिंह नाम के संपन्न व्यक्ति के साथ इलाहाबाद भेज दिया।
विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर उन्हें हॉलैंड हाल छात्रावास भी आवंटित हो गया। चंद्रसिंह आगे बताते है कि उनकी किस्मत से उनके हॉस्टल अधीक्षक पौड़ी के chowfheen साहब ही थे। इनके बड़े भाई ने ही तब चन्द्रदास को चंद्रसिंह नाम दिया था। उन्होंने ने भी वहां उनकी हर संभव मदद की।
इसके बाद उनकी मुलाकात इतिहास की कक्षा में प्रो जसवंत सिंह से हुई, जो चंद्रसिंह की लगन से काफी बहुत प्रभावित थे। उनका विशेष लगाव भी इस पहाड़ी बालक से हो गया। बी ए. परीक्षा उत्तीर्ण करने पर चन्द्रसिंह ने प्रो नेगी से मिलकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की बात की। तब उन्होंने स्वयं निजी खर्च पर उनकी कोचिंग ओर विशेषकर अंग्रेजी भाषा की कोचिंग के साथ एम ए अर्थशास्त्र में प्रवेश ले लिया।

प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास करने पर उन्हें सीधे प्रतापगढ़ में एक डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता पद पर नौकरी मिल गईं एक वर्ष तक सेवा करने के बाद उन्होंने मित्रो की सलाह पर नौकरी छोड़ कर इलाहाबाद में सिविल सेवा परीक्षाओं सहित विविध परीक्षाओं की तैयारी में जुट गए थे।

प्रो जसवंत सिंह के द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग और परामर्श से उन्होंने पहले वर्ष में परीक्षा उत्तीर्ण कर एडीओ पंचायत पद पर अल्मोड़ा ओर उत्तरकाशी में एक वर्ष तक काम किया।

उत्तरकाशी में तब के डीसी जिनका नाम अब उन्हें याद नहीं रहा, ने उन्हें पहचान कर कहा तुम तो इलाहाब में कोचिंग मेरे साथ कर रहे थे, फिर ये एडीओ का पद क्यों लिया, जाओ वहा जाकर तैयारी करो। इस तरह वे फिर इलाहाबाद आ गए और पुनः तैयारी में जुट गए।

1968 में चंद्र सिंह पीसीएस की मुख्य परीक्षा में सफल हो कर डिप्टी कलेक्ट्रेट के रूप में बिजनौर यूपी में ज्वाइन किया। इस के बाद तो श्री सिंह ने संपूर्ण उत्तरप्रदेश में विभिन्न पदों पर काम किया। कुल 35 वर्ष की सेवा में 17 वर्ष पीसीएस ओर 16 वर्ष आई. ए.एस. के संवर्ग में अथक काम किया है।
चन्द्रसिंह संभवतः ऐसे पहले भारतीय प्रशासनिक अधिकारी होगे जिन्होंने सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के बाद कानून की परीक्षा उत्तीर्ण कर समाज में वंचित लोगों को सामाजिक आर्थिक न्याय दिलाने का भी अथक कार्य आज दिन तक कर रहे है।

चन्द्रसिंह जिन परिस्थितियों में तप कर आई. ए. एस संवर्ग तक पहुंचे थे, इस कारण उन्होंने बस्ती यूपी, उधमसिंह नगर, चमोली, मथुरा आदि स्थानों पर सफलतापूर्वक जिलाधिकारी पद पर कार्य किया। जबकि इसी तरह सहारनपुर, पिथौरागढ़ सहित अनेक जनपदों में डिप्टी कलेक्टर अपर जिलाधिकारी के रूप में जनता के बीच लोक सेवक के रूप में एक विशिष्ट पहचान बनाई है। इन जिलों में आज के दिन तक भी जनता उन्हें याद करती है। इसका अनुभव लेखक ने अपने उतर प्रदेश के सेवा काल में स्वयं देखा है।
चन्द्रसिंह ने 1985 में टिहरी बांध परियोजना में मुख्य प्रशासक के पद पर रह कर पुनर्वास के कामों को बहुत तेज गति से किया है। अतिरिक्त इसके उन्होंने मेरठ विकास प्राधिकरण, सरसावा शुगर मिल में मुख्य महा प्रबंधक, सचिव मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण, विशेष सचिव पर्वतीय विकास मंत्रालय और गढ़वाल मंडल में संयुक्त विकास आयुक्त के पद पर रह कर गढ़वाल के नब्बे प्रतिशत गांवों का भ्रमण कर विकास के माइक्रो प्लान विकासखंडों में ही तैयार करवाए है।

चंद्रसिंह की लगन और प्रशासनिक कार्यों की निपुणता देखने के बाद उत्तराखंड राज्य में 2002 में उन्हें राज्य का आबकारी आयुक्त बनाया गया। इस तरह अवकाश ग्रहण करने से पूर्व इन्हें सचिव, सहकारिता, पशुपालन, मत्स्य विभाग, लोक निर्माण विभाग बनाया गया।

इस लंबी सरकारी सेवा के बाद 31 अगस्त 2002 को चन्द्रसिंह सरकारी सेवा से सेवा निवृत हुए। कुछ समय तक सरकार द्वारा उन्हें राज्य लोक सेवा ट्रिब्यूनल का सचिव भी बनाया गया।
आज भी जीवन के 82वर्ष पूरे करने के बाद भी उनका पड़ने लिखने का कर्म निरंतर चलता रहता है। 2010 में पत्नी लता के निधन के बाद जरूर उनके चेहरे पर दुख जरूर झलकता है, पर जन सेवा का जज्बा रखने के कारण गांव से आने वाले हर फरियादी के लिए उनके दरवाजे सदा खुले रहते है।

नोट – प्रस्तुत लेख चन्द्रसिंह जी के घर पर उनके साथ हुई लंबी बातचीत के आधार पर तैयार किया गयाहै। इसके कुछ अंश पाठक दूरदर्शन उत्तराखंड के युटुब चैनल पर भी देख सकते है।

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