Sunday, September 13, 2026
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तापमान बढ़ रहा जंगल कट रहा।

तापमान बढ़ रहा जंगल कट रहा।

@Suresh Bhai 
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पृथ्वी की आधी से अधिक जमीन पर घना जंगल था। जिसे इंसान लगभग 10 हजार वर्षों से अपने लालच के लिए काट रहा है। इसका परिणाम है कि 1900 से अब तक संयुक्त राज्य अमेरिका के आकार के बराबर जंगल गायब हो गए हैं। इस बारे में यह भी कहा जाता है कि यह मात्रा उतनी है जितनी कि इससे पहले 9000 वर्षों में काटे गये जंगल है। न्यू ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच स्टडी के अनुसार 2023 में पृथ्वी पर हर सप्ताह सिंगापुर के क्षेत्रफल के बराबर जंगल गायब हो रहे हैं और लगभग 37 लाख हेक्टेयर जमीन से जंगल काटे गये हैं। दुनिया भर में आग से भी जंगल जल रहे हैं।जबकि तापमान लगातार बढ़ रहा है जिसके लिए जंगल बचाना जरूरी है।
दुनिया भर में जलवायु और पर्यावरण के नाम पर होने वाले सम्मेलनों में ज्यादातर देशों ने 2030 तक वनों की कटाई रोकने के लिए शपथ भी ले रखी है। लेकिन कोई भी देश अपने यहां जंगल बचाने के प्रयासों के आसपास नहीं दिखाई देते हैं। बढ़ते तापमान के दौर में घटते, सिकुड़ते जंगल भी मर सकते हैं।
इन सब हालातों के बाद भी हिमालय से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक वनों का विकास के नाम पर बेहिसाब और अनियंत्रित दोहन हो रहा है।
देश में वनों की कटाई के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं। तेलांगना में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के निकट स्थित कांचा गाचीबोवली वन क्षेत्र में 400 एकड़ भूमि पर वृक्षों का अंधाधुंध कटान हो रहा है। जिसके खिलाफ 3 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा है। यहां जंगल की जमीन पर राज्य सरकार और केंद्रीय विश्वविद्यालय अपना-अपना दावा भी प्रस्तुत कर रहे हैं।जहां आईटी पार्क बनाने के लिए दर्जनों जेसीबी मशीनें 700 से अधिक पेड़- पौधों की प्रजातियों का सफाया कर रही है। जिसके खिलाफ विश्वविद्यालय के छात्र सड़क पर उतरे हुये।वे यहां वन्य जीव संरक्षण कानून के अंतर्गत राष्ट्रीय पार्क घोषित करने की मांग भी कर रहे है। यद्यपि यहां पर सर्वोच्च अदालत के आदेश के कारण थोड़ा राहत मिली है और भविष्य में इस विषय पर 15 मई को अगली सुनवाई सर्वोच्च अदालत होने वाली है।तेलांगना में वन विनाश की इस सूचना से देश भर के पर्यावरणविद् बहुत चिंतित है। क्योंकि यहां पर सैकड़ों पक्षी प्रजातियां,वन्य जीव, सरीसृप,कछुये, बड़े जानवरों में हाथी, बाघ आदि के आवासों को रौंदने का भयावाह दृश्य प्रत्येक व्यक्ति को चिंतित कर रहा है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वत: संज्ञान लेकर राज्य सरकार को को कहा है कि वह इतनी बड़ी मात्रा में पेड़ों के कटान के बाद फिर इसको कैसे हरा भरा करेगी? सुप्रीम अदालत ने पेड़ काटने की जल्दबाजी पर भी नाराजगी जताई है।
दूसरी तरफ हिमालय की ओर देखे तो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से दिल्ली-ऋषिकेश- हरिद्वार और मसूरी के रास्ते पर 50 हजार से अधिक पेड़ काटे जा सकते हैं।जिसमें से 18 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं। देहरादून से ऋषिकेश-भनिया वाला मार्ग पर केवल 15 मिनट के सफर को कम करने के लिए यहां 7 मोड पर सड़क चौड़ीकरण के लिए लगभग 4 हजार बहुमूल्य प्रजाति के साल, कंजू, रोहिणी, हल्दू आदि हरे पेड़ काटे जाने की योजना है।जबकि यह एलिफेंट कॉरिडोर के मध्य स्थित है।जहां पहले उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद शिवालिक एलिफेंट रिजर्व के नाम पर सुरक्षित भी किया गया था। यहां हरे पेड़ों के कटान का विरोध सिटिजन फॉर ग्रीन दून, महिला मंच, इंसानियत मंच, ज्ञान विज्ञान समिति के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में कर रहे हैं। स्थानीय निवासी रेनू पाल ने नैनीताल हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की जिसके बाद हरे पेड़ों के कटान पर रोक लगा दिया गया है। राज्य सरकार से वनों के कटान को रोकने के लिए हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है।
इससे पहले भी देहरादून के पास खलंगा में हजारों साल के पेड़ों के कटान को चिपको और रक्षासूत्र आंदोलन की तर्ज पर रोका गया है।अभी आगे मसूरी राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी हजारों पेड़ों की बलि दिये जाने की संभावना है। इससे पहले भी मोहंड और सहस्त्रधारा रोड पर हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं। कुमाऊं क्षेत्र के बागेश्वर में भी खनन के नाम पर जंगल काटे जा रहे हैं। जिसे फिलहाल नैनीताल उच्च न्यायालय ने रोका हुआ है। गंगोत्री के निकट भी देवदार के असंख्य पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है।
छत्तीसगढ़ में हसदेव जंगल को बचाने के लिए आदिवासियों की बुलंद आवाज के बावजूद भी हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। इसी तरह बक्सवाहा के जंगल भी माईनिंग के नाम पर उजाड़ें गये हैं।
लेकिन इस बात को कब तक नजरअंदाज करते रहेंगे कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए वनों की अहम भूमिका है। ध्यान देना जरूरी है कि जहां जंगल है वहां पीने के पानी को प्राकृतिक फिल्टर करके भूजल के रूप में इकट्ठा करती है।पेड़ों की जड़े वर्षा के पानी को जमीन के अंदर जाने से पहले ही जरूरी पोषक तत्वों और प्रदूषकों को अवशोषित कर लेता है ताकि पीने लायक साफ पानी भूजल के रूप में बचा रहे हैं और मिट्टी को भी क्षरण से रोकते हैं।
लगभग 30 करोड लोग जंगलों में रहते हैं। इसके अलावा विश्व में 1.6 अरब लोगों की आजीविका का सहारा जंगल ही है जो उन्हें लकड़ी, ईंधन, भोजन और रहने का आसरा प्रदान करते हैं।धरती की जैव विविधता में 80 प्रतिशत योगदान वनों का है। इंसानों का अस्तित्व भी इन पेड़ों पर निर्भर है।वैज्ञानिक कहते हैं कि उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के कटान करने से हर दिन लगभग 100 प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम मंडराने लगता है। लेकिन इस तथ्य को समझना भी जरूरी है कि बढ़ती गर्मी में कुछ ही पौधों की पत्तियां शायद फोटो सिंथेसिस भी नहीं कर सकेगी। जिसका असर जलवायु पर भी दिखाई दे रहा है इसलिए चौड़ी पत्ती के सघन वनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। प्राणवायु के कारखाने जंगल है और जल संरक्षण के स्थाई बांध है।
अतः विनाश पर टिके हुए विकास पर पुनर्विचार जरूरी है। बदलती जलवायु के सामने हमें ऐसा विकास चाहिए कि जिससे बढ़ती गर्मी में भी बाढ़,भूस्खलन और भूकंप जैसी जानलेवा स्थिति से बचा जा सके।

लेखक जानेमाने पर्यावरणविद है

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