Sunday, September 13, 2026
Home विविध रामलीला "हमारी गगास की रामलीला के स्तंभ हीरासिंह कार्की और हरीश चन्द्र...

रामलीला “हमारी गगास की रामलीला के स्तंभ हीरासिंह कार्की और हरीश चन्द्र डोर्बी”।

पुरानी पोस्ट, संदर्भ नया।

“हमारी गगास की रामलीला के स्तंभ हीरासिंह कार्की और हरीश चन्द्र डोर्बी”।

By – Charu tiwari

सत्तर-अस्सी का दशक। मेरा गांव अलमेाड़ा जनपद की गगास घाटी में है। मनेला में। एक तरह से पूरी घाटी का द्वार। तब सड़क गगास तक ही थी। यहां से बिन्ता, बग्वालीपोखर, कुंवाली तक फैले बड़े-बड़े दर्जनों गांव। इनकी एक ही थाती थी गगास। सारे लोगों का अंतिम बस स्टेशन गगास होता। शादी-ब्याह या सीजन में पूरा गगास लोगों से आबाद रहता। एक-दो दुकानें। एक हमारी जो बद्रीनाथ रोड पर थी। यहीं बस रुकती थी। हमारी दुकान को मटेला के बचेसिंह जी करते थे। उन्हीं के यहां बस से आने वाले लोग सामान रख जाते। पहले भीमसिंह की दुकान गगास पार घट से लगी थी। बाद में वे भी गगास के किनारे रास्ते पर हमारे गंाव के हंसादत्त जी के मकान में आ गई थी। भीमसिंह जी विकलांग थे। दुनिया भर की खबर और राजनीति इसी छोटी सी चाय की दुकान से चलती थी। सरकारें बनती-गिरती थी। भीमसिंह हमारे सोशल मीडिया थे। पल-पल की खबर उनसे मिल सकती थी। पानदेव हमारे गांव मनेला के ही हुए। रामकोट के भक्त होने के कारण उन्हें ‘भगत’ के नाम से पुकारा जाता था। उनकी भी दुकान वहीं पीपल के पेड़ के पास थी। प्रेम वल्लभ जी की दुकान भी हुई जिसमें महिलाओं के श्रंगार के सामान से लेकर मूंगफली तक मिल जाती थी। गुढोली के एकमात्र दर्जी चुवणराम जी थे। उनकी दुकान इसी मकान के दुमंजले में थी। हमारे गांव के उस समय के प्रधान त्रिलोक सिंह जी ने भी दुकान खोल ली थी। शायद डाक्टर किशनानन्द तिवारी जी ने भी अपना छोटा सा क्लीनिक खोल लिया था।

बस, तब इतनी ही थी गगास की बसासत। बगल में पिंडेश्वर महादेव का शिव मंदिर। गगास में चार ‘घट’ थे इनमें दो हमारे परिवार के थे। एक में हमारा हफ्ते का ‘पांता’ (उगाही के दिन की बारी) लगती थी। अर्थात कुछ लोगों के साझे का था। और चैथा ‘घट’ मनेला वालों का था। यहीं पर चार गांवों का श्मशान। इस छोटे से गगास के एक तरफ ‘सिरो’ और दूसरी तरफ ‘कपड़ीघाट’ के गधेरे। जब आते तो गगास के पानी को भी रोक देते। इसके पास ही हमारा ‘तया’, ‘कुलू’ ‘पुरतेई’ नाम से सारें थी। इसके कुछ दूरी पर था गगास के सामने गुढौली। बिल्कुल गगास नदी के किनारे। गुढौली वालों ने शायद ही जाड़ों में कभी ‘घाम’ देखा हो। गांव के नीचे दोे-तीन बड़े घट थे। ये मनेला और गुढौली के लोगों के थे। गगास नदी हम दोनों के गांव को ही नहीं विकासखंड और विधानसभा को भी अलग कर देती है। लेकिन गगास नदी हमारी एकता का सूत्र है। हमारी खेती नदी के उस पार, उनकी खेती नदी के इस पार। दोनों के लिये गगास का एक ही महत्व है। हमारे सरोकार एक। हमारी मान्यतायें एक। हमारी रामलीला एक जगह पर होती थी। होली की चतुर्दशी पर तीन गांवों मनेला, ऐराड़ी, गुढोली (तब चमना भी गुढोली का हिस्सा था) की होली भी गगास के तट पर बने पिंडेश्वर महादेव के पीपल के चबूतरे पर होती थी।

हमारे गांव मनेला और गुढोली के बीच ‘जैत बू का खाव’, था। वे रामकोट के भक्त थे। सिर में रामजी का लंबा तिलक। उन्होंने इस ‘खाव’ में मछली पाली थी। इन मछलियों को देखना भी हमारे लिये कौतूहल था। इनको मारने पर पाबंदी थी। हम लोग इस ‘रौ’ में नहा भी नहीं सकते थे। बताया जाता था कि इसमें ‘भौंर’ है। जो अपनी ओर खींच लेता है। दुस्साहसी फिर भी इसमें छलांग लगा ही देते। हमारे लिये वे बाहुबली थे। हमारे नायक थे। हम फिर उनकी कहानियों को नमक-मिर्च लगाकर दूसरों को बताते। यही पर दो-तीन दुकानें थी। मनेला के चन्द्रमणि, गुढौली के भवानी सिंह कार्की और देवसिंह कार्की जी की। देवसिंह कार्की की ही दुकान थी जहां मूंगफली मिलती थी। वे जाड़ों में अपना तसला लगाकर मूंगफली भूनते। उनकी दुकान के नीचे ही गगास में बना बहुत बड़ा ‘बान’ (तालाब) था। यही से इन चारों घटों के लिये पानी जाता। यह हम सब बच्चों का ठिकाना था। गरमियों में ऊंचे से छलांग लगाकर हम सब अपनी तैराकी प्रतिभा का परिचय देते। इसी में हमारी तैराकी प्रतियोगिता भी हो जाती। पानी के नीचे देर तक रहना और छलांग लगाकर कितनी दूर पानी के नीचे कौन निकलता है इस पर भी शर्तें लगती।

दरअसल, बात करनी थी रामलीला पर, लेकिन चली गई हमारे गांव के भूगोल पर। हां, गगास हमारे कई गांवों का केन्द्र था। मनेला, ऐराड़ी, मकडौं, पीपलडांडा, चैकुनी, मौना, मवाड़, गुढौली, चमना, गिनाई, गाड़ कोटली, छाना, भेट, तमाखानी और च्याली गांवों का गगास से सीधा रिश्ता था। शायद यह बात 1976-77 की होगी। गगास में रामलीला कराने पर सब गांवों की सहमति बनी। रामलीला कमेटी का गठन किया गया। पिंडेश्वर महादेव मंदिर ही इसका आॅफिस बना। गगास नदी के किनारे हमारे खेतों में रामलीला कराने पर विचार हुआ। इसमें सभी गांवों के लोगों ने बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। उस समय हमारे मंदिर में एक बाबा थे- संतोषी बाबा। उनके जैसा रचनात्मक व्यक्ति मैंने आज तक नहीं देखा। आज सोचता हूं संतोषी बाबा ने संन्यास क्यों लिया होगा! वे समाज के लिये बेहतर काम कर सकते थे। उस रामलीला में उनकी रचनात्मकता देखते ही बनती थी। उन्होंने स्टेज की जो साज-सज्जा की वह आज मुझे दिल्ली के मंचों में भी नहीं दिखाई देती। उन दिनों बिजली तो थी नहीं। ‘गैस’ जलाकर रामलीला होती थी। गैस जलाने वाले को हम तब आईआईटी पास आउट सा सम्मान देते थे। मनेला के मोहन दा ही शायद हमारे इंजीनियर थे। वे हमेशा हिन्दी में बोलते थे। हमारे लिये हिन्दी भी किसी आतंक से कम नहीं थी। ऐसे में सात पर्दो का मंच। उसमें सलीके से बिछी हुई दरियां। मंच के चारों ओर फूलों के गमले।

हमने पहली बार कृष्ण के मुकुट और अंगुली पर चक्र को घुमते हुये देखा। हनुमान को हवा में संजीवनी लाते हुये देखा। सुन्दर मृग को दोड़ते हुये और लक्ष्मण रेखा को जलते हुये देखा। मैंने ऐसी पर्णकुटी आज तक किसी रामलीला में नहीं देखी जो संतोषी बाबा ने बनाई। अशोक वाटिका तो आज भी आंखों में आ जाती है। धुनष-बाण, गदा, तलवार, ढाल, साज-सज्जा तो बिल्कुल ऐसी जैसे रामानंद सागर की रामायण देख रहे हो। वे खुद ही पात्रों का मेकअप करते। संगीत के बहुत अच्छे जानकार थे। रामलीला में हारमोनियम कफड़ा के गुसाईंदत्त जी बजाते थे जो इलाके में संगीत के मर्मज्ञ माने जाते थे। खैर इस पर फिर कभी।

हां, इस रामलीला के सबसे बड़े नायक थे हीरासिंह जी। रामलीला में लोकनाट्य के सबसे बड़े शिल्पी। रामलीला में उन्होंने जिस तरह ‘जोकरिंग’ और लोकनृत्य को स्थान दिया वह देखने लायक था। हमने पहली बार हीरासिंह जी को इसी रामलीला में ‘जोकर’ और कई अन्य भूमिकाओं में देखा। हीरासिंह डील-डौल में मोटे और छोटे थे। उनके पास जोकर की एक ड्रेस थी। तीन चार कलर में गोल खुला हुआ पजामा और झोरदार कुर्ता, सिर पर नुकीली टोपी जिसमें गुब्बारा बंधा होता। जब मंच पर आते तो पूरा वातावरण उन्मुक्त हो जाता। वह जमाना तो इतना खुला नहीं था। विशेषकर महिला-पुरुषों के बीच में, लेकिन हीरासिंह ने अपनी जोकरिंग से इस खाई को पाट दिया। हमारे गांव के बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं मथुरादत्त जी। बाद में हमारे पोस्ट आॅफिस में थे। वे रामलीला में उठने वाले ठेके की दुकान को करते थे। चाय-पानी और पान की दुकान। कुछ मूंगफली, बिस्कुट। आज की तरह का सामान तो था नहीं। चाय की दुकान मंच के सामने लगी होती। उन दिनों ‘बाबी’ फिल्म का गाना ‘कांछो रे कांछा रे प्रीत तेरी सांची…’ की तर्ज पर हीरासिंह जी ने अपनी ‘जोकरिंग’ के लिए गाना बनाया-

मथुरा रे मथुरा रे, चाय तेरी ठंड़ी चीनी मिला जरा घोल के।
पान तेरे सड़े हैं ये अच्छे नहीं, खाने वाले बड़े हैं ये बच्चे नहीं,
मैं तो तहां आऊंगा, सबै घुरया जाऊंगा, ये तेरी केतली तोड़के।

हीरासिंह जी आवाज भी बहुत मधुर थी। भाव-भंगिमा तो प्रकृति से मिली हुई। वे जनक के दरवार में सबसे लोकप्रिय राजा थे। उन्होंने धनुष यज्ञ के प्रसंग को जिस तरह से लोकनाट्य में परिवर्तित किया वह देखने लायक था। एक क्षेत्रीय राजा के रूप में उन्होंने जिस तरह से क्षेत्रीय समस्याओं को रखा वह चेतना का एक बड़ा काम था। वे अपने पेट में को बहुत बड़ा बनाकर आते और गाते-

‘मैं तो राजा हूं राजा अपण गौ क
देखो मेरी पगड़ी देखो, देखो मेरा पेट
इसी पेट में छुपे हुये हैं, बामण-बनिया-सेठ
मैं तो राजा……’

रावण के मंत्री के रूप में भी हीरासिंह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। जब रावण नर्तकी से प्रसन्न होता तो कहता- ‘मंत्री नर्तकी को ईनाम दिया जाये।’ तो हीरासिंह जी कहते- ‘दे दिया महाराज गुढौली के देवसिंह का ‘पूरा कनाव’ दे दिया।’ देवसिंह उनके पिताजी थे। जब वे यह डाॅयलाग बोलते पूरा पंडाल ठहाकों से गूंज जाता। वे अपनी जोकरिंग में कहते कि अरे! कभी देवसिंह की दुकान की मूंगफली मत लेना ‘बुसिल’ होते हैं। सुसैन वैद्य के रूप में उनकी भूमिका देखने लायक होती। एक छोटे से पात्र को कैसे जिया जाता है यह उनके अभिनय से समझा जा सकता था। सुसैन वैद्य को जिस तरह से उन्होंने लोक के रूप में प्रस्तुत किया, उससे पहाड़ की लोकनाट्य शैली को भी समझा जा सकता है। सुसैन वैद्य के रूप में खांसते-खांसते वे यहां की पूरी परिस्थितियों को बता देते थे-

‘है कोई योद्धा इस कपिदल में, जो लाये संजीवन मनमाही रे,
द्रोणांगिरी में है वो संजीवनी ज्योति जले रणमाही रे।’

सीता हरण के समय जोगी के भेष में रावण की भूमिका तो भुलाये नहीं भूलती। कितना सुरीला गीत गाते थे हीरासिंह जी-

‘संसार में है सबसे बढ़िया साधुओं का भेष।
जो कोई लाये दूध-मलाई, सटक नारायण
जो कोई लाये लड्डू-पेड़ा गटक नारायण
संसार मे है……’

हीरासिंह जी ने रामलीला के सभी पात्रों को बहुत संजीदगी से जिया। उन्होंने जहां छोटे पात्रों की भूमिका को रोचक बनाया वहीं बड़े पात्रों की भूमिका को बहुत सार्थकता दी। अभिनय, गायन, भाव-भंगिमाओं से उन्होंने रामलीला को बहुत ऊंचाई तक पहुंचाया। उनके परशुराम के अभिनय को देखने के लिये लोग एक-एक घंटा पहले आकर अपनी सीट सुरक्षित कर लेते। उस दिन सबसे रोचक यह होता कि लक्ष्मण की भूमिका में नन्दू दा होते और परशुराम हीरासिंह जी। दोनों बाप-बेटों का संवाद जब चरम पर होता तो गगास घाटी थर्रा जाती। उस दिन लोगों का साक्षत परशुराम और लक्ष्मण से भेंट हो जाती। परशुराम बने हीरासिंह जी कहरुआ गाते-

बोले ना संभारी हां बोले ना बिचारी रे-रे क्षेत्रिय।
इसी परशु से मार गिराये, बड़े-बडे़ बलशाली
क्षत्रियहीन मही सब कीन्हीं, तोहिं ना हतीं शठ बाल बिचारी। रे क्षत्रिय..।

लक्ष्मण के रूप में नन्दू दा का प्रतिकार देखिये-

पिनाक पुराना, ये धनुष पुराना, काहे रिस होत।
ऐसे धनुष बहुत हम तोड़े, कबहुं क्रोध न कीन्हा,
या मे ममता है कैहि कारण, जो देखत भृगुनाथ रिसाना।
बार-बार माहें परशु दिखाकर, क्यों करते अभिमाना,
जो कायर तुम्हें मिले मुनी जी, उन्हीं को तुम जा धमकाना।

लेकिन दूसरे ही दिन जब वे दशरथ की भूमिका में होते तो उनकी जयजयवंती सुनने लायक होती। इस दिन दर्शक सारे रिकाॅर्ड तोड़ देते। इसकी वजह थी उनके विपरीत कैकई की भूमिका में हरीश डोर्बी का होना। ऐसी जोड़ी शायद ही कभी देखने को मिले। दोनों गायन और अभिनय की मिसाल थे। कोई दर्शक ऐसा नहीं होता जो कैकई के नखरों पर न्यौछावर नहीं हो जाता। हरीश डोर्बी जी की जो भाव-भंगिमांए होती थी ऐसी कोई नायिका भी न कर पाये। वह जिस तरह से अपने आभूषणों को फेंकती और हीरासिंह जब हरीश डोर्बी को मनाते दोहा गाते-

सुमुखि सुलोचनि पिकवयनि, का दुख मोहि जनाउ।
गज गामिनि निज कोप कर, कारण मोहि जनाउ।

फिर राग-विहाग का तो जबाव ही नहीं-

पिया तुम काहे होत मलीन, मलीन पिया तुम काहे…
मैं अपने मन सोच रहा हूं क्या किन जादू कीन,
क्या काहूं ने बोली मारी, क्या कोई ताना दीन। पिया तुम…काहे।

कैकई के रूप में डोर्बीजी की तुनक मिजाजी और दशरथ के रूप मे हीरासिंह की उपेक्षा क्या कहर ढाती थी वे वही समझ सकते हैं जिन्होंने इस जयजयवन्ती को सुना और अभिनय को देखा हो-

देऊं पिया मोहे वह बरदाना, देन कहा जो दुई बरदाना,
भूल गये जो सुधि बिसराई, हा-हा नाथ स्वभाग मैं जाना।

दशरथ के रूप में हीरासिंह ने कैकई बनी हरीश चन्द्र डोर्बी को बहुत मनाया नहीं मानी बहुत कसमें दीं-

सुनहुं प्रिया कहु सतवानी, तुम कहं प्राण प्रिया निज जानी।
मैं ना कहौं कछु बात बनाई, तुम ते प्रिया मोहिं अधिक न रानी।

हरीश डोर्बी कहरुवे में जो जान फूंकते और कैकई के रूप में पूरी तुनकमिजाजी में कहती-

चलो हटो जाओ-जाओ ना बोलों हमसे।
है सबसे अधिक पियारी, वह राम की महतारी
मैंने हीन्हीं यही विचारी, ना बोलो हमसे।

यह संवाद मैंने यहां इसलिये दिया क्योंकि मुझे आज भी वह मंच वैसा ही दिखाई दिया। हीरासिंह जी की छवि ऐसे लगी जैसे वे गगास के उस मंच पर दशरथ की भूमिका में हो। डोर्बी जी और हीरासिंह कार्की जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी छवि कभी दूर नहीं हो सकती। रामलीला में अभिनय के अलावा हीरासिंह जी का पहाड़ी नृत्य-गीतों में भी उतनी ही पकड़ थी। रामलीला का एक बड़ा हिस्सा हीरासिंह जी और हरीश डोर्बी जी का होता। उन दिनों महिलायें मंचों में नहीं आती थी। महिला पात्रों का अभिनय भी पुरुष ही करते थे। डोर्बीजी के अभिनय की चर्चा उन दिनों पूरे अल्मोड़ा जनपद में थी। वे रेडियो कलाकार भी थे। वे जब हीरासिंह जी के साथ महिला पात्र के रूप के में मंच में होते तो दर्शक सीटियां मारने लगते। उनके पास बहुत खूबसूरत ड्रेस थी। कई पाटों का घाघरा, आंगड़ी और साड़ी में हरीश डोर्बी किसी नृत्यांगना से लगते। जब वे मंच में नाचते तो लगता फिल्म चल रही है। वे टूटे कांचों और तलवार की धार पर भी नाच दिखाते थे। सिर में मटके रखकर उनका नृत्य देखने लायक होता। हीरासिंह जी के साथ उनकी जोड़ी कमाल की थी। इस वर्ष की रामलीला शुरू हो गई है। दोनों कलाधर्मियों को नमन।

@लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

RELATED ARTICLES

हवाई यात्रा का एक खास अनुभव साझा कर रहे है संयुक्त निदेशक सूचना एवं लोक संपर्क विभाग डॉ० नितिन उपाध्याय

By - Dr. Nitin upadhyay अगर आप कनेक्टिंग फ्लाइट्स पकड़ते हैं और हब एंड स्पोक्स मॉडल नहीं जानते तो ये पोस्ट आपके लिए है। बनारस...

कॉन्क्लेव की सहभागिता से राज्य में फिल्म निर्माण के साथ फिल्म टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा – श्री चौहान

चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...

नहीं बन पाई रिस्पना से ऋषिपर्णा, पूर्व CM का सपना भी चकनाचूर

By - Prem Pancholi मसूरी पर्वतमाला के जलागम क्षेत्र यथा शिवालिक हिमालय से निकलने वाली रिस्पना नदी की हालात बिगड़ती ही जा रही है। बताया...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -

Latest Post

हर स्कूल का बनेगा आपदा प्रबंधन प्लान : सरकार

हर स्कूल का बनेगा आपदा प्रबंधन प्लान यूएसडीएमए की शिक्षा विभाग के साथ बैठक में बनी रणनीति चेतावनी-सूचना से लेकर खोज-बचाव तक की...

हवाई यात्रा का एक खास अनुभव साझा कर रहे है संयुक्त निदेशक सूचना एवं लोक संपर्क विभाग डॉ० नितिन उपाध्याय

By - Dr. Nitin upadhyay अगर आप कनेक्टिंग फ्लाइट्स पकड़ते हैं और हब एंड स्पोक्स मॉडल नहीं जानते तो ये पोस्ट आपके लिए है। बनारस...

कॉन्क्लेव की सहभागिता से राज्य में फिल्म निर्माण के साथ फिल्म टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा – श्री चौहान

चेन्नई में आयोजित ‘इंडिया इंटरनेशनल फिल्म टूरिज्म कॉन्क्लेव में उत्तराखंड फिल्म नीति की हुई सराहना तमिल फिल्म इंडस्ट्री ने दिखाई उत्तराखण्ड में फिल्मांकन...

सरस्वती ताल और केदारताल का होगा वैज्ञानिक सर्वे, वैज्ञानिको का दल रवाना

सरस्वती ताल और केदारताल के लिए दल रवाना सचिव आपदा प्रबंधन ने दिखाई हरी झंडी मुख्यमंत्री तथा आपदा प्रबंधन मंत्री ने दी शुभकामनाएं प्रदेश...

जल प्रबंधन को मिलेगा आधुनिक तकनीक का वैज्ञानिक आधार – MIKE Hydro Basin सॉफ्टवेयर

जल संसाधन प्रबंधन में आधुनिक तकनीक का नया अध्याय—MIKE Hydro Basin पर राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ देशभर से 400 से अधिक विशेषज्ञ,...

डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ https://www.facebook.com/janmanchaajkal?locale=hi_IN हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय...

Shaurya and Legacy of Karmaveer Jayanand Bharti Remembered on the 94th Anniversary of Pauri Kranti Diwas

Shaurya and Legacy of Karmaveer Jayanand Bharti Remembered on the 94th Anniversary of Pauri Kranti Diwas By - Prem Pancholi The Shail Shilpi Vikas Sangathan organized...

समाधान दिवस पर 120 शिकायतें दर्ज, त्वरित निस्तारण की प्रक्रिया आरम्भ – जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान

जनसमस्याओं के त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के उद्देश्य से सोमवार को कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ऋषिपर्णा सभागार में समाधान दिवस आयोजित किया गया। जिलाधिकारी डॉ....

झीलें कुछ समय के लिए दिखाई देती हैं, स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र में दिखाई देने वाली छोटी हिमनदीय झीलों से तत्काल बड़े खतरे की स्थिति नहीं-वाडिया मीडिया में प्रसारित खबरों के संबंध में यूएसडीएमए...

आयोग से दिए जाने वाले आदेशों का पालन सुनिश्चित करें अधिकारी : मुकेश कुमार

आयोग से दिए जाने वाले आदेशों का पालन सुनिश्चित करें अधिकारी : मुकेश कुमार उत्तराखंड अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष श्री मुकेश कुमार की अध्यक्षता...