समय बदलता है और उसके साथ बदलता है समाज और संस्कृति । इसिलिए इस बात का रोना नहीं रोना चाहिए कि पहले तो ये होता था आज के जमाने में देखो ये क्या हो रहा है । बदलाव समय की मांग है । चाहे सामाजिक पहनावे से देख लो या कहावतों से । सबकुछ बदलता है । कहावत है- “सैंया भयो कोतवाल तो डर काहे का ”
अगर आप भी ऐसी बासी कहावतों के भरोसे बैठे हैं, तो जरा राजपुर थाने की ताजा फोटो देख लीजिए -कोतवाल साहब खुद ही डर की वजह बन बैठे हैं ! कोतवाल के खिलाफ उसीकी कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज हो जा रही है । जिसका काम था शराबियों को ठोकना, वो खुद ठोक बैठा तीन गाड़ियाँ – वो भी ऑन ड्यूटी, फुल झूम के! भीड़ ने घेर लिया, साहब भागने की कोशिश में थे – अब कोई बताए, शर्म बचाने के लिए दौड़ लगाने में क्या बुराई है? आखिर अनुभव तो है, कितनों को दौड़ाकर पकड़ा है… इस बार बस रोल रिवर्स हो गया!
मेरा कहने का मतलब है कि- ये कहावत भी अब सामाजिक पैमाने पर खरी नहीं रही । मेरी सलाह है आगे से इसका प्रयोग न करें । जब कोई इस कहावत को बोले तो चुपके से उसके कान में कहना- राजपुर थाने वाला वीडियो दिखाऊं क्या ?
सुनो ! राजपुर थाने का थानाध्यक्ष ही नहीं ISBT चौकी इंचार्ज भी सामाजिक बदलाव का साक्षी है । बेचारा चौकी का इंचार्ज होते हुए एक लाख की घूस लेते हुए रंगे हाथ विजलेंस के हत्थे चढ़ गया था । बताओ ये कोई बात हुई क्या ? चौकी इंचार्ज साहब का इकबाल एक झटके में खत्म कर दिया । इसिलिए अब किताबों में इस कहावत को अपडेट करने की जरूरत है । वरना गलतफहमी में ये बहुतों को मरवा देगी ।
अब बताओ राजपुर थाने के कोतवाल साहब शराब पीकर झूम भी नहीं सकते । उनका कसूर क्या था ऑन डयूटी नशे में धुत होकर तीन गाड़ियां ही तो ठोकी थी । जो चीता वाला छुड़ाने आया, मुंह पर हेलमेट भी मास्क का काम कर रहा था । समझदार था, उसको पता था उसकी भी रील बन सकती है । एसओ साहब की तो बन ही गई । सस्पेंड कर दिए गए । चलो कोई बात नहीं काबिल लोगों को हप्ते दो हप्ते में फिर कोई और थाना मिल जाएगा । अब आदत जो बन गई है बिना थाने के रह भी नहीं सकते ! कमाल है ! ISBT वाला तमगा अभी धुला भी नहीं था कि राजपुर वाले साहब भी तुरंत चमकने आ गए । राजधानी है हुज़ूर, कुछ तो लिहाज़ रखो..!
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