Sunday, September 13, 2026
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गढ़वाली कविता : जीवनीय दर्शन को सहजता से बताती कविताएं

जीवनीय दर्शन को सहजता से बताती कविताएं

By – Dr. Arun kuksal

प्रायः यह कहा जाता है कि जो समाज में प्रचलित और घटित हो रहा है, वह उसके समसामयिक साहित्य में स्वतः प्रकट हो जाता है। परन्तु इस धारणा के विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि जो सामाजिक प्रचलन में अप्रासंगिक हो रहा है, ठीक उसी समय उसकी अभिव्यक्ति तत्कालीन साहित्य और संगीत में प्रमुखता से होने लगती है।

लोक भाषायें और लोक संगीत सामाजिक व्यवहार से हट रही हैं, परन्तु लोकभाषा और लोक संगीत रचने का शोर चहुंओर है। गढ़वाळि और कुमाउँनी भाषा-संगीत के विकास की बात करने वाले आये दिन और मुखर हो रहे हैं, पर उसको सामाजिक व्यवहार में लाने में उनमें से अधिकांश के प्रयास बस किताबी ही हैं।

लोक साहित्यकार संदीप रावत जैसे विरले ही हैं जो गढ़वाळि साहित्य रचने से ज्यादा उसको गढ़वाळि समाज की जीवंत भाषा बनाने के लिए आम लोगों विशेषकर जवान हो रही पीढ़ी और बच्चों को प्रेरित कर रहे हैं।

संदीप रावत कवि, गीतकार, गितार, विज्ञान शिक्षक, शोधार्थी, हैं। गढ़वाळि कविता, गीत, कहानी, शोध-लेखन, व्यंग और समीक्षायें संदीप के रचना संसार के प्रमुख आधार हैं।

संदीप रावत की चर्चा उनके खबरसार पत्र में धारावाहिक लेख ‘गढ़वालि भाषा कि ऐतिहासिक विकास यात्रा’ से साहित्य बिरादरी में हुयी। उनकी रचनायें सामाजिक सरोकारों में आ रहे बदलावों की तरफ पाठकों को ले जाती हैं। लोक परम्पराओं के टूटने का दर्द उनकी कहानियों और कविताओं का एक मुख्य हिस्सा है।

मानवीय संवेदनाओं से लबालब इस युवा साहित्यकार से गढ़वाली साहित्य के और समृद्ध होने की आशा बलवती होती है।

गढ़वाळि भाषा और साहित्य के विकास और विस्तार के दृष्टिगत संदीप रावत की पहल पर 5 दिसम्बर, 2016 को श्रीनगर गढ़वाल में ‘आखर संस्था’ का गठन किया गया। संस्था मुख्य रूप गढ़वाळि साहित्य एवं साहित्यकारों को एक व्यापक फलक देकर उन्हें सामाजिक जीवन में लोकप्रिय सम्मान देने के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रही है। संदीप ने ‘गढवाळि सरस्वती वंदना’ ‘तेरू ही शुभाशीष च, जो कुछ भि पायि मिन’ एवं ‘अज्ञानै अंधेरी रात मा, द्वी आखरों कू ज्ञान दे’ तैयार की है। इन प्रार्थनाओं की शब्द रचना, धुन, संगीत उन्हीं के द्वारा तैयार किया गया है। इसके गायन के लिए वे छात्र-छात्राओं को निरंतर प्रशिक्षित करते हैं। संदीप आकाशवाणी और दूरदर्शन के नियमित वार्ताकार हैं।

आखर संस्था ने प्रख्यात लोक सहित्यकार गोविंद चातक की जयंती (19 दिसम्बर) पर वर्ष-2018 से ‘गोविंद चातक व्याख्यानमाला’ और ‘आखर सम्मान’ की शुरूआत की। इसके तहत साहित्यकार डाॅ. नंदकिशोर ढ़ौंडियाल ‘अरुण’, बचन सिंह नेगी, मोहन लाल नेगी, ललित केशवान, नरेन्द्र सिंह नेगी, ईश्वरी प्रसाद उनियाल तथा महेशानन्द गौड़ को प्रदान किया गया है।

विज्ञान-गणित शिक्षण के प्रयोगधर्मी लोकप्रिय शिक्षक शिवदर्शन सिंह नेगी की स्मृति में वर्ष-2021 से ‘शिवदर्शन सिंह नेगी स्मृति आखर विज्ञान शिक्षक सम्मान’ से सर्वश्री डाॅ. अशोक बड़ोनी, डाॅ. हर्षमणि पाण्डेय, राजेश चमोली तथा नवीन असवाल को दिया गया है।

संदीप रावत की प्रकाशित रचनाओं में ‘एक लपाग’ (गढ़वालि कविता-गीत संग्रह), ‘गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा’ और ‘लोक क बाना’ (शोधपरक गढ़़वाळि निबंध संग्रह), ‘उदरोळ’ (गढ़वाळि कथा संग्रह), ‘तू हिटदि जा’ (गढ़वाळि गीत संग्रह), ‘आखर’ (दिसा-धियाण्यूं का प्रथम गढ़वाळि कविता संग्रह) और ‘तीस’ (गढ़वाळि कविता संग्रह) शामिल हैं।

संदीप रावत की ‘एक लपाग’ (गढ़वालि कविता-गीत संग्रह) प्रथम प्रकाशित कृति है। प्रत्येक कार्य की शुरुआत एक लपाग (कदम) से होती है। और, संदीप ने साहित्य के क्षेत्र में ‘मुझण न दे जिकुड़ि की आग, मार त सैहि एक लपाग’ के मजबूत इरादों से की है। ‘गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा’ और ‘लोक क बाना’ (शोधपरक गढ़़वाळि निबंध संग्रह) गढ़वाळि भाषा-साहित्य के ऐतिहासिक विकास क्रम की दृष्टि से लोक साहित्य के जानकार एवं शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शी की भूमिका में हैं। ‘उदरोळ’ (गढ़वाळि कथा संग्रह) कहानियों के माध्यम से गढ़वाळि जन-जीवन की खूबसूरती और उसकी खामियों को बताने में कोई संकोच नहीं किया है। ‘तू हिटदि जा’ (गढ़वाळि गीत संग्रह) की कवितायें और कहानियां गीतमय निरंतरता के प्रवाह में आगे बढ़ती हैं। ‘आखर’ (दिसा-धियाण्यूं का प्रथम गढ़वाळि कविता संग्रह) कविता संग्रह के संपादन में उनके साथ साहित्यकार गीतेश सिंह नेगी शामिल हैं। गढ़वाळि में प्रथम महिला कवियत्री आदरणीया विद्यावती डोभाल (‘तीन गढ़वाळि गीतिका’ विद्यावती डोभाल प्रकाशन वर्ष-1975 से गढ़वाळि कवित्रियों का कविता लेखन प्रारंभ माना जाता है।) से लेकर आने वाली पीढ़ी की संभावनाशील कवियत्री प्रिय रवीना राणा की कविताओं की काव्ययात्रा का यह एक बेहतरीन प्रस्तुतीकरण है।

‘तीस’ (गढ़वाळि कविता संग्रह) संदीप रावत की नवीनतम रचना है। उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग के आंशिक आर्थिक सहयोग से रावत डिजिटल, बुक पब्लिशिंग हाउस, गाजियाबाद द्वारा विगत वर्ष- 2024 में प्रकाशित 104 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में 78 छोटी-छोटी कवितायें और 18 क्षणिकायें हैं। पुस्तक में सुपरिचित साहित्यकार गीतेश सिंह नेगी की बेहतरीन भूमिका है। साथ ही, डाॅ. नन्द किशोर ढौंडियाल ने संदीप रावत के संपूर्ण लेखन पर सजीव और सटीक टिप्पणी की है।

‘‘सै बात त य छ कि जथगा बानि का मनखि, उतगै बानि तीस। अलग-अलग लोगूं अलग-अलग तीस, बनि-बनि तीस। जख पाण्या तीसन् हमारि गौळि सुखि जान्द त वखि हौरि बानिक तीस हमारि गुद्धि-बुुद्धि बि सुखै जान्द, मन तैं बि उबै जान्द। जिंदगि भर हमारि तीस बुझदि ही नी। पण! असल बात त य बि छ कि ‘तीस’ ही एक पर्चो बि छ मनखि को ज्यूंदो होणा कु।’’ (अपणि बात, पृष्ठ-16)

ये सच है कि मानव की जीवंतता का मूल आधार उसके जीवन जीने की ‘तीस’ (प्यास) की प्रबलता पर निर्भर करता है। जीवनभर ये तीस खत्म नहीं होती है। इसका समाप्त होना मतलब जीवन का समाप्त होना है-

औवु सब जगौं मेरू नाम, होवु सब जगौं मरि हाम,…
लोग कर्यां मरि जै-जै कार, य तीस अब बढ़दै जाणी,
एक चाऽना खत्म होणी, झट्ट हैंकि उपजि जाणी
यि चाऽना अब मि तैं, भितरैं-भित्र खाणी। (पृष्ठ-50)

संदीप ने आदमी की ‘तीस’ उत्पन्न होने की विविध मनोवृत्तियों से उसकी असल मनोवृत्ति को कविताओं में उभारा है। तीस में ही छुपा है जीवन का आनंद और वही उसके अवसान का भी आधार है। ये आदमी पर निर्भर है कि उसकी तीस जनकल्याण की है या स्वार्थपरख है। जीवनीय इच्छाओं के लिए विशालता की नहीं मधुरता की जरूरत होती है-

समोदर भौत बड़ो, पण! रूखो अर खारो,
पंदेरु छवटो सि अर छाळो,
पण! ना झाणि, कथगौं कि, तीस बुझाळो (पृष्ठ-53)

‘तीस’ कविता संग्रह में छोटी-छोटी कवितायें हैं। अपने स्वभाव में हर समय एक मधुर मुस्कान लिए यह संकोची युवा कवि अपनी कविताओं में प्रखरता से पाठकों की ओर मुखातिब होता है। गढ़वाली भाषा के भूले-बिसरे शब्दों की जीवन्तता ने संदीप की कविताओं को बखूबी सजाया-संवारा है। ये छोटी-छोटी कवितायें जीवनीय संचेतना को बखूबी उद्घाटित करती हैं।

जिंदगि कि दौड़ मा, जो पिछनै छन खड़ा, पण! सच्चा,
तड़तड़ा, अऽर खड़खड़ा, दरअसल् वी छन बड़ा (पृष्ठ-26)
……………
भौत कुछ खोण पड़दो, कब्बि-कब्बि रोण पड़दो
अरऽ अपणा कर्मोन, भौत कुछ जोड़ण पड़दो
असाधारण का ‘अ’, जोड़णो तैं जिंदगी मा। (पृष्ठ-28)
………….
एक बीज सब्र को, हमरा भित्र होण चैंद
हव्वा कै बि दिसा हो, धीरज नि खोण चैंद। (पृष्ठ-30)
…….
सीखि ले भुळा, जीणै कला, जब तक ज्यूंदो छै,
हत्थ-खुट्टा चळा, राखि नियत साफ, ईमानदार्यो द्यू जळा,
दुस्मन बि, ह्वे जालो अपणो, बस! अहम को ह्यूं गळा। (पृष्ठ-31)

संदीप की कवितायें सार-सलाह-संचेतना से आगे जीवन के गूढ़ दर्शन को सहजता से बताती हैं। संदीप कहते हैं कि ‘पाणि सि ब्वगणू बगत, फिर्बि नि छौ समझणा’। जीवन को सार्थक बनाने की राह आसान नहीं है। इसलिए हम मनुष्यों की भीड़ का एक हिस्सा मात्र न बन कर रह जांए-

बगत का अणस्येळा मा, खूब तप्येंदु अर धुप्येंदु,
कर्मों का सिलोटा मा, खूब थिंच्येंदु अर पिस्येंदु,
तब जैकि आन्द ‘मनखि’ परैं, मनखि सि अन्वार,
अर! खुलदन वे कि असल जिंदगि का मोड़-संगाड़। (पृष्ठ-62)
………..
कन-कना दुःख सैकि, फिर्बि ज्वा हैंसणी रान्द
अपणो काम कन्नी रान्द, अरऽ घर-गौं मा
गैण-पातों सि द्मकणी रान्द, वा एक जनानि छ (पृष्ठ-44)
………..
त्वी हमारि चळक-मलक, त्वी छै हमारि हैंस-हर्ष,
हमारि दुनिया तैं रुमैळी, मेरि बेटि! त्वेन बणायि। (पृष्ठ-47)

‘तीस’ किताब में 78 कविताओं के बाद 18 क्षणिकायें हैं। इन क्षणिकाओं में भी मानव जीवन की नियत और नियति को सटीकता से उजागर किया है। ये क्षणिकायें आज के जीवन की विडम्बनाओं पर खूब चटकारें लेती हैं-

जौं का पास, ना जाण-पछयाण, अर! न कळदार,
वूं तैं ही ठगौण लग्यां, आजकाळ गळादार (पृष्ठ-100)
…………
जीवन मा कविता, कविता मा जीवन, खुज्याणू छौं,
इन्नि-इन्नि कैरीक, जिंदगि ब्यळमाणू छौं। (पृष्ठ-100)
…………
हैरि-भैरि ज्वानिक् सारी उमर चैरिग्ये,
मि जोड़-घटाणु कर्दि रयूं, तन-मन हैरिग्ये। (पृष्ठ-102)
………….
जब धर्ति हिल्द त!, वीं का द्गड़ि, मनखि कि जिकुड़ि बि हिर्र ह्वे जान्द
अर! मनखि कि सेक्खि उन्या-उन्नि रै जान्द। (पृष्ठ-103)
…………..
अजक्याल हर क्वी, सट्टा-पट्टों मा रान्द, खैरि क्वी नि खाण चान्द,
अरऽ स्टेयरिंग पकड़ीक, सीधा ऐक्सीलेटर परैं, खुट्टों रखण चान्द। (पृष्ठ-104)

लोकसाहित्य के लिए समर्पित आखर के संस्थापक और अध्यक्ष संदीप रावत प्रयोगधर्मी हैं। एक जगह ठहरना उनके स्वभाव में नहीं है। निरंतर सक्रीयता उनकी आदत में शुमार है। और, जब आदतें सामाजिक दायित्यों के निर्वहन के लिए हो तो वह जीवन की सार्थकता और व्यापकता को निखारती ही हैं। संदीप अपने अघ्यापन, साहित्य और संगीत कर्म को इसी भाव से आगे बढ़ाते जा रहे हैं।

संदीप रावत की साहित्य प्रतिभा निरन्तर निखरेगी ऐसी आशा सभी साहित्य प्रेमियों को है। गढ़वाळि साहित्य संसार में पूरी तैयारी के साथ मजबूत एक लपाग में उपस्थिति दर्ज करवाने वाले इस संम्भावनाशील युवा का स्वागत एवं भविष्य की ढेरों शुभकामनाएं।

गढ़वाळि कविता संग्रह- ‘तीस’
रचनाकार – संदीप रावत
संस्करण- प्रथम, वर्ष- 2024, पृष्ठ- 104, मूल्य- ₹ 250/-
प्रकाशक- रावत डिजिटल, बुक पब्लिशिंग हाउस, 131-132-ए, न्यायखण्ड-2, इंदिरापुरम, गाजियाबाद, उत्तर-प्रदेश- 201014

अरुण कुकसाल
ग्राम- चामी, पोस्ट- सीरौं- 246163
पट्टी- असवालस्यूं, विकासखण्ड- कल्जीखाल
जनपद- पौड़ी (गढ़वाल), उत्तराखण्ड

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