Saturday, September 12, 2026
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स्मृति शेष : मेरी जलमग्न टिहरी का दुबाटा और अठूर

मेरी जलमग्न टिहरी का दुबाटा और अठूर।

Rakesh mohan thapliyal

हर शहर का अपना एक चेहरा होता है और अगर उस शहर को हम कहीं दूर से ,चाहे आसमान से ( एरियल -व्यू ) या आसपास के किसी पहाड़ की ऊंचाई से देखते हैं तो वह बहुत सुंदर और ख़ूबसूरत नजर आता है ।

मेरी टेहरी भी ऐसे ही थी, गंगा –

भिलंगना की उपत्यका या गहरी घाटी में बसी वह एक सुंदर बस्ती थी, उसके चारों ओर ऊँचे सूखे पहाड़ थे । इस नगर को जब हम दयारा या उससे भी ऊपर मदन नेगी और उससे भी उपर धारकोट या रैका – धारमंडल पट्टी के किसी गांव से देखते थे या फिर टिहरी –देवप्रयाग रोड के नीचे स्थित भूकंप – वेधशाला से देखते थे अथवा गंगा पार के कोटी – बागी या कुठ्ठा की धार से देखते थे तो यह बड़ा प्यारा लगता था, तब किसे पता था कि, इसे एक दिन किसी की नजर लग जाएगी ?

इस शहर का अपना एक मिजाज था, जिसे हम उसकी संस्कृति या परंपरा कहते थे ? मेले – ठेले, गंगा – स्नान, पंचमी – बिखोती, दशहरा – रामलीला, कृष्णलीला, करियप्पा फ़ुटबाल और नुमायश , टेहरी की प्रसिद्ध नथ और सिंगोरियां, अब कहाँ रहा वो सब ।

अब सब खो गया , हमारा शहर एक गहरी झील में डूब गया और अब तो सिर्फ यादें ही बाकी रह गई दिलों में और अब सिर्फ एक –दो पीढियां ही शेष बची हैं, जिनके दिलो –दिमाग में उस शहर से जुड़ी ढेर सारी यादें हैं , बाकि जो बच्चे शहर छोड़ते वक्त 8-10 साल के रहे होंगे, उन्हें भी थोड़ा बहुत याद होगी । ऐसे ही उस शहर के मौसम का भी अपना ही एक मिजाज था , सर्दियों में न अधिक ठंडा और न गर्मियों में अधिक गर्म।

हालाँकि यहाँ एक के बजाय दो नदियाँ थी फिर भी यह श्रीनगर की तुलना में इतना गरम नहीं था कि, इसे उसकी तरह रेतीला कहा जाता l फिलहाल आप गर्मियों
के मौसम को ही लेलो, इस मौसम में जब कई शहरों में तापमान और पारा 50 को छूता है या 45 -47 होना तो एक आम बात है ।गर्मियों के मौसम के खैर दिन चाहे जैसे भी हों पर गर्मियों की शामें, बड़ी सुहानी होती थी चाहे उस में थोड़ी उमस ही क्यों न हो ? उस ज़माने की यादों में खो जाने पर याद आता है कि, कोटि कालोनी से होकर जैसे ही lबसें नागरजाधार के मुहाने पर प्रवेश करती थी तो टेहरी की एक झलक नजर आती थी ।

जैसे किसी ने गोरी का घूंघट उठा दिया हो , साइंस ब्लाक के लाल पट्टों की एक झलक दिखती और तभी फिर सड़क अंदर की ओर मुड़ जाती और शहर का वो चेहरा ओझल हो जाता फिर कोई एक मोड़ आता और वो चेहरा फिर थोड़ा सा नजरों के सामने आता और ये लुकाछिपी चलती रहती थी।

नीचे दुबाटा ,उत्तरकाशी रोड , खाली सूखे खेत और उनके बीच में गोबर के छोटे-छोटे ढेर, चरते –चरते पूँछ हिलाकर मक्खी उड़ाते गाय –बैल बकरियां, सामने पहाड़ पर रैका –धारमंडल पट्टी के गाँव, एक मृग – मरीचिका जैसा हरा –भरा रामपुर और डोब, फिर माफिदारों के पढियार गाँव से पहले का वो पीपल का पेड़ और वो एक सफ़ेद मकान, जिसमें शायद रेशम विभाग का ऑफिस था ।

दुबाटा के ठीक सामने 90 डिग्री के कोण पर बना भगवतपुर का पंचायत घर और फिर उसके दाईं तरफ बसा जुग्याणा, वाह क्या बात थी । सड़क के नीचे मुहाने पर बसा दुबाटा साफ़ नजर आता जो दो मोटर –मार्गों सड़कों के बीच और काफी नीचे था बसा था ।

उसके सर पर ऋषीकेश रोड थी तो मुंह के ठीक सामने उत्तरकाशी रोड थी । उस छोटी बस्ती को कोई दुबाटा तो कोई दोबाटा कहते थे और आसपास के ग्रामीण अंचल में उसका एक नाम दु–सड़की भी था । यहाँ “ दु ” शब्द का अर्थ है “ दो”. आपने दो राहा और चौराहा, शब्द तो कई बार सुना ही होगा, क्यों ?

दरसल में यहाँ, टेहरी शहर से आनेवाला मुख्य मोटर मार्ग दो भागों में बंट जाता था एक सड़क चंबा -ऋषीकेश की ओर चली जाती थी, चंबा से गजा और मसूरी जाने की रोड भी थी और दूसरी सड़क छाम – भल्डीयांणा होकर उत्तरकाशी की तरफ चली जाती थी । लम्बगांव और बड़कोट –पुरोला — रवाईं भी इसी रोड से जाते थे, ये सड़कें भल्डीयांणा से कटती थी ।

टेहरी से एक के पीछे एक आनेवाली बसों का रास्ता, यहाँ से उनके गंतव्य के हिसाब से बदल जाता था। स्थानीय बस यात्रियों की दृष्टी से यह बस्ती, शुरू में अपने टोल और गेट –सिस्टम की वजह से मशहूर थी।

टेहरी से बाहर जानेवाली बसें, दूसरी तरफ से आनेवाली बसों की इंतजार में यहाँ आधे –आधे घंटे खड़ी रहती थी और लोग भी बस के अंदर कैद होकर बैठने की अपेक्षा, बस से उतरकर या तो सड़क में टहलने लगते या फिर होटलों में चाय पीने लगते थे, नहीं तो बीड़ी – सिगरेट फूंककर ही टाईम पास करते थे । गेट –सिस्टम के युग में यहाँ अच्छी चहल पहल रहती थी । ऋषिकेश से सीधी उत्तरकाशी जानेवाली बसें भी टेहरी न जाकर, थोड़ी देर के लिए यहीं रुक जाती थी ताकि उनके उल्टी कर – करके हैरान -परेशान, अधमरे मुसाफिर मुंह धोकर, कुल्ला करके और बाकी चाय-पानी पीकर थोड़ा तरोताजा हो जाएँ ।

यदि किसी बस में टेहरी की भी कई सवारियां होती तो बस उन्हें पहले टेहरी छोड़ने जाती पर उत्तरकाशी की सवारियों को दुबाटा में ही उतार देती थी क्योंकि टेहरी जाने के लिए चार आना टोल – टैक्स या चुंगी लगती थी । अब यदि किसी को टेहरी जाना है तो फिर चार आना टोल भरो ।

दुबाटा, टेहरी शहर के पुराने मोटर अड्डा से सटी अठूर पट्टी का ह्रदय – स्थल था । यहाँ होटलों के अलावा राशन और परचून की दुकानें भी थी और आसपास के गाँव के लोग छोटे – मोटे सौदा –सामान और घूमने, टाईम पास करने और गपशप मारने के लिए यहाँ चले आते थे । यहाँ कहीं कोई दैनिक या साप्ताहिक अखबार भी मिल जाता था । दुबाटा से सटी और उसके के बगल में काफी खुली जगह थी, बाद में यहाँ पर आईटीआई भी बनी और उसकी बगल में एक पावर –स्टेशन और खेल का मैदान भी था जहाँ एक फ़ुटबाल टुर्नामेंट भी होता था,श्री. रामेश्वर सकलानीजी के नाम पर और अठूर, पड़ियार गाँव और मालदेवल में फुटबाल के कई ख़िलाड़ी भी हुए।

दुबाटा से 50-100 मीटर आगे चलो तो अठूर का सांस्कृतिक केंद्र जगदीश भवन आ जाता था,यह पहले एक कच्चा दुमंजिला घर था और उसके बाजू में लकड़ी का बना शानदार नक्काशी वाला जगदीश भवन था .असवाल लोगों का गढ़ ,जो अपनी आन –बान –शान के लिए पूरे अठूर में मशहूर था । सुनते हैं कि,उस इलाके में पहला रेडियो वहीँ आया था । देश दुनिया की खबर –सार वहीँ मिलती थी .
बड़े लकड़ी के दरवाजे, नक्काशीदार खंबे, रंग –बिरंगा पेंट, उसका एक अलग ही रुतबा था । उसके तत्कालीन स्वामी माननीय श्री. चिरंजीलाल असवालजी इलाके के सभ्रांत, उच्च शिक्षित व्यक्ति थे । सामने सड़क के नीचे उनका एक बड़ा आम का बगीचा भी था, विजय, कमल सिंह, फत्ती उनके पुत्र और भतीजे थे और मेरे मित्र भी । असवालजी को देखकर, मुझे डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णनजी याद आ जाते थे । वे भी शिक्षक और विद्वान व्यक्ति व दार्शनिक थे।

असवालजी ने भी टेहरी गढ़वाल में शिक्षा के क्षेत्र में काफी काम किया था । वे प्रताप कालेज और नार्मल – स्कूल, दोनों जगह कार्यरत रहे और हमेशा पैदल ही टेहरी आते-जाते थे । वे प्रधानाचार्य थे, मेरे पिता प्रताप कालेज में 1948 में अध्यापक नियुक्त हुए थे। असवालजी मेरे बुढाजी श्री महिमानंद डंगवालजी के परम मित्र थे, सिराईं से आते –जाते बुढाजी का वहां उठाना –बैठना होता ही होता था ।

असवालजी सेवानिवृत होने के बाद कई साल तक राजमाता टेहरी कालेज के सर्वेसर्वा भी रहे । उनकी संस्तुति पर पिताजी भी एक साल तक उस कालेज के सचिव रहे पर उनके कानून के मामले में सख्त होने की वजह से राजमाताजी दुखी रही । राजमाताजी अब भी अपने को मालिक समझती थी और पिताजी उनको ट्रस्टी ।

जगदीश भवन के उप – विभाग में भुला अनिल शर्मा रहता था । अठूर की रामलीला भी बड़ी प्रसिद्ध थी, दुबाटा में आईटीआई के बगल वाले फ़ील्ड में हमने भैंसों का युद्ध भी देखा था, इसे स्थानीय भाषा में बेल्लों की लड़ाई कहा जाता था । दारू पीकर मदमस्त भैंसे, माथे पर लाल पिठाईं का बड़ा छापा लगाए, गले में फूलों की माला पहनकर,एक- दूसरे को मरने मारने पर उतारू रहते थे ( हमने कंडल के खेतों में “नौर्ते” का हिंसक और खूनी खेल भी देखा था) । उनके गोसी (मालिक) ही उनके प्रमोटर और कोच होते थे ।

असवालजी के घर की बगल से ही एक रास्ता, सुनार गाँव और पजों या पजाऊँ आदि को भी जाता था, उनके घर के सामने ही सोनादेवी स्कूल था, सोनादेवी हमारे दादा के बड़े भाई की श्री. ईश्वरी दत्तजी की पत्नी अर्थात मेरी दादी की जिठानी थी, उनका मायका पजों था ।दादा के बड़े भाई पंडित ईश्वरी दत्तजी रियासत में राजकुमारों के अध्यापक, इंग्लिश ऑफिस के हेडक्लर्क आदि कई पदों पर कार्य करने के बाद अंत में राजा कीर्ति शाहजी के निजी –सचिव भी रहे थे। दादा श्री. रघुवर दत्तजी भी हजूर – कोर्ट में सिरिस्तेदार रहे और उनकी ससुराल भी पजों में थी, बाद में दादी के मायके वाले सिराईं (राज- गौं) में बस गए थे, इसलिए भी अठूर से मेरा घनिष्ठ नाता व संबंध भी रहा। श्री श्यामचंद नेगीजी पत्रकार थे, वो टाईम्स ऑफ़ इंडिया में भी रहे व उनके अनुज एडवोकेट मोहनलाल नेगी भी अठूर की महान विभूतियों में शामिल थे। श्री. मोहनलाल नेगीजी को गढ़वाली के पहले कहानीकार होने का सम्मान प्राप्त है, नेगीजी मूर्तिकार भी हैं ।

सोनादेवी स्कूल की बगल में 2-3 मकान और भी थे ? बाद में उसके सामने सड़क के पार एक चाय का खोखा भी बना। यहाँ से थोड़ा और आगे चलकर यह ढालदार सड़क फिर समतल हो जाती थी, सड़क के किनारे एक छोटा मकान था, जहाँ से खांड और सुनारगांव आदि का रास्ता था और फिर खांडखाले का मोड़ था, वहां भूपाल भाईका घर था और उसके सामने से ही जोगियांणा/जुग्यांणा गाँव का रास्ता था। थोड़ा आगे चलकर यह मोटर – मार्ग दो भागों में विभाजित हो जाता था एक रास्ता पुराने मोटर अड्डे को चला जाता था और एक पेट्रोल पंप होकर टेहरी को । बाद में इस पंप की बगल में आरा मशीन ,एक पक्की बिल्डिंग और सामने भी कुछ खोखे व दुकाने बनी और अंग्रेजी शराब की दुकान भी यहीं शिफ्ट हो गई थी । . पुलपार या पुराना मोटर अड्डा एक अच्छी खासी बस्ती थी।

टेहरी का राशन दफ्तर और सप्लाई गोदाम, बाट -माप तोल विभाग का दफ्तर आदि अंतिम क्षणों तक वहीँ रहे । वहां मित्र रमन सजवाण का घर था ,सरदार जोगिंदर सिंहजी का पेट्रोल पंप था, लाला गंगाशरण जी की दूकान थी ,आईटीआई / पौलीटेक्निक था , भाई श्री. सुधीर भाई जैन का वर्कशॉप था , फांसीघर था , लाला बैलवालजी थे । दूसरी ओर आरा मशीन और पंप के पीछे से शमसान का रास्ता था, सारजुला पट्टी के लोग ईधर से ही गंगा तट पर जाते थे, बद्रीनाथ मंदिर के ठीक सामने वहां एक शिवमंदिर था, जिसमें कभी एक अघोरी बाबा भी रहता था ।
पेट्रोल पंप के बाद कुछ खतरनाक मोड़ थे, सामने बद्रीनाथ मंदिर , पुराना दरबार और संगम और गणेश –प्रयाग नजर आता था और फिर आता था सड़क के नीचे तीन धारा और सड़क के ऊपर माई –बाड़ा । तीन धारे के सामने ही से पुराने मोटर अड्डे और माई –बाड़ा जाने का कच्चा रास्ता था

उसके बाद चंद कदम आगे फिर पुराने मोटर अड्डे जाने का चौड़ा रास्ता था और उस रास्ते में एक मोड़ था, जिसके किनारे पर एक बड़ा पीपल का पेड़ था और उसके बाद खड़ी चढाई थी ।

 

लेखक टिहरी के मूल निवासी है और वरिष्ठ साहित्यकार है।

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